इतिहास (प्राचीन) नोट्स/ सामान्य अध्ययन

गुर्जर-प्रतिहार वंश ( Gurjar-Pratihar Dynasty )

गुर्जर-प्रतिहार वंश ( Gurjar-Pratihar Dynasty )

अग्निकुल के राजपूतों में सर्वाधिक प्रसिद्ध प्रतिहार वंश था जो गुर्जरों की शाखा के सम्मिलित होने के कारण इतिहास में गुर्जर- प्रतिहार कहलाए बादामी के चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्वितीय के ऐहोल अभिलेख में गुर्जर जाति का उल्लेख आभीलेखिक रूप में सर्वप्रथम हुआ गुर्जर परिहार वंश का भारत के उत्तर पश्चिम में शासन मुख्यतः छठी शताब्दी से बारहवीं शताब्दी तक रहा था तथा तथा इन्होंने विदेशी आक्रमण के संकट में भारत के द्वारपाल की महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी

प्रतिहार वंश नवीं शताब्दी के अंत के पहले इस नये राजवंश का प्रभुत्व सब दिशाओं में फैल गया था और महान प्रतिहार राजा के आदेश का पंजाब में पेहोवा से मध्य भारत के विस्तृत भू -भाग में सर्वत्र पालन होता था ।

अपने अभिलेखों में प्रतिहार रामायण में प्रसिद्ध सूर्यवंशी क्षत्रिय लक्ष्मण से व हरिश्चंद्र नामक एक ब्राह्मण का वंशज होने का दावा करते हैं । जैन ग्रन्थ ‘हरिवंश ‘में यह लिखा गया है कि इस वंश का प्रसिद्ध व्यक्ति वत्सराज अवन्ति का राजा था ।तथापि कुछ विद्वान इस उद्धरण का भिन्न अर्थ बताते हैं ।

सुलेमान नामक एक सौदागर ने भोज के साम्राज्य को देखा था ।उसने इसके अशवरोही सैनिकों के बल की तथा इसके राज्य में रहने वाली शान्ति की बड़ी प्रशंसा की है ।

प्रतिहार वंश का महत्व

हर्ष की मृत्यु के पश्चात उत्तरी भारत की जो राजनीतिक एकता छिन्न-भिन्न हो गई थी उसे पुनः स्थापित करने का प्रयत्न प्रतिहार वंश के शासकों ने किया था तथा सिंध प्रदेश से आगे बढ़ती मुस्लिम शक्तियों को भी रोका तथा उत्तरी भारत में इन विदेशी शक्तियों का विस्तार नहीं होने दिया

इतिहासकार रमेश चंद्र मजूमदार के अनुसार गुर्जर प्रतिहारों ने छठी सदी से 12 सदी तक अरब आक्रमणकारियो के लिए बाधक का काम किया था प्रतिहार नरेश महान विजेता होने के साथ-साथ साहित्यप्रेमी, कलाप्रेमी और धर्मालु शासक थे और उनके शासनकाल में भारतीय संस्कृति एक उन्नति की चरम सीमा को प्राप्त किया

गुर्जर- प्रतिहारो की उत्पत्ति

छठी शताब्दी के द्वितीय चरण में उत्तर- पश्चिम में एक नए राजवंश की स्थापना हुई, जो गुर्जर-प्रतिहार वंश कहलाया स्कंध पुराण में पंच द्रविडो में गुर्जरो का उल्लेख मिलता है निलकुण्ड, राधनपुर, देवली तथा करड़ाह शिलालेख में प्रतिहारो को गुर्जर कहा गया है

अरब यात्रियों ने इन्हें जुर्ज़ लिखा है अलमसुदी गुर्जर प्रतिहार को अल गुजर (गुर्जर का अपभ्रंश) और राजा को बोरा कह कर पुकारा है जो संभवत आदिवराह का विशुद्ध उच्चारण है अलमसूदी ने प्रतिहार शासक महीपाल के समय इसके राज्य का भ्रमण किया था व इसके घोड़े व ऊँटों का वर्णन किया है मिहिरभोज के ग्वालियर अभिलेख में नागभट्ट को राम का प्रतिकार एवं विशुद्ध क्षत्रिय का गया है

चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपने वर्णन में 72 देशों का उल्लेख किया है इसमें भीनमाल को भी शामिल किया गया है इसे एक कू-चे-लो गुर्जर बताया तथा उसकी राजधानी पीलोमौलो/भिलामाला (भीनमाल) बताया है

प्रतिहार वंश की उत्पत्ति में बहुत मतभेद है तथा सभी ने इनकी उत्पत्ति अलग-अलग स्थानों से बताइए जो निम्न निम्न है-

वी ए स्मिथ एवं स्टेन्फोनो ने इन्हें श्रीमाल/भीनमाल को मानते हैं

 भगवानलाल इंद्र जी ने गुर्जरों को कुषाणों के समय में बाहरी प्रदेश से आया हुआ माना है

बम्बई गजेटियर में गुर्जर को विदेशी माना है और गुर्जरात्रा रा में बसने के कारण गुर्जर माना

डॉ ओझा इन्हें देशी क्षत्रिय माना हैं

 केनेडी ने प्रतिहारों को ईरानी मूल निवासी बताया है परंतु इनका मत असंगत माना गया है क्योंकि सूर्योपासना न केवल ईरानी की पूजा-पद्धति थी और न ही सारे प्रतिहार नरेश सूर्योपासक थे

 कनिंघम के अनुसार प्रतिहार शकों और यू-चियो की संतान थे लेकिन यह केवल अनुमान है

भटनागर महोदय ने गुर्जर प्रतिहारों को गुर्जर की संतान माना है क्योंकि वे गुर्जरों की विदेशी मानते हैं अतः उनकी दृष्टि से गुजर प्रतिहार भी विदेशी थे

बी एन पुरी आदि कई विद्वान विद्वान गुर्जरों को विदेशी नहीं मानते हैं इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि कभी-कभी ब्राह्मण को भी गुर्जर ब्राह्मण शब्द से पुकारा गया है गुर्जर भारतीय थे और राजपुताना के किसी भाग में रहते थे कालांतर में उन्होंने एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की

महीपाल के उत्तर में कुलूत से दक्षिण में केरल तक के भारत के सबसे अधिक दूर के भूभाग पर इसकी विजय का उल्लेख राजशेखर करता है  नाटककार क्षेमीश्वर ने अपने चण्डकौशिक नामक नाटक अपने प्रतिहार संरक्षक राजा के लिए लिखा था जिसमें उसने अपने संरक्षक राजा की विजय कर्णाटों अर्थात राष्ट्रकूटों पर होने का वर्णन किया है ।

महीपाल के उत्तराध उत्तराधिकारी गंगा की तराई, राजपूताना ककुछ भूभागों व मालवा पर अनिश्चित अधिकार कायम रखे, किंतु उनके सामन्त जिसमें चन्देल उल्लेखनीय है, उनके राज्यों को हड़पने लगे । चालुक्यों ने गुजरात में,  परमारों ने मालवा में, चन्देलों व चेदियों ने यमुना और नर्मदा के बीच के प्रदेशों में अपने अपने को स्वाधीन कर लिया ।

ग्यारहवी शताब्दी के प्रारंभिक काल में एक और अधिक बलवान शत्रु क्षेत्र में उतरा । सन् 1018 ई. में कन्नौज जिसका शासन राज्यपाल प्रतिहार करता था, महमूद गजनवी के द्वारा जीता गया । प्रतिहार राजवंश सम्भवतः एक छोटे राज्य प्रदेश पर ग्यारहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध तक शासन करता रहा । लेकिन उनका साम्राज्य जा चुका था और वह स्थानीय सरदारों के पद पर पहुँच गये थे ।

गहड़वाल वंश

प्रतिहारों के पतन के बाद चंद्रदेव ने 1080 से 1085 ईसवी के मध्य गढ़वाल वंश की नीव रखी। इसकी राजधानी भी कन्नौज से यह चंद्रवंशी थे। चंद्र देव का पौत्र गोविंद चंद्र (1114 से 1155 )ई इस वंश का सर्वाधिक महत्वपूर्ण शासक था उसने पालों से मगध जीता।

गोविंद चंद्र का शांति एवं युद्ध मंत्री लक्ष्मीधर प्रकांड विद्वान था। उसने कृत्यकल्पतरु नामक ग्रंथ की रचना की। यह कानून व नियमों की एक पुस्तक है। गोविंद चंद्र की पत्नी कुमार देवी बौद्ध थी। गोविंदचंद्र स्वयं बड़ा विद्वान था उसने विविधविद्याविचारवाचस्पति की उपाधि ग्रहण की।

उसने उड़ीसा के बौद्ध भिक्षु शाक्य रक्षित तथा चोल राज्य के बोध बागेश्वर रक्षित का स्वागत किया। गोविंद चंद्र को पुत्र विजय चंद्र (1155 से 1170 ईसवी) के समय दिल्ली के क्षेत्र पर चौहानों ने अधिकार कर लिया।

जयचंद (1170 से 1194) इस वंश का अंतिम शक्तिशाली शासक था इसकी पुत्री संयोगिता का अपहरण दिल्ली के अजमेर के चौहान शासक पृथ्वीराज तृतीय ने किया था। यह घटना चौहान व गढ़वाल वंश के मध्य शत्रुता का मुख्य कारण बनी। जयचंद ने राजसूय यज्ञ भी किया। 1194 में चंदावर के युद्ध में मोहम्मद गोरी के द्वारा पराजित हुआ व मारा गया।

जयचंद ने संस्कृत के प्रख्यात कवि श्रीहर्ष को संरक्षण प्रदान किया। उन्होंने नैषधचरित्र एवं खण्डनखण्डखाद्य की रचना की। हरिश्चंद्र इस वंश का अंतिम शासक था। गहड़वाल शासकों की मुहरों पर गरुड़ की आकृति है तथा इसके अभिलेखों में इन्हें परम माहेश्वर कहा गया है।

गहढ़वाल शासक विजय चंद्र ने जौनपुर में अटाला देवी के मंदिर का निर्माण कराया बाद में मुसलमानों ने यहां अटाला देवी मस्जिद का निर्माण करवाया। गहड़वाल शासकों ने मुस्लिम व्यापारियों पर तुरुष्कदंड या मल्लकर नामक कर लगाया। पत्ताल व पाठक गहड़वालों की प्रशासनिक इकाइयां थी।

  • किस प्रतिहार शासक को आर्यावर्त का सम्राट तथा रघुवंश मुक्तामणि की उपाधि दी गई है – महिपाल को राजशेखर ने दिया।
  • गुर्जर प्रतिहार वंश का संस्थापक था? – नागभट्ट प्रथम
  • गुर्जर प्रतिहारों की राजधानी थी? – कन्नौज
  • त्रिकोणीय संघर्ष का प्रारम्भ किस प्रतिहार नरेश ने किया? – वत्सराज
  • अलमसूदी ने गुर्जर प्रतिहार राज्य को कहा है? – अलजजूर
  • गुर्जर जाती का सर्वप्रथम उल्लेख कहा हुआ है? – पुलकेशिन द्वितीय के एहोल अभिलेख में
  •  ‘हरिकेलि’ नाटक का रचयिता है – प्रतिहार शासक भोज
  • किस प्रतिहार शासक ने ‘आदिवाराह’ की उपाधि धारण की – मिहिरभोज
  • परमार वंश का सबसे योग्य शासक कौन था – भोज परमार

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J.S.Rana Sir

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