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भारत की प्राकृतिक वनस्पति एवं मिट्टियां(Natural vegetation and soil of India)

भारत की प्राकृतिक वनस्पति एवं मिट्टियां(Natural vegetation and soil of India)

प्राकृतिक वनस्पति : एक नजर से

वनस्पति से तात्पर्य पादप वर्गों के समूह से है । जो जैव पारिस्थिकीय तंत्र का निर्माण करता है ।
भारत की राष्ट्रीय वन नीति के अनुसार भौगोलिक क्षेत्रफल के 33 प्रतिशत भाग पर वन होना अनिवार्य है ।

वनों के प्रकार व वितरण

1. सदाबहार वन –
ये वन देश के उन भागों में मिलते हैं , जहां औसत वर्षा 200 से.मी. से अधिक तथा वार्षिक औसत तापमान 24 डिग्री से.ग्रे. के लगभग रहती है ।
इसके तीन प्रमुख क्षेत्र है –
1. पश्चिमी घाट के पश्चिमी ढाल
2. अंडमान – निकोबार द्वीप समूह
3. उत्तरी – पूर्वी भारत में बंगाल , असम , मेघालय और तराई प्रदेश ।
सदाबहार वनों में रबर , महोगनी , एबोनी , लौह – काष्ठ , जंगली आम , ताड़ आदि वृक्ष व बांस तथा कई प्रकार की लताएं पायी जाती है ।
इस प्रकार जे वनों की ऊंचाई 30 – 45 मीटर तक होती है ।
सदाबहार वनों की सघनता इतनी अधिक होती है कि धरातल पर सूर्य का प्रकाश नही पहुंच पाता ।
इस प्रकार के वृक्षो का शोषण कम होता है क्योंकि इनकी लकड़ी कठोर व न बिकाऊ होने के कारण आर्थिक दृष्टि से ज्यादा उपयोगी नही होती है।
उत्तरी सहाद्रि प्रदेश में इन वनों को ‘ शोला वन ‘ के नाम से जाना जाता है ।

2. पतझड़ी / पर्णपाती / मानसूनी वन –
ऐसे वन उन भागो में पाए जाते हैं , जहां 100 -200 से.मी. तक औसत वार्षिक वर्षा होती है ।
इनकी ऊंचाई 25 – 35 मीटर होती है ।
इन वनों के प्रमुख वृक्ष साल ,सागवान , नीम, चन्दन (सर्वाधिक कर्नाटक में ) , रोजवुड , आंवला , शहतूत , एबोनी , आम , शीशम , बांस आदि है ।
ये वन उत्तरी पर्वतीय क्षेत्र के निचले भाग , विंध्याचल व सतपुड़ा पर्वत , छोटा नागपुर व असम की पहाड़ियां , पूर्वी घाट के दक्षिणी भाग एवं पश्चिमी घाट का पूर्वी क्षेत्र में पाये जाते है ।
इनकी लकड़ी कठोर नही होती है ये वन आर्थिक दृष्टि से अधिक उपयोगी होते है ।
अधिक दोहन के कारण इन वनों का क्षेत्र दिन – प्रतिदिन घटता जा रहा है ।

3. उष्ण कटिबंधीय शुष्क वन –
ये वन उन क्षेत्रों में पाए जाते हैं , जहां वर्षा का औसत 50 – 100 से.मी. तक होता है ।
इन क्षेत्रों में जल की कमी सहन करने वाले वृक्षों की बहुतायता मिलती है ।
इन वनों की जड़े लंबी व मोटी होती है ।
ये वन मुख्यत दक्षिणी – पश्चिमी पंजाब , हरियाणा , पूर्वी राजस्थान व दक्षिणी – पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पाए जाते है ।
इन वनों के प्रमुख वृक्ष कीकर , बबूल , नीम , आम , महुआ , करील , खेजड़ी आदि है ।
इन वनों की ऊंचाई 6 – 9 मीटर होती है ।
इनका उपयोग केवल स्थानीय महत्व के लिए किया जाता है ।

4. मरुस्थलीय वन –
ये वन 50 से.मी. से कम वर्षा वाले भागों में पाए जाते है ।
यहाँ के वृक्षों में पत्तियां कम , छोटी तथा काँटेदार होती है ।
बबूल यहां बहुतायत में मिलते है तथा नागफनी , रामबांस , खेजड़ी ,खैर , खजूर आदि भी यहां की प्रमुख वनस्पति है ।
ये वन मुख्यत दक्षिणी – पश्चिमी पंजाब , पश्चिमी राजस्थान , गुजरात , मध्य प्रदेश आदि राज्यों में पायी जाती है ।
इनका उपयोग भी स्थानीय महत्व के लिए किया जाता है ।

5. ज्वारीय / डेल्टाई / मैनग्रोव वन –
इन्हें दलदली वन भी कहा जाता है ।
ये वन महानदी , गोदावरी , कृष्णा , कावेरी आदि प्रायद्वीपीय नदियों के मुहानों पर तथा गंगा – ब्रह्मपुत्र के डेल्टाई ( सुन्दरी वृक्ष के कारण इन्हें सुंदरवन डेल्टा भी कहते है ) भागों में पाए जाते है ।
इन क्षेत्रों में बांस , नारियल , ताड़ , हैरोटीरिया , राइजोफोरा , सोनेरेशिया आदि वृक्ष पाए जाते है ।
ज्वारीय वन समुंद्री कटाव को रोकते हैं एवं इनकी लकड़ियाँ मुलायम होती है ।

6. पर्वतीय / शोलास वन –
इस प्रकार के वन दक्षिणी भारत में महाराष्ट्र के महाबलेश्वर तथा मध्य प्रदेश के पचमढ़ी आदि ऊंचे भागो में 1500 मीटर  की ऊंचाई पर पाए जाते हैं ।
पर्वतीय वनों की ऊंचाई 15 – 18 मीटर होती है ।
वृक्ष मोटे तने वाले होते है , जिनके नीचे सघन झाड़ियां मिलती है ।
अधिक ऊंचे भागों में यूजेनिया , मिचेलिया व रोडेनड्रान्स आदि वृक्ष मिलते है ।
1000 -2000 मीटर की ऊंचाई पर चौड़ी पत्ती वाले ओक तथा चेस्तनत , 1500 -3000 मीटर की ऊंचाई पर शंकुधारी वृक्ष जैसे देवदार , स्प्रूस , चीर आदि तथा 3500 मीटर से अधिक ऊंचाई पर अल्पाइन वनस्पति जैसे सिल्वर फर , बर्च ,जूनिपर आदि पाए जाते है ।

ध्यातव्य रहे – मैंग्रोव वन या कच्छ वन भारत के वे वन होते हैं , जो तटीय क्षेत्रों के लवणीय जल में पाए जाते है ।
‘ वन स्थिति रिपोर्ट , 2005 ‘ के अनुसार भारत में कुल मैंग्रोव वन 4445 वर्ग किमी. है । यह कुल भौगोलिक क्षेत्रफल के 0.14% के बराबर है ।

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