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भारत की खनिज सम्पदा

भारत की खनिज सम्पदा

भारत में खनिज सम्पदा का विशाल भंडार है, जिससे उद्योगों को, विशेषकर लोहा-उद्योग को कच्चा माल मिलता है ।  भूगर्भीय सर्वेक्षण विभाग के अनुसार भारत में खनिज सम्पदा वाले 50 क्षेत्र हैं और उन क्षेत्रों में लगभग 400 स्थलों पर खनिज मिलते हैं ।

भारत में लौह-अयस्क का बहुत विशाल भंडार है । भारत लोहा के अलावे मैंगनीज, क्रोमाईट, टाइटेनियम, मैग्नासाईट, केनाईट, सिलिमनाईट, परमाणु-खजिनों अभ्रक और बाक्साइट के मामले में न केवल आत्मनिर्भर है, बल्कि इनका बड़ी मात्रा में निर्यात भी करता है ।

भारत में खनिज सम्पदा का वितरण बहुत असमान है । दामोदर घाटी प्रदेश में पेट्रोलियम को छोड़कर खनिज सम्पदा का सर्वाधिक भंडार है जबकि मंगलौर से कानपुर की रेखा के पश्चिमी भाग के प्रायद्वीपीय क्षेत्र में खनिज के भंडार बहुत कम हैं । इस रेखा के पूर्व में धात्त्विक खनिज, कोयला, अभ्रक तथा कई गैर-धात्त्विक खनिजों के बड़े भंडार हैं ।

गुजरात और असम में पेट्रोलियम के समृद्ध भंडार हैं । राजस्थान में कई अधात्त्विक खनिजों के भंडार हैं । जम्मू-कश्मीर, पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, हिमाचल प्रदेश, त्रिपुरा, नागालैंड और पं. बंगाल में खनिज सम्पदाओं की कमी है ।

खनिज संपदा से विपन्न अन्य राज्य राजस्थान, तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल और मेघालय हैं । धात्त्विक एवं अधात्त्विक खनिजों तथा कोयला का अधिकांश उत्पादन बिहार और मध्य प्रदेश में होता है ।

भारत के प्रमुख खनिज एवं सर्वाधिक उत्पादक राज्यो की सूची

खनिज का नाम       सर्वाधिक उत्पादक राज्य
1-सोना                                  कर्नाटक
2-चाँदी                                  राजस्थान
3-जिप्सम                               राजस्थान
4-मैंगनीज                              उड़ीसा
5-लौह अयस्क                        झारखंड
6-कोयला                             झारखंड
7-अभ्रक                               झारखंड
8-बॉक्साइट                           उड़ीसा
9-मैगनीज                             उड़ीसा
10-लिग्नाइट                          तमिलनाडु
11-जस्ता                          राजस्थान (जवार खान)
12-हीरा                            मध्यप्रदेश (पन्ना खान)
13-यूरेनियम                        झारखंड
14-ताँबा                              झारखंड

खनिज अन्वेषण और विकास ( Mineral exploration )

भारत में खनिज संसाधनों के लिए भू-भौतिक अन्वेषण कठिन है, मुख्य रूप से उत्तर में, जहां जलोढ़ मिट्टी की परतंन रवेदार चट्टानों से घिरी हैं। पुरातन लावा प्रवाह एवं रेगिस्तान खनिज संसाधनों के प्रभावी अन्वेषण में एक अन्य बाधा है।

भारत सरकार ने खनिज संसाधनों के अन्वेषण एवं विकास के लिए कई संगठनों एवं संस्थानों का गठन किया है। उत्खनन को संविधि दर्जा देने के लिए वर्ष 1957 में खदान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम लागू किया गया।

भारतीय भूगर्भिक सर्वेक्षण (जीएसआई) सहित कई अन्य महत्वपूर्ण संगठन भारत में खनिज संसाधनों के अन्वेषण एवं विकास में संलग्न हैं। इसके अतिरिक्त मिनरल एक्सप्लोरेशन लिमिटेड (एमईसीएल) इंडियन ब्यूरो ऑफ माइन्स (आईबीएम), तथा सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम भी इस कार्य में शामिल हैं।

भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ( Geological Survey of India )

यह एक सर्वप्रमुख राष्ट्रीय एवं शोध संगठन तथा यह सरकार के उद्योग एवं सामन्यतया जनता को भू-विज्ञान सुचना प्रदान करने वाला है। साथ ही साथ अंतरराष्ट्रीय भू-वैज्ञानिक मंच पर सक्रिय सहभागी है।

1851 में स्थापित GSI भूवैज्ञानिक सूचनाओं एवं जानकारियों का संग्रह करता है, उन्हें अद्यतन रखता है और इसके लिए जमीनी, समुद्री तथा आकाशीय सर्वेक्षण करता है।

इंडियन ब्यूरो ऑफ माइंस ( Indian bureau of mines )

यह देश में खनिज संसाधनों के वैज्ञानिक विकास के संवर्धन में लगा हुआ है। खनिजों का संरक्षण और खानों में पर्यावरण की रक्षा, कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस, आण्विक खनिज और छोटे खनिजों को छोड़कर उनकी रक्षा करता है।

यह विनियामक कार्य करता है अर्थात् खनिज संरक्षण और विकास नियमावली, 1988 को लागू करना, खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 के संगत प्रावधानों को लागू करना, खनिज रियायत नियमावली, 1960 और पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 और उनके अधीन बनाए गए नियमों का प्रवर्तन करना।

मिनरल एक्सप्लोरेशन कारपोरेशन ऑफ इंडिया ( Mineral Exploration Corporation of India )

मिनरल एक्सप्लोरेशन ऑफ इंडिया (एमईसीएल) को सरकार द्वारा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम के रूप में 1972 में स्थापित किया गया है।इसका मुख्य उद्देश्य खनिज पदार्थों के व्यवस्थित अनुसंधान एवं खनिज पदार्थों के भविष्य एवं इसके संभावित दोहन के बीच सेतु बनाना है।

इसके मुख्य कार्य खनिज संसाधनों के अनुसन्धान के ली योजना प्रोत्साहन, संगठन एवं क्रियान्वयन कार्यक्रमों को तैयार करना है। एमईसीएल का मुख्यालय नागपुर में है।

राष्ट्रीय खनिज नीति ( National mineral policy )

नवीन राष्ट्रीय खनिज नीति मार्च 1993 में घोषित की गयी थी ।

खनिजों के दोहन एवं निर्यात में निवेश हेतु घरेलू तथा विदेशी कंपनियों पर कोई प्रतिबंध नहीं है। अब कोई भी विदेशी नागरिक किसी खनन कपनी में अंश धारण कर सकता है। खनन सम्बंधी पट्टों की अवधि में व्यापक स्थिरता की उपलब्धि को सुनिश्चित किया गया हैं।

नई खनिज नीति का निर्माण नवीन आर्थिक नीति के प्रकाश में किया गया है। सार्वजनिक क्षेत्र को खनिजों के दोहन में वृद्धि न ला सकने का जिम्मेदार माना गया है।

फरवरी 1997 में केंद्र सरकार द्वारा कोयला एवं लिग्नाइट खानों पर से राज्य एकाधिकार को समाप्त करने का निर्णय लिया गया।

कोयला खान (राष्ट्रीयकरण) अधिनियम, 1973 को संशोधित करके भारतीय कपनियों को कोयला एवं लिग्नाइट के खनन का अधिकार दिया गया है।

विदेशी कपनियां मात्र अंशधारिता के माध्यम से खनन कायों में भागीदार बन सकती हैं। तेल क्षेत्र को खनिज नीति में शामिल नहीं किया गया है, क्योंकि तेल खोज प्रक्रिया में निजी कंपनियों को पृथक् रूप से शामिल होने की अनुमति प्रदान की गयी है।

आणविक खनिजों (यूरेनियम आदि) को उनकी संवेदनशील प्रकृति के कारण खनिज नीति के दायरे से बाहर रखा गया है।

धात्त्विक खनिज ( Metallic mineral )

ये दो प्रकार के होते हैं:-

  • लौह- अयस्क, मैंगनीज-अयस्क, क्रोमोईट, पाईराईट, आदि लौह धात्त्विक खनिज हैं । भारत इनमें समृद्ध है ।
  • अलौह-  धात्त्विक खनिज में तांबा का अयस्क, बॉक्साइट, ईट, जिंक, शीशा, सोना, चाँदी आदि आते हैं।

बॉक्साइट को छोड़कर अन्य अलौह-धात्विक खनिजों में भारत का उत्पादन पर्याप्त नहीं है, जिससे इन खनिजों का आयात करना पड़ता है ।

1. लोहा ( Iron )

भारत में लौह-अयस्क का भंडार विश्व में मात्रा एवं गुणवत्ता दोनो आधार पर सर्वोत्कृष्ट है।  विश्व के कुल लौह भंडार का 10% भारत में है ।

भारत में पाये जाने वाले मुख्य लौह-अयस्क हेमाटाईट और मैग्नाटाईट हैं, जिनमें 60-70% तक लोहा मिलता है । इसलिए इनकी बहुत अधिक अंतर्राष्ट्रीय मांग है।

देश के लगभग हर राज्य में लौह-अयस्क मिलता है । लेकिन 96% लौह-अयस्क सिंहभूम (बिहार), उड़ीसा के ओनझार, तालचर, बोनई और मयूरभंज में, छत्तीसगढ़ के बैलाडीला में तथा कर्नाटक और गोवा में मिलता है ।

छत्तीसगढ़ के बैलाडीला और राजहरा के खानों से निकाला गया लौह अयस्क विशाखापट्टनम के बंदरगाह से भेजा जाता है । कर्नाटक के दोनईमलाई और कुद्रेमुख के खानों से निकाला गया लौह-अयस्क मंगलोर के बंदरगाह से दूसरे देशों को निर्यात किया जाता है ।

2. मैंगनीज ( Manganese )

मैंगनीज ( Manganese ) के अयस्क का भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है। मैंगनीज का इस्तेमाल लोहा-इस्पात एवं लौह-चुंबकीय मिश्र-धातुओं के निर्माण में होता है ।

मैगनीज ( Manganese )के सर्वाधिक भंडार कर्नाटक में है । इसके अतिरिक्त महाराष्ट्र के नागपुर और भंडारा तथा मध्य प्रदेश के बालाघाट और छिंदवाड़ा में भी इसके भंडार हैं ।

3. सोना ( Gold )

भारत में सोना खानों से भी मिलता है और रेत के कणों में भी बिखरे रूप में मिलता है । धारवाड़ के स्तरित चट्टानों वाले क्षेत्र में अधिकांश स्वर्ण-भंडार हैं ।

भारत में सोने के खान लार और हट्टी (रायचूर जिला) में हैं । ये दोनों खान कर्नाटक राज्य में हैं । कोलार (कर्नाटक) से निकला सोना भारतीय रिजर्व बैंक को बेचा जाता है ।

4. तांबा ( Copper )

भारत में तांबा की बहुत कमी है, जिससे तांबा का आयात करना पड़ता है । यह मुख्यतः बिहार के सिंहभूम, मोलाबानी और राखा, मध्यप्रदेश के बालाघाट और राजस्थान के खेतड़ी और अलवर में केन्द्रित है । हर साल लगभग 30-35 लाख टन तांबा निकाला जाता है ।

5. बॉक्साइट ( Bauxite )

यह एक एल्युमिनियम अयस्क है । एल्युमिनियम एक हल्की धातु है, जिसका उपयोग वायुयान, विद्युत-उपकरणों तथा दैनिक जीवन संबंधी अन्य वस्तुओं के निर्माण में होता है । भारत में बॉक्साइट का विपुल भंडार है ।

बॉक्साइट के अयस्क अधिकांशतः लेटेराईट क्षेत्रों में मिलते हैं । यह अधिकांशतः उड़ीसा, आन्ध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश (बालाघाट, जबलपुर) छत्तीसगढ़ (बिलासपुर), गुजरात, महाराष्ट्र (बेलगांव और थाणे) और बिहार (राँची और पलामू) में मिलता है ।

6. अभ्रक ( Asbestos )

अपने कई गुणों के कारण अभ्रक विद्युत एवं इलेक्ट्रॉनिक -उद्योग के लिए बहुत आवश्यक खनिज है यह अच्छा तापरोधी है और इसे आसानी से इच्छानुसार पतले-पतले चादरों में बाँटा जा सकता है ।

भारत अभ्रक का विश्व में सबसे बड़ा उत्पादक देश है, जो विश्व के कुल अभ्रक उत्पादन का 85% उत्पादित करता है । विष्व में अभ्रक का 60% व्यापार भारत करता है । अभ्रक के 60% भंडार अकेले बिहार में ही है । इसके अतिरिक्त यह झारखण्ड, आन्ध्रप्रदेष एवं राजस्थान में भी पाया जाता है ।

7. चूना पत्थर ( Limestone )

चूना-पत्थर ;(CaCo3) का उपयोग मुख्य रूप से सीमेंट उद्योग में होता है । मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश, गुजरात, बिहार, उड़ीसा, राजस्थान और कर्नाटक चूना-पत्थर के प्रमुख उत्पादक राज्य हैं।

8. जिप्सम ( Gypsum )

जिप्सम केलषियम का जलयोजित सल्फाइट है । इसका उपयोग मुख्यतः सीमेंट और एल्युमिनियम सल्फेट बनाने में होता है । इसके अलावा इसका उपयोग प्लास्टर आफ पेरिस तथा सेरेमिक उद्योग में भी होता है । राजस्थान (जोधपुर और बीकानेर) इसका मुख्य उत्पादक राज्य है । इसके बाद तमिलनाडु का स्थान है ।

9. परमाणु खनिज ( Atomic minerals )

यूरेनियम ( Uranium ) बिहार (जादूगोड़ा), हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ (बस्तर) में मिलता है।

थोरियम ( Thorium ) केरल तथा तमिलनाडु के तटीय बालू में मिलता है । बेरिलियम (परमाणु संयंत्रों के लिए एक अच्छा नियंत्रक) राजस्थान, तमिलनाडु, बिहार, कश्मीर और आन्ध्र प्रदेश में मिलता है ।

10. हीरा ( Diamond )

भारत में हीरा एकमात्र मध्य प्रदेश के पन्ना क्षेत्र में मिलता है । हीरे के भंडार वाली इस पन्ना-पट्टी में पन्ना, छतरपुर और सतना जिले आते हैं ।

11. नमक ( Salt )

साधारण नमक; जिसे सोडियम क्लोराईड भी कहते हैं, में 39.32: सोडियम और 60.68: क्लोरीन होता है । इसका 70: उत्पादन रसोई के काम आता है ।

प्रायद्वीपीय तट के समुद्री जल से, राजस्थान के शुष्क क्षेत्र की नमकीन झीलों (सांभर झील) से तथा गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चट्टानी जमावों से नमक का उत्पादन होता है ।

तटवर्तीय प्रदेशों; विशेषकर गुजरात और महाराष्ट्र के तटीय प्रदेशों में नमक का उत्पादन सबसे ज्यादा होता है ।

कपड़ा उद्योग (Textile Industry)

 कपड़ा उद्योग का महत्त्वः
भारत का सूती वस्त्र उद्योग देश का सबसे बड़ा ‘संगठित उद्योग’ है अतः संगठित उद्योगों में इसका प्रथम स्थान है।
कपड़ा उद्योग भारत का कृषि के बाद सबसे बड़ा रोजगार प्रदान करने वाला उद्योग है।
यही एकमात्र ऐसा उद्योग है जो कच्चे माल से लेकर तैयार माल के उत्पादन (जैसे सिले सिलाए वस्त्र) तक पूरी तरह आत्मनिर्भर है। कपड़ा उद्योग का महत्त्व निम्न आंकड़ों से समझा जा सकता हैः
देश के कुल औद्योगिक उत्पादन में कपड़ा उद्योग का अंशदान — 14%
सकल घरेलू उत्पादन में — 4%
कुल विनिर्मित औद्योगिक उत्पादन — 20%
कुल निर्यात में — 24.6%
कुल आयात खर्च में अंशदान — 3%
रोजाना सृजन की दृष्टि से इसका योगदान — 3.5 करोड़ लोगों को रोजगार प्रदान करता है।
प्रो- बुकानन के अनुसार, ‘सूती वस्त्र उद्योग भारत के प्राचीन युग का गौरव है तथा भविष्य की आशा है। जिस समय, वर्तमान में विकसित देशों में सभ्यता की शुरूआत हो रही थी उस समय भारत का वस्त्र उद्योग अपनी कला, सुन्दरता एवं उपयोगिता के लिए प्रसिद्ध था।’

कपड़ा उद्योग की प्रारंभ से अब तक की स्थितिः
भारत में प्रथम सूती कपड़ा मिल सन् 1818 में फोर्ट ग्लोस्टर (कलकत्ता) में स्थापित की गई परंतु यह मिल अपने लक्ष्य को प्राप्त न कर सकी।
भारत की दूसरी मिल ‘बंबई स्पिनिंग एंड वीविंग कम्पनी’ (Bombay Spinning and Weaving Company) बंबई में KGN Daber द्वारा सन् 1854 में स्थापित की गई। इसके बाद यह उद्योग लगातार विकसित होता रहा।
स्वतंत्रता के समय (13 अगस्त, 1947) भारत में कुल 394 सूती वस्त्र मिलें थी।
विभाजन के समय (14 अगस्त, 1947) 14 सूती वस्त्र मिलें पाकिस्तान वाले क्षेत्र में चली गई साथ ही कपास का उत्पादन करने वाले कुल क्षेत्र का 40% क्षेत्र पाकिस्तान में चला गया। यही कारण है कि भारत को कपास के आयात के क्षेत्र में कदम रखना पड़ा।
भारत सरकार ने कपड़ा विकास और विनियमन आदेश (Textiles Development and Regulation Order, 1993) के माध्यम से इस उद्योग को लाइसेन्स मुक्त कर दिया है।
देश का सूती कपड़ा उद्योग मुख्य रूप से महाराष्ट्र, तमिलनाडु एवं गुजरात में केन्द्रित है।
नोटः भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन व सूती वस्त्र उद्योग के विकास के बीच बड़ा ही घनिष्ठ संबंध रहा है। बंगाल विभाजन (16 अक्टूबर, 1905) के विरुद्ध चले स्वदेशी आंदोलन, असहयोग आंदोलन (1920–22), सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930–31), भारत छोड़ो आंदोलन (1942), आदि ने विदेशी वस्त्रें के बहिष्कार तथा स्वदेशी वस्त्रें का प्रचार करके सूती वस्त्र उद्योग के विकास में भरपूर सहयोग दिया।
कपड़ा मंत्रलय एवं कृषि मंत्रलय द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर ‘कपास प्रौद्योगिकी मिशन’ (Technology Mission of Cotton) का शुभारंभ 21 फरवरी, 2000 को किया गया। जिसके अन्तर्गत कपास अनुसंधान एवं विकास, विपणन तथा प्रसंस्करण से संबंधित 4 लघु मिशन शामिल है।
नोटः देश में सिले सिलाए वस्त्रें के निर्यात सवंर्द्धन के लिए एक वस्त्र पार्क (Apparel Park) की स्थापना तमिलनाडु में तिरूवर एट्टीवरम्पलायम गांव में की गई है। ₹ 300 करोड़ की अनुमानित लागत वाले देश के इस पहले वस्त्र पार्क का शिलान्यास 4 जुलाई, 2003 को किया गया। साथ ही इस गांव का नामकरण न्यू तिरूपुर किया गया है।

वस्त्र उद्योग के विकास के लिए सरकार ने निम्नलिखित योजनाएं प्रारंभ की हैं:
1 अप्रैल, 1999 को कपड़ा मंत्रलय द्वारा प्रौद्योगिकी उन्नयन निधि योजना (Technology Upgradation Fund Scheme—TUFS) की शुरूआत।
नोटः यह योजना 11 FYP के दौरान भी जारी रखने की स्वीकृति दी गई है।
हथकरघा गतिविधियों के विस्तार हेतु वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने के लिए अप्रैल, 2000 से ‘दीनदयाल हथकरघा प्रोत्साहन योजना’ प्रारंभ की गई।
सरकार ने कपड़ा उद्योग की बुनियादी संभावनाओं के क्षेत्र के विकास के लिए अगस्त, 2005 में एकीकृत कपड़ा पार्क के लिए योजना (Scheme for Integrated Textile Parks—STIP) योजना लागू की गई है जिसके अन्तर्गत वर्ष 2007 तक 25SITP स्थापना प्रस्तावित है तथा जिसमें ₹ 18,550 करोड़ का निवेश किया जाएगा।

चीनी उद्योग (Sugar Industry)

चीनी उद्योग का महत्त्वः
भारत में सूती वस्त्र के बाद ‘चीनी’ ही दूसरा सबसे बड़ा देश का कृषि आधारित उद्योग है। यह उद्योग अपने साथ कई सह उत्पादों (by products) से संबंधित उद्योगों को विकसित करने की क्षमता रखता है।

चीनी उद्योग का प्रारंभ से अब तक की स्थितिः
वर्ष 1950–51 में देश में कुल चीनी मिलों की संख्या 138 थी।
31 मार्च, 2008 के अंत में भारत में कुल चीनी मिलों को संख्या 615 थी जो 31 मार्च, 2009 के अंत तक बढ़कर 624 हो गई।
चीनी का उत्पादन वर्ष 2010–11 में रिकार्ड स्तर पर रहा। सरकार ने इस वर्ष के लिए 23 मिलियन टन उत्पादन रहने का अनुमान लगाया था जबकि ताजा आंकलन में यह उत्पादन 24.35 मिलियन टन रहने का अनुमान है। यह देश का अब तक का सर्वश्रेष्ठ उत्पादन है।
भारत में चीनी की वार्षिक खपत लगभग 23 मिलियन टन है। इस वर्ष उत्पादन 24–25 मिलियन टन के आस-पास रहने से इस वर्ष चीनी के निर्यात की भी संभावना है।
भारत में चीनी उत्पादन में महाराष्ट्र का प्रथम स्थान है साथ ही चीनी मिलों की सर्वाधिक संख्या महाराष्ट्र (134) में ही है।
विश्व रैकिंग में चीनी के उत्पादन में ब्राजील का प्रथम और भारत का द्वितीय स्थान है परंतु चीनी के उपभोग में भारत विश्व में शीर्ष स्थान पर है।
भारत में गन्ने की प्रति एकड़ उपज लगभग 15 टन है जो अन्य उत्पादक राष्ट्रों की तुलना में बहुत कम है।
भारत में उत्पादित गन्ने में चीनी का प्रतिशत 9% से 10% है जबकि अन्य राष्ट्रों में यह 13% से 14% तक है।

चीनी उद्योग की समस्याएं:
चीनी मिलों द्वारा कुल गन्ना उत्पादन का एक छोटा सा भाग ही प्रयुक्त कर पाना।
प्रति हेक्टेयर गन्ने की निम्न उत्पादकता।
उत्तम किस्म के गन्ने की कमी।
उत्पादन लागतों में वृद्धि।
मिलों के आधुनिकीकरण की समस्या।
मौसमी उद्योग।
अनुसंधान की कमी।
चीनी मिलों द्वारा कृषकों को गन्ने के मूल्य का पूरा-पूरा भुगतान न कर पाना।

महत्त्वपूर्ण सरकारी प्रयासः
20 अगस्त, 1998 से सरकार ने चीनी मिलों की स्थापना को लाइसेन्स मुक्त कर दिया।
केंद्र सरकार द्वारा गन्ने के मूल्य का निर्धारण करने के लिए सांविधिक न्यूनतम कीमत (Statutory Minimum Price—SMP) के स्थान पर उचित एवं लाभकारी मूल्य (Fair and Remunerative Price—FRP) को अपनाया गया।
चीनी उद्योग के विकास के लिए धन एकत्र करने हेतु 1982 में चीनी विकास निधि (Sugar Development Fund) की स्थापना की गई। यह कोष मिलों के आधुनिकीकरण एवं मिल क्षेत्रें में गन्ने के विकास के लिए आसान शर्तों पर ऋण प्रदान करने का कार्य करता है।
सरकार द्वारा चीनी के निर्यात को डिकनालीस (Decanalise) करने का निर्णय लिया गया है। जिसके अन्तर्गत चीनी मिलें सीधे ही चीनी का निर्यात कर सकेंगी।
नोटः इससे पहले चीनी के निर्यात का कार्य केवल भारतीय चीनी उद्योग और सामान्य निर्यात-आयात निगम (Indian Sugar and General Industry Export-Import Corporation—ISGIEIC) द्वारा संभव था।

महत्त्वपूर्ण संस्थानः
चीनी प्रौद्योगिकी के भारतीय संस्थान — कानपुर (उत्तर प्रदेश)
भारतीय चीनी अनुसंधान संस्थान — लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
भारतीय गन्ना प्रजनन संस्थान — कोयम्बटूर (तमिलनाडु)

रत्न एवं आभूषण उद्योग (Gems and Jewellery Industry)

रत्न एवं आभूषण उद्योग का महत्त्वः
वर्तमान में भारत द्वारा प्रमुख निर्यातित वस्तुओं में शीर्ष स्थान ‘रत्न एवं आभूषण उद्योग’ का ही है। इस क्षेत्र में भारत अंतर्राष्ट्रीय उत्पादन शृंखलाओं से जुड़ा हुआ है। जहां एक ओर भारत इन उद्योगों में प्रयोग होने वाले कच्चे माल का आयात, विदेशों से करता है तो दूसरी ओर तैयार रत्न एवं आभूषणों को निर्यात कर, विदेशी मुद्रा के अर्जन का कार्य कर रहा है।

वर्तमान स्थितिः
केंद्र सरकार द्वारा कर्नाटक, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और ओडिशा, आदि राज्यों में बहुमूल्य रत्नों के खनन (Mining) में तेजी लाने की योजना बनाई गई है।
केंद्र सरकार ने आंध्र प्रदेश में हीरों एवं अन्य बहुमूल्य खनिजों के अन्वेषण (Mining and Quarring) के लिए अनेक कम्पनियों को अनुमति प्रदान की है।
सरकार ने 1 अप्रैल, 2002 से अपरिष्कृत हीरों (Rough Diamonds) के आयात (Import) को लाइसेन्स मुक्त कर दिया है।
नोटः रत्न और आभूषण के मुख्य निर्यातक देश हैं—यू-एस-ए, हांगकांग, यूएई, बेल्जियम, इजरायल, जापान, थाइलैण्ड और यू-के
रत्न और आभूषण निर्यात के लिए मुख्य बाजार हैं—यू-एस-ए, हांगकांग, यूएई, बेल्जियम, इजरायल, जापान, थाइलैण्ड और यू-के

नोटः रत्नों व आभूषणों के निर्यात में सर्वाधिक भाग हैं:
तराशे हुए हीरो का।
स्वर्ण आभूषण का।
रंगीन नगीनों का।
भारत रत्न एवं आभूषणों का सर्वाधिक निर्यात अमेरिका को करता है।
भारत द्वारा कुल रत्न एवं आभूषणों का 70% भाग अमेरिका व यूरोपीय संघ को निर्यात किया जाता है।
विदेश व्यापार नीति (Foreign Trade Policy, 2009–14) के अनुसार, ‘भारत को हीरे का अंतर्राष्ट्रीय केंद्र बनाने के लक्ष्य से हीरा विनिमय (Diamond Exchange) को स्थापित करने की योजना है।

भारत के प्रमुख उद्योग (Important Industries in India)

लौह एवं इस्पात उद्योग (Iron and Steel Industry)
सीमेन्ट उद्योग (Cement Industry)
कोयला उद्योग (Coal Industry)
पेट्रोलियम उद्योग (Petroleum Industry)
कपड़ा उद्योग (Cloth Industry)
रत्न एवं आभूषण उद्योग (Gems and Jewellery Industry)
चीनी उद्योग (Sugar Industry)

लौह एवं इस्पात उद्योग (Iron and Steel Industry)

लौह इस्पात उद्योग का महत्त्व-
यह उद्योग अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है।
इसके महत्त्व को स्वीकार करते हुए पं- जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि, ‘लौह एवं इस्पात उद्योग आधुनिक सभ्यता का आधार है।’

लौह इस्पात उद्योग की प्रारंभ से अब तक की स्थिति (तालिका)-

क्र-सं-1.
उद्योग का नाम-बंगाल आयरन वर्क्स कम्पनीः ब्रिटिश संस्था द्वारा खोला गया एवं असफल रहा।
स्थापना वर्ष-1870
स्थान-झरिया के निकट कुलटी नामक स्थान (पश्चिम बंगाल)

क्र-सं-2.
उद्योग का नाम-टाटा आयरन एंड स्टील कम्पनी (TISCO)
स्थापना वर्ष-1907
स्थान-सिंहभूमि जिला जमशेदपुर (झारखंड)

क्र-सं-3.
उद्योग का नाम-इंडियन आयरन एवं स्टील कम्पनी (IISCO): TISCO & IISCO निजी क्षेत्र की कम्पनी थी जिसकी स्थापना का श्रेय जमशेदजी नोशेरवान जी टाटा को जाता है।
स्थापना वर्ष-1919
स्थान-हरिपुर नामक स्थान (आसनसोल बंगाल)

क्र-सं-4.
उद्योग का नाम-विश्वेश्वरैया आयरन एंड स्टील वर्क्सः सार्वजनिक क्षेत्र की पहली इकाई
स्थापना वर्ष-1923
स्थान-भद्रावती नामक स्थान, मैसूर (कर्नाटक)

स्वतंत्रता के समय से भारत में उपरोक्त तीनों स्टील प्लान्ट कार्यरत हैं।
वर्ष 1955 में 3 बड़े स्टील प्लान्ट लगाने के समझौते किए गए।

भिलाई स्टील प्लान्ट (वर्तमान में छत्तीसगढ़)—सोवियत संघ के सहयोग से स्थापित

राउरकेला स्टील प्लान्ट (उड़ीसा में)—पश्चिमी जर्मनी के सहयोग से स्थापित

दुर्गापुर स्टील प्लान्ट (प- बंगाल में) —ब्रिटेन के सहयोग से स्थापित
उपरोक्त तीनों सार्वजनिक क्षेत्र के कारखानों में उत्पादन कार्य 1956 (II FYP) से प्रारंभ हुआ।
तीसरी पंचवर्षीय योजना में सोवियत संघ (USSR) के सहयोग से बोकारो (अब झारखंड में) में एक और स्टील प्लान्ट की स्थापना का कार्य प्रारंभ हुआ।
चौथी पंचवर्षीय योजना में सलेम (तमिलनाडु), विशाखापत्तनम (आंध्र प्रदेश) एवं विजय नगर (कर्नाटक) में नए इस्पात कारखाने स्थापित कर उत्पादन क्षमता में वृद्धि करने का प्रयास किया गया।
पांचवीं पंचवर्षीय योजना में सरकार ने भारतीय स्टील अथॉरिटी (Steel Authority of India—SAIL) की स्थापना 1974 में की तथा इसे भारत में इस्पात उद्योग के विकास की जिम्मेदारी दी गई।

 वर्तमान में SAIL के स्वामित्व में निम्नलिखित सार्वजनिक क्षेत्र हैं:
Durgapur, Rourkela, Bokaro, Burahpur Steel Plant, Alloy Steel Plant, Durgapur, Salem Steel Plant, Maharshtra Electrosmelt Ltd. (mini iron plant) and Visvesvaraya Iron and Steel Ltd.

वित्तीय वर्ष 2006–07 से 2010–11 के दौरान क्रूड स्टील (कच्चा इस्पात) के उत्पादन में 84% की चक्रवृद्धि वार्षिक दर (Compound Annual Rate) से वृद्धि हुई।
विश्व स्टील एसोसिएशन (World Steel Association—WSA) के ताजा आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2010 में भारत में इस्पात उत्पादन 68.3 मिलियन टन रहा।
ताजा आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2011 में इस्पात उत्पादन के क्षेत्र में शीर्ष 4 देश है—(1) चीन,(2) जापान, (3) अमेरिका, (4) भारत।
26 जुलाई, 2011 को पांचवें भारतीय इस्पात शिखर सम्मेलन (नई दिल्ली) में केंद्रीय इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा ने इस्पात उत्पादन का लक्ष्य 2020 तक 150 मिलियन टन करने का लक्ष्य रखा है (2013 तक 120 मिलियन टन पहुंचने की सम्भावना है)।
इस उद्योग में लगभग ₹ 90,000 करोड़ की पूंजी लगी हुई है और 5 लाख से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिल रहा है।

प्रमुख योजनाएं (Main Planning)
विशाखापत्तनम इस्पात परियोजनाः
दक्षिण में आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम बंदरगाह के पास स्थापित है (तट के निकट स्थापित भारत की पहली इस्पात योजना)
इस संयंत्र की वार्षिक क्षमता 30 लाख टन क्रूड स्टील की है। अगस्त, 1992 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पी- वी- नरसिंह राव ने यह संयंत्र राष्ट्र को समर्पित किया।

पोस्को की इस्पात परियोजनाः
ओडिशा में जगतसिंहपुर में 12 मिलियन टन सालना क्षमता वाली दक्षिण कोरिया की कम्पनी POSCO की महत्त्वाकांक्षी योजना है।
इस योजना में ₹ 51 हजार करोड़ के निवेश के लिए पोस्को इस्पात कम्पनी और ओडिशा सरकार के मध्य वर्ष 2005 में समझौता हुआ जिसकी मंजूरी 2007 में दी गई। पर्यावरणविदों के भारी विरोध के चलते 2010 पर इस योजना पर रोक लगा दी गई तथा मीन गुप्ता की अध्यक्षता में 4 सदस्यीय समिति का गठन किया गया।
इस समिति की संस्तुति को स्वीकार हुए 31 जनवरी, 2011 को इसे पर्यावरणीय मंजूरी दी गई। 30 मार्च, 2012 में राष्ट्र हरित न्यायाधिकरण (Nation Green Tribunal) ने पुनः इस पर रोक लगा दी है।
नोटः वर्ष 2014 में पोस्को की इस्पात योजना को कार्य करने की मंजूरी दे दी गयी।

सीमेन्ट उद्योग (Cement Industry)

सीमेन्ट उद्योग का महत्त्वः
वर्तमान में भारतीय सीमेन्ट उद्योग, विश्व में सीमेन्ट के उत्पादन में न केवल दूसरे स्थान पर है, बल्कि विश्वस्तरीय गुणवत्ता का सीमेन्ट भी उत्पादित करता है।

सीमेन्ट उद्योग का प्रारंभ से अब तक की स्थितिः
वर्ष 1904 में सर्वप्रथम मद्रास (अब चेन्नई) में भारत का पहला सीमेन्ट कारखाना खोला गया जो असफल रहा किंतु 1912–14 के मध्य 3 बड़े सीमेन्ट कारखाने खोले गएः
पोरबंदर (गुजरात)।
कटनी (मध्य प्रदेश)।
लाखेरी।

भारत की सीमेन्ट कम्पनियां हैं:
बिरला सीमेन्ट, जे-पी- सीमेन्ट, एसीसी सीमेन्ट और बांगर सीमेन्ट।

कोयला उद्योग (Coal Industry)

कोयले का महत्त्वः

भारतीय कोयला उद्योग एक आधारभूत उद्योग है जिस पर अन्य उद्योगों का विकास निर्भर करता है। वर्तमान समय में शक्ति के साधन (Source of energy) के रूप में कोयला उद्योग का महत्त्व बहुत अधिक बढ़ जाता है।

नोटः भारत में कुल विद्युत उत्पादन क्षमता में:

तापीय ऊर्जा (Thermal Power) : 1,32,013 MW
जल विद्युत : 38,991 MW
नाभकीय विद्युत : 4780 MW
अन्य स्त्रोत : 24,503 MW
कुल विद्युत उत्पादन क्षमता : 2,00,287 MW

अप्रैल, 2012 में झज्जर (हरियाणा) में 660 MW की नई इकाई का उत्पादन भी सम्मिलित है।
भारत में कुल ऊर्जा के उत्पादन में कोयले का अंश लगभग 67% है।

भारत में दो कोयला उत्पादन क्षेत्र हैं:

गोंडवाना कोयला क्षेत्रः
पश्चिम बंगाल, बिहार, उड़ीसा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश।
भारत में प्राप्त कुल कोयले का 98% भाग गोंडवाना क्षेत्र से ही प्राप्त होता है।
इस क्षेत्र से एन्थ्रेसाइट और बिटुमिनस किस्म के कोयले प्राप्त होते हैं।

टर्शियरी कोयला क्षेत्रः
जम्मू-कश्मीर, राजस्थान, तमिलनाडु, आसाम, मेघालय और उत्तर प्रदेश।
भारत में प्राप्त कुल कोयले का 2% भाग टर्शियरी कोयला क्षेत्र से प्राप्त होता है।
इस क्षेत्र से लिग्नाइट किस्म का कोयला प्राप्त होता है जिसे ‘भूरा कोयला’ भी कहते हैं।

कोयला उद्योग की वर्तमान स्थितिः
भारतीय भूगर्भ सर्वेक्षण के अनुसार, ‘भारत में 1 अप्रैल, 2011 तक सुरक्षित कोयले का भंडार 285.87 अरब टन है।’
कोयला उद्योग में ₹ 800 करोड़ की पूंजी विनियोजित है तथा यह 7 लाख से अधिक लोगों को रोजगार मुहैया कराता है।
भारत में कोयले के सर्वाधिक भंडार वाले राज्य (जनवरी, 2008 के अनुसार) हैं—
(1) झारखंड, (2) उड़ीसा, (3) छत्तीसगढ़, (4) पश्चिम बंगाल और (5) आंध्र प्रदेश।

भारत के प्रमुख कोयला क्षेत्र हैं—
रानीगंज, झरिया, पू- और पश्चिम बोकारो, तवाघाटी, जलचर, चन्द्रान्वर्धा और गोदावरी की घाठी।

वर्तमान समय में भारतीय कोलया उद्योग का संचालन एवं नियंत्रण सार्वजनिक क्षेत्र की दो प्रमुख संस्थाएं करती हैं:
कोल इंडिया लि- (Coal India Ltd.—CIL):
कोयले के कुल उत्पादन के लगभग 86% भाग पर नियंत्रण यह एक धारक कम्पनी है। इसके अधीन 7 कम्पनियां कार्यरत हैं।
नोटः 8 अप्रैल, 2011 को CIL को महारत्न (Maharatna Status) का दर्जा प्राप्त हुआ।

सिंगरैनी कोलारीज क- लि- (Singareni Collieries Company Ltd.—SCCL)
यह आंध्र प्रदेश सरकार तथा केंद्र सरकार का संयुक्त उपक्रम (Joint venture) है।
कोयले के कुल उत्पादन का लगभग 10% भाग इस कम्पनी से प्राप्त होता है।

नोटः भारत में सर्वाधिक लिग्नाइट (Lignite) किस्म का कोयला पाया जाता है।

पेट्रोलियम उद्योग (Petroleum Industry)

पेट्रोलियम उद्योग का महत्त्वः 
भारत में पेट्रोलियम उद्योग का महत्त्व उसकी मांग एवं पूर्ति से लगाया जा सकता है। देश में कच्चे तेल का कुल भंडार 75.6 करोड़ टन अनुमानित है। परंतु फिर भी भारत अपनी कुल आवश्यकता का मात्र 20% भाग ही स्वदेशी उत्पादन द्वारा प्राप्त कर पाता है।

पेट्रोलियम उद्योग का प्रारंभ से अब तक की स्थितिः

वर्ष 1956 तक भारत में केवल एक ही खनिज तेल उत्पादन क्षेत्र विकसित थी जो डिग्बोई असम में था। डिग्बोई के जिस तेल कुएं से तेल निकाला गया था वहां से आज भी तेल निकाला जा रहा है।
वर्तमान में भारत असम, त्रिपुरा, मणिपुर, पश्चिम बंगाल, मुम्बई, गुजरात, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, राजस्थान, केरल के तटीय प्रदेशों तथा अंडमान एवं निकोबार से खनिज तेल प्राप्त करने का कार्य कर रहा है।
भारत में तेल की खोज और इसके उत्पादन का काम व्यापक और व्यवस्थित रूप से 1956 में तेल और प्राकृतिक गैस आयोग (Oil and Natural Gas Commission—ONGC) के स्थापना के बाद प्रारंभ हुआ। इसी क्रम में ऑयल इंडिया लि- (Oil India Limited—OIL) सार्वजनिक क्षेत्र की दूसरी कम्पनी बन गई।
नोटः 1 फरवरी, 1994 में तेल और प्राकृतिक गैस आयोग (Oil and Natural Gas Commission) का नाम बदलकर Oil and Natural Gas Corporation कर दिया गया।
1999 में केंद्र सरकार ने तेल एवं गैस की खोज एवं उत्खनन (Quarrying) के लिए लाइसेंस प्रदान करने की नई नीति न्यू एक्सप्लोरेशन लाइसेंसिंग पॉलिसी (New Exploration Licensing Policy—NELP) तैयार की है।
NELP के 9वें दौर के तहत 33 तेल ब्लाकों के लिए बोलियां लगाने की तिथि 15 अक्टूबर, 2010 से 18 मार्च, 2011 के दौरान सरकार द्वारा आमंत्रित की गई थी जिनमें से 16 ब्लाक आवंटित कर दिए गए हैं।
वर्तमान में देश में 21 Oil Refineries हैं जिनमें 17 सार्वजनिक क्षेत्र, 3 निजी क्षेत्र एवं 1 संयुक्त क्षेत्र की है।
नोटः भारत सरकार NELP के बाद तेल की खोज व उत्खनन के लिए ओपेन एक्रीएज लाइसेन्सिग पॉलसी लाने का सरकार का इरादा है। जिसके तहत तेल कम्पनी कोई भी नया ब्लाक स्वतः ही चुनकर तेल उत्खनन हेतु अपना प्रस्ताव सरकार को प्रस्तुत कर सकेगी अतः उन्हें NELP के तहत सरकारी पेशकश की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी।
प्राकृतिक गैस उत्पादन के मामले में देश की निजी कम्पनी ‘रिलायंस इंडस्ट्रीज लि-’ देश की अग्रणी कम्पनी बन गई है।
रिलायंस ने कृष्णा गोदावरी बेसिन् (K.G. Bassein) के D-6 क्षेत्र से 2010 के अंत तक 80 मिलियन स्टैण्डर्ड क्यूबिक मीटर पर डे (MSCMD) गैस का उच्चतम उत्पादन स्तर प्राप्त करने की संभावना है।
भारत में दूसरे स्थान पर प्राकृतिक गैस का उत्पादन सार्वजनिक क्षेत्र की ओएनजीसी (ONGC) द्वारा किया जाता है। ONGC प्राकृतिक गैस का उत्पादन मुख्यतया दो तेल क्षेत्रें Bombay Hai व Bassein से किया जाता है। वर्ष 2009 में ONGC का उत्पादन स्तर 49.6 mscmd का है।
तीसरे स्थान पर प्राकृतिक गैस का उत्पादन BG ग्रुप करता है जिसका मुक्ता (पन्ना) व ताप्ती तेल क्षेत्रें से लगभग 16 mscmd उत्पादन का स्तर है।
भारत में खनिज तेल की आत्म निर्भरता हेतु काली क्रांति (Black Revolution) का प्रारंभ किया जा रहा जिसके अन्तर्गत पेट्रोल में ऐथनाल का मिश्रण 10% बढ़ाने तथा बायोडीजल (जेट्रोफा) का उत्पादन करने की सरकार की योजना है। बायोडीजल के उत्पादन का कार्य ग्रामीण विकास मंत्रलय (Ministry of Rural Development) को दिया गया।

नवीनतम तेल परिशोधनशाला (Latest Rectification House)

भारत की नवीनतम तेल परिशोधनशाला निम्नलिखित हैं:
बीना ऑयल रिफाइनरीः
ध्य प्रदेश के सागर जिले में 20 मई, 2011 को प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह द्वारा इसका उदघाटन हुआ।
यह भारत पेट्रोलियम कारपोरेशन लि- (BPCI) व ओमान ऑयल कम्पनी (BOL) का संयुक्त उपक्रम है।
इसमें 1% हिस्सेदारी MP Govt. की, 26% हिस्सेदारी ओमान ऑयल कम्पनी तथा शेष 73% हिस्सेदारी भारत पेट्रोलियम कार्पोरेशन लि- की है।
वर्ष 2015–16 में इस रिफाइनरी की क्षमता 150 लाख टन करने की योजना है।

गुरू गोविन्द सिंह रिफाइनरीः
पंजाब के भटिंडा में स्थित इस रिफाइनरी का उदघाटन 28 अप्रैल, 2012 को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने किया।
यह सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनी हिंदुस्तान पेट्रोलियम कारपोरेशन लि- (HPCL) तथा लक्ष्मी निवास मित्तल की मित्तल एनर्जी इन्वेस्टमेंट प्राइवेट लि- का संयुक्त उपक्रम है।
इस रिफाइनरी (Refinery) के प्रारंभ होने से भारत में कुल तेलशोधन क्षमता 213 मिलियन मीट्रिक टन सलाना (MMTPA) हो गया है।

अन्य रिफाइनरीः
ONGC द्वारा 3 रिफायनरियां स्थापित करने की योजना है—(1) मंगलौर (कर्नाटक), (2) काकीनाड़ा (आंध्र प्रदेश) और (3) बाड़मेर (राजस्थान)।
IOC द्वारा 2 रिफायनरियां स्थापित करने की योजना है—(1) एन्नोर (तमिलनाडु) और (2) पाराद्वीप में।

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My Name is Jitendra Singh (Rana) और मैं एक सफल शिक्षक बनने की तैयारी कर रहा हूं ! और मैं लखनऊ, उत्तर प्रदेश (भारत) से हूँ।
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