इतिहास (प्राचीन) नोट्स/ सामान्य अध्ययन

मौर्य वंश ( Mauryan dynasty 322-185 ईसा पूर्व )

मौर्य वंश ( Mauryan dynasty 322-185 ईसा पूर्व )

मगध साम्राज्य के पश्चात मौर्य काल का प्रादुर्भाव हुआ मगध काल का अंतिम शासक धनानंद था यह सिकंदर महान का समकालीन था सिकंदर के जाने के पश्चात मगध में अशांति फैल गई फलस्वरूप चंद्रगुप्त मौर्य ने चाणक्य (विष्णुगुप्त )की सहायता से मगध सत्ता पर अधिकार कर लिया और मौर्य साम्राज्य की स्थापना की
चंद्रगुप्त मौर्य ने धीरे-धीरे चाणक्य की सहायता से संपूर्ण भारत को राजनीतिक एकता के सूत्र में पिरोया मौर्य साम्राज्य भारत का प्रथम व्यापक तथा भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे विशाल साम्राज्य था मौर्य साम्राज्य हिंदुकुश पर्वत से कावेरी नदी तक फैला था  मौर्य काल में सर्वप्रथम सुदृढ़ प्रशासनिक व्यवस्था की स्थापना की गई जिसे सम्राट अशोक ने “जियो और जीने दो” के सिद्धांत पर आगे बढ़ाया

पूर्व काल के बौद्ध लेखक भी मौर्यों को क्षत्रिय जाति के सदस्य समझते थे और उनका उल्लेख पिप्पलिवन के छोटे गणतंत्र की शासक -जाति के रूप में करते हैं, जो शायद नेपाल की तराई में रूम्मिनदेई और गोरखपुर जिले के कसिया के बीच में बुद्ध के समय निवास करते थे ।
चन्द्रगुप्त के लिए बृषल उपनाम विशाखदत्त के मुद्राराक्षस नामक संस्कृत नाटक में लिखा गया है, जो सदा शूद्रों के लिए प्रयोग नही किया गया था ।यह क्षत्रिय व अन्य लोगों के लिए भी कहा गया है जो कि ब्राह्मण धर्मग्रंथों के कथित नियमों का पालन नहीं करते थे ।

मौर्य प्रशासन केंद्रीय राजतंत्रात्मक प्रशासन था जिसने पहली बार भारत को राजनीतिक एकता के सूत्र में बांधा। अर्थशास्त्र में राजा को परामर्श दिया गया है कि वह संपूर्ण शक्ति को अपने हाथों में ग्रहण करें। प्राचीन भारत में सबसे विस्तृत नौकरशाही मौर्य काल में थी अर्थव्यवस्था पर राजकीय नियंत्रण सर्वाधिक था।

” प्रजा के सुख में राजा का सुख है और प्रजा की भलाई में उस की भलाई राजा को जो अच्छा लगे वह हितकर नहीं है वरन हितकर वह है जो प्रजा को अच्छा लगे” -अर्थशास्त्र

कोटिल्य ने राज्य के सप्तांग बताए हैं।
1 राजा
2 अमात्य
3 राष्ट्र
4 दुर्ग
5 बल (सेना)
6 कोष
7 मित्र

कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में मंत्रिपरिषद को एक वैधानिक आवश्यकता मानते हुए कहा है कि “राज्य एक पहिए पर नहीं चल सकता।” मंत्रिपरिषद के सदस्यों को 12000 पण वार्षिक मिलते थे जबकि मंत्रियों के सदस्यों को 48000 पण वार्षिक वेतन मिलता था। मंत्रिण बहुत ही विश्वसनीय व्यक्तियों की एक छोटी होती थी जिससे जिसमें प्रायः 3 – 4 व्यक्ति होते थे।

अशोक के अभिलेखों में मंत्रिपरिषद को परिषा कहा जाता कहा गया है।राजा को प्रशासन में मदद देने के लिए 18 पदाधिकारियों का एक समूह होता था जिसे तीर्थ कहा जाता था यह अमात्य भी कहे जाते थे। सबसे महत्वपूर्ण तीर्थ मंत्री एवं पुरोहित थे मंत्रियों की नियुक्ति हेतु उनके चरित्र को जांचा परखा जाता था जिसे उपधा परीक्षण कहते थे।

युक्त तथा उपयुक्त केंद्रीय तीर्थ एवं अध्यक्षों के नियंत्रण में कार्य करते थे इनके द्वारा केंद्रीय व स्थानीय शासन के बीच संपर्क बना रहता था।मंत्रिपरिषद के नीचे द्वितीय श्रेणी के पदाधिकारी थे जिन्हें अध्यक्ष कहा जाता था। अर्थशास्त्र में 26 अध्यक्षों का उल्लेख है।

मौर्य वंश की उत्पत्ति के कारण

मगध पर कुटिल और क्रूर शासक धनानंद का राज्य था उसने चाणक्य के काले वर्ण और चेचक के दागों से युक्त चेहरे के कारण उसे एक राजभोग में अपमानित कर दिया था चाणक्य ने उसी समय अपनी शिखा खोलकर घोषणा कर दी कि नंद वंश का नाश करके अपनी शिखा बांधेगा और इसी खोज में उन्होंने मुरा के पुत्र जिसे चाणक्य नंद का क्षत्रिय राजयुवक स्वीकार करते हुए अपने साथ लिया उसे राजनीति और युद्ध कला में प्रवीण करके नंद वंश के नाश के लिए तैयार किया

इतिहासकार मार्शल महोदय ने सांची के पूर्वी गेटों की चित्रकारी के आधार पर मोर पक्षी के चित्र बने हुए हैं निष्कर्ष निकलता है कि संभवत मोर पक्षी मौर्य वंश का राज्य चिन्ह था और इस राज्य के कारण वंश का नाम मौर्य वंश पड़ा

मौर्य साम्राज्य की स्थापना भारतीय इतिहास के एक युग का अंत और दूसरे युग का आरंभ करता था जिसका अंत होता है उसे अनैतिहासिक और जिसका आरंभ होता है उसे ऐतिहासिक युग कहते हैं

स्मिथ ने इस युग की प्रशंसा करते हुए लिखा है मौर्य राजवंश का प्रार्दुभाव इतिहासकार के लिए अंधकार से प्रकाश की मार्ग का निर्देश करता है इस काल का तिथि क्रम निश्चित हो जाता है चंद्रगुप्त मौर्य के प्रयासों से पूर्व भारतीय राज्यों के असंख्य टुकड़े संयुक्त हो जाते हैं पहले राज्य में राज्य करने वाले राजा कहलाते थे चंद्रगुप्त सम्राट का अधिकारी बन गया

मौर्य काल की तिथि निश्चित है मौर्य काल का इतिहास को जानने के साधन बहुत ठोस और व्यापक है इस काल का इतिहास जानने के लिए धार्मिक ग्रंथों के अतिरिक्त अन्य साधन भी है जैसे की ऐतिहासिक ग्रंथ, विदेशी विवरण, अभिलेख आदि प्राप्त हुए हैं

मौर्य वंश पर प्रकाश डालने वाले ऐतिहासिक ग्रन्थ

कौटिल्य का अर्थशास्त्र महत्वपूर्ण ग्रंथ है कोटिल्य को चाणक्य, विष्णुदत्त तथा अन्य नामों से पुकारा जाता है कौटिल्य का अर्थशास्त्र विशुद्ध राजनीतिक ग्रंथ है और उससे मौर्यकालीन इतिहास का पर्याप्त ज्ञान प्राप्त हो जाता है मौर्यकालीन इतिहास को जानने के लिए दूसरा साधन मुद्राराक्षस नामक नाटक है इसका रचनाकार विशाखदत्त है यह एक ऐतिहासिक नाटक है और मौर्य काल के प्रारंभिक इतिहास को जानने में बड़ा सहायक सिद्ध होता है

कालिदास की अभिज्ञान शाकुंतलम्, मेघदूत वगैरह तथा कश्मीरी लेखक कल्हण की राजतरंगिणी, महर्षि पतंजलि के महाभाष्य भी मौर्य इतिहास पर प्रकाश डालते हैं

विदेशी इतिहासकारों में मेगस्थनीज नामक लेखक यूनानी राजदूत था वह मौर्य की राजधानी पाटलिपुत्र में कई वर्ष तक रहा मौर्यकाल को इन्होंने क्रमबद्ध और तिथि क्रम सहित लिखा, चीनी यात्रियों में फाह्यान और व्हेनसांग तथा तिब्बती लेखकों में तारानाथ का नाम अग्रगण्य है

मौर्यकालीन इतिहास जानने के अत्यंत विश्वसनीय और प्रामाणिक साधन अभिलेख है सम्राट अशोक ने स्तम्भो, शिलाओं तथा गुफाओं की दीवारों पर अनेक लेख लिखवाएं हैं जो आज भी उसकी कृति का गान कर रहे हैं मौर्य साम्राज्य का तीसरा शासक अशोक था जो चंद्रगुप्त का पौत्र और बिंबिसार का पुत्र था

मौर्यकालीन इतिहास को जानने के साधन बौद्ध और जैन साहित्य हैं चंद्रगुप्त मौर्य ने जैन धर्म और अशोक ने बुद्ध धर्म का आश्रय लिया था

प्रान्तीय प्रशासन ( Provincial administration )

चन्द्रगुप्त मौर्य ने शासन संचालन को सुचारु रूप से चलाने के लिए चार प्रान्तों में विभाजित कर दिया था जिन्हें चक्र कहा जाता था। इन प्रान्तों का शासन सम्राट के प्रतिनिधि द्वारा संचालित होता था।

सम्राट अशोक के काल में प्रान्तों की संख्या पाँच हो गई थी। ये प्रान्त थे-

प्रान्त राजधानी

  • प्राची (मध्य देश )- पाटलिपुत्र
  • उत्तरापथ – तक्षशिला
  • दक्षिणापथ – सुवर्णगिरि
  • अवन्ति राष्ट्र – उज्जयिनी
  • कलिंग – तोसली

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J.S.Rana Sir

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