अर्थशास्त्र नोट्स/ सामान्य अध्ययन

गैर निष्पादित संपत्तियां

गैर निष्पादित संपत्तियां

संपत्तियां (Assets)

बैंक अपने ग्राहकों को जो ऋण देता है उसे अपने खाते में संपत्तियों के रूप में दर्ज करता है, क्योंकि यही ऋण बैंक को ब्याज के रूप में आय प्राप्त कराते है।

निष्क्रिय परिसंपत्तियां (Assets)

बैंकिंग की भाषा में निष्क्रिय सम्पत्तियों का अर्थ ऐसी मुद्रा से है जोकि बैंक में रह जाती हैं तथा अर्थव्यवस्था में कोई भी उत्पादन नहीं करती हैं। इन परिसंपत्तियों पर बैंक को अपने ग्राहकों को ब्याज देने पड़ता है।

निष्पादित संपत्तियां (Performing Assets)

ये वे ऋण हैं जोकि बैंकों द्वारा अपने ग्राहको को दिए गए हैं। इन ऋणों से अर्थव्यवस्था में उत्पादन शुरू होता है। तथा बैंक को ऋण धारकों से ब्याज के रूप में आय प्राप्त होती है।इन्हें वित्तीय भाषा में मानक संपत्ति (Standard Assets) कहते हैं। ये वह है जहां पर मूलधन भुगतान 91 दिन एवं ब्याज भुगतान 365 दिन से अधिक न रोका गया हो।

गैर निष्पादित संपत्तियां (Non-Performing Assets (NPA))

गैर निष्पादित संपत्तियां (NPA) वे ऋण हैं जोकि बैंकों द्वारा शुरुआत में अपने ग्राहकों को दिए गए, परन्तु कुछ समय अंतराल के बाद इन ऋणों से का वापस आना बंद हो गया। जिससे बैंकों की आय रुक जाती है तथा उनके द्वारा दिया हुआ ऋण भी खतरे में पड़ जाता है। यदि मूलधन भुगतान 91 दिन से एवं ब्याज भुगतान 365 दिन से अधिक रोक दिया जाये तो वो ऋण गैर निष्पादित संपत्ति (NPA) बन जाता है।

गैर निष्पादित संपत्ति (NPA) को 3 श्रेणियों में बांटा गया है –

  1. उपमानक (Substandard)- ऐसा ऋण जिसमें 18 माह तक वसूली नहीं की गयी हो।
  2. संदेहास्पद (Doubtful)- जो 18 माह से अधिक गैर निष्पादित संपत्ति(NPA) हो परन्तु इस ऋण की वापसी की संभावना बनी हो। उदाहरण के लिए मंदी की वजह से किसी उद्यमी का ऋण वापस न लौटा पाना।
  3. नष्ट (Lost)- ऐसे ऋण जो अब वापस नहीं आ सकते, जिसकी वापस आने की कोई उम्मीद न हो।

वर्तमान (2020) में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार बैंकों के कुल कर्जों में 6.4% गैर निष्पादित संपत्ति(NPA) है।

गैर निष्पादित संपत्ति (NPA) बढ़ने के कारण

  1. सरकार द्वारा ऋण माफी- सरकार द्वारा जब किन्हीं कारणों(बाढ़, सूखा एवं चुनावी लोकलुभावन वादे आदि) से जब कर्ज माफी को घोषणा की जाती है।
  2. बैंकों द्वारा बिना सही जांच परख के ऋण देना। इसका उदाहरण भारत से भागे हुए कई उद्योगपति है जोकि एक बड़ा ऋण लेकर देश छोड़कर जा चुका है।
  3. बैंकों द्वारा दिए गए ऋण पर ऋण देने के उपरान्त को निगरानी का न होना।

गैर निष्पादित संपत्ति (NPA) को रोकने के उपाय

  1. 1993 में ऋण वसूली न्यायाधिकरण (Debt Recovery Tribunal) को मुंबई में बनाया गया।
  2. तारापोर कमेटी- इस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट वर्ष 1997 में दी तथा गैर निष्पादित संपत्ति(NPA) को वसूलने के लिए निपटान प्रणाली(Settlement System) लाने का सुझाव दिया।
    • ब्याज दर को कम करा जाए।
    • एकमुश्त पैसा लौटाने पर छूट दी जाए।
  3. 2002 में प्रतिभूतिकरण कानून (Security Act)- The Securitisation and Reconstruction of Financial Assets and Enforcement of Security Interest Act, 2002 को बनाया गया- इस एक्ट के तहत भारत में ARC(Assets Reconstruction Companies) बनायी गयी जो लोन(ऋण) वसूलने में विशेषज्ञ कंपनियां होती थी। ये एक विशेष तरह की कंपनियां होती थी जो बैंकों से कम कीमतों पर गैर निष्पादित संपत्ति(NPA) खरीद लेती थी, तथा उन्हें अपने विशेषज्ञों द्वारा वसूलती थी। गलत तरीकों(डरा-धमका कर) से ऋण वसूलने के आरोपों के कारण इन्हे बंद कर दिया गया।

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