प्राचीन भारत का इतिहास नोट्स

हर्ष का प्रशासन Administration of Harsha

एक कुशल प्रशासक एवं प्रजापालक राजा के रूप में हर्ष को स्मरण किया जाता है। नागानंद में उल्लेख आया है कि हर्ष का एकमात्र आदर्श प्रजा को सुखी व प्रसन्न देखना था। कादम्बरी व हर्षचरित में भी उसे प्रजा-रक्षक कहा है।

राजा के दैवीय सिद्धान्त का इस समय प्रचलन था लेकिन इससे तात्पर्य यह नहीं कि राजा निरंकुश होता था। वस्तुत: राजा के अनेक कर्त्तव्य एवं उत्तरदायित्व होते थे जिन्हें पूरा करना पड़ता था। उनकी व्यक्तिगत इच्छायें कर्त्तव्यों के सामने गौण थी। राजा को दण्ड एवं धर्म का रक्षक माना जाता था।

हर्ष की छवि ह्वेनसांग के विवरण से एक प्रजापालक राजा की उभरती है। वह राजहित के कार्यों में इतना रत रहता था कि निद्रा एवं भोजन को भी भूल जाता था। मौर्य सम्राट् अशोक की भाँति वह भी पूरे दिन शासन-संचालन में लगा रहता था। साम्राज्य की दशा, प्रजा की स्थिति, उनका जीवन-स्तर जानने के लिए प्राचीन काल के राजा वेश बदल कर रात्रि में भ्रमण किया करते थे। हर्ष भी अपने साम्राज्य का भ्रमण करता था।

प्रजा के सुख-दु:ख से अवगत होता था। दुष्ट व्यक्ति को दण्ड व सज्जन को पुरस्कार देता था। वह युद्ध शिविरों में भी प्रजा की कठिनाईयाँ सुनता था। हर्षचरित में शिविरों का उल्लेख हुआ है। इस विवरण से तत्कालीन राजवैभव झलकता है। बाण ने राज्याभिषेक की परंपरा का उल्लेख किया है। हर्ष ने प्रभाकरवर्द्धन के राज्याभिषेक का उल्लेख किया है।

राजप्रासाद वैभवपूर्ण व सर्वसुविधा सम्पन्न थे। राजा के व्यक्तिगत सेवकों में पुरुषों के साथ-साथ स्त्रियों की संख्या भी काफी होती थी। इनमें महाप्रतिहारी, प्रतिहारीजन, चामरग्राहिणी, ताम्बूल, करंकवाहिनी आदि उल्लेखनीय हैं। प्रासादों की सुरक्षा का कड़ा प्रबंध था। ह्वेनसांग के विवरण से हर्ष के परोपकार कायों का उल्लेख मिलता है। उसने सड़कों की सुरक्षा के व्यापक प्रबंध किये और यात्रियों के ठहरने की समुचित व्यवस्था की। दान-पुण्य के कायों में भी वह बहुत खर्च करता था।

एक मंत्रिपिरषद् राजा को राजकीय कार्य में मदद देने के लिए होती थी। मंत्रियों के लिए प्रधानामात्य एवं अमात्य शब्द प्रयुक्त होते थे। रत्नावली व नागानंद में कई प्रकार के प्रशासनिक पदों का उल्लेख है। बहुत से मंत्री गुप्तकालीन ही थे, जैसे सन्धिविग्रहिकअक्षयपटलाधिकृत, सेनापति आदि। मंत्रियों की सलाह काफी महत्त्व रखती थी। ह्वेनसांग के विवरण से स्पष्ट होता है कि राज्यवर्द्धन के वध के पश्चात् कन्नौज के राज्याधिकारियों ने मंत्रियों की परिषद् की सलाह से हर्ष से कन्नौज की राजगद्दी संभालने का अनुरोध किया।

स्पष्ट है कि प्राचीन काल में मंत्रियों को स्वतंत्र रूप से अपने विचार व्यक्त करने की स्वतन्त्रता थी। प्रशासनिक व्यवस्था की धुरी राजा ही होता था। वह अंतिम न्यायाधीश व मुख्य सेनापति भी था। राजा सभी विभागों की देख-रेख करता था। केन्द्रीय शासन सुविधा की दृष्टि से कई विभागों में विभाजित था।

प्रधानमंत्री, संधिविग्रहिक (पर राष्ट्र विभाग देखने वाला) अक्षयपटालिक (सरकारी लेखपत्रों की जाँच करने वाला), सेनापति (सेना का सर्वोच्च अधिकारी), महाप्रतिहार (राजप्रासाद का रक्षक), मीमांसक (न्यायाधीश), लेखक, भौगिक आदि अधिकारी प्रमुख थे। इनके अतिरिक्त महाबलाधिकृत, अश्वसेनाध्यक्ष, गजसेनाध्यक्ष, दूत, उपरिक महाराज, आयुक्त तथा दीर्घद्वग (तीव्रगामी संवादक) जैसे पदाधिकारी थे।

राज्य प्रशासनिक सुविधाँ के लिए ग्राम, विषय, भुक्ति एवं राष्ट्र आदि में विभाजित था। भुक्ति से तात्पर्य प्रांत से था और विषय का जिलों से। शासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम थी। ग्राम अपने क्षेत्र में स्वतंत्र थे। ग्रामिक ग्राम का प्रमुख होता था। इसके अलावा भी कर्मचारियों की श्रृंखला मिलती है जैसे महासामंत, सामत दौस्साध, कुमारामात्य आदि।

दण्ड-व्यवस्था हर्ष के समय की कठोर थी। ह्वेनसांग लिखता है कि शासन कार्य सत्यतापूर्वक सम्पन्न होने पर लोग प्रेम-भाव से रहते हैं। अत: अपराधियों की संख्या अल्प है। राज्य के विरुद्ध षड्यंत्र करने पर आजीवन कैद की सजा दी जाती थी। इसके अलावा अंग-भंग, देश निकाला आर्थिक जुर्माना भी दिया जाता था।

ह्वेनसांग के अनुसार अपराध की सत्यता को ज्ञात करने के लिए चार प्रकार की कठिनदिव्य प्रणालियाँ काम में लाई जाती थीं-जल द्वारा, अग्नि द्वारा, तुला द्वारा, विष द्वारा। साहित्यिक एवं अभिलेखीय साक्ष्य भी न्याय प्रबंध पर प्रकाश डालते हैं। अपराधियों के अपराध का निर्णय न्यायाधीश करते थे जो मीमांसक नाम से जाने जाते थे।

अपराधियों के लिए जेल या बंदीगृह की व्यवस्था थी। कभी-कभी उन्हें बेड़ियाँ भी पहनाई जाती थीं। विशेष उत्सवों या समारोहों के समय अपराधियों का अपराध क्षमा कर दिया जाता था। हर्ष जब दिग्विजय के लिए जाते थे, तब भी उनका अपराध क्षमा कर दिया जाता था।

ठोस एवं दृढ़ आर्थिक नीति का पालन हर्ष ने किया था। ह्वेनसांग के विवरण से ज्ञात होता है कि राजा आय को उदारतापूर्वक व्यय करते थे। राजकोष के चार हिस्से थे-एक भाग धार्मिक कार्यों तथा सरकारी कार्यों में, दूसरा भाग बड़े-बड़े सार्वजनिक अधिकारियों पर खर्च होता था, तीसरे भाग से विद्वानों को पुरस्कार और सहायता दी जाती थी, चौथा भाग दान-पुण्य आदि में खर्च होता था।

हर्षकाल में जनता पर करों का अत्यधिक दबाव नहीं था। राजकर उपज का ⅙ था। भूमिकर के अलावा खनिज पदार्थों पर भी कर लगाया जाता था। 

चुंगी भी राज्य की आय का प्रमुख स्रोत थी। नागरिकों पर लगाये गये आर्थिक जुर्माने से भी राज्य की आय होती थी। हर्ष काल के प्रमुख कर भाग, हिरण्य तथा बलि थे। उद्रंग व उपरिकर का भी उल्लेख है।

सैनिक शासन– अपने साम्राज्य की सुरक्षा हेतु हर्ष ने एक संगठित सेना का गठन किया था। वह सेना का सर्वोच्च अधिकारी था। सेना में पैदल, अश्वारोही, रथारोही, अस्तिआरोही होते थे। ह्वेनसांग के विवरण से स्पष्ट है कि हर्ष की सेना में पैदल सैनिक असंख्य थे, एवं 20,000 घुड़सवार व 60,000 हाथी थे। हर्षचरित के विवरण से सेना में ऊंटों के अस्तित्व का बोध होता है।

हर्ष की सेना में नौ सेना भी अवश्य रही होगी। महाबलाधिकृत सेनापति अश्वसेनाध्यक्ष आदि बहुत से सैनिक अधिकारियों का उल्लेख मिलता है। इस समय तक सेना में रथ का प्रयोग समाप्त हो चुका था। हर्ष ने गुप्तचर संस्था का भी विकास किया था। पुलिस विभाग का भी गठन किया गया। चौरोद्धरणिक, दण्डपाशिक आदि पुलिस विभाग के अधिकारी थे।

हमारे बारें में

एग्जाम टॉपर क्लास टीम

My Name is Jitendra Singh (Rana) और मैं एक सफल शिक्षक बनने की तैयारी कर रहा हूं ! और मैं लखनऊ, उत्तर प्रदेश (भारत) से हूँ।
मेरा उद्देश्य हिन्दी माध्यम में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले प्रतिभागियों का सहयोग करना है ! आप सभी लोगों का स्नेह प्राप्त करना तथा अपने अर्जित अनुभवों तथा ज्ञान को वितरित करके आप लोगों की सेवा करना ही मेरी उत्कृष्ट अभिलाषा है !!
दोस्तो अगर आपको यह पोस्ट/विडियो/क्लास अच्छी लगी हो तो इसे Share अवश्य करें ! कृपया कमेंट के माध्यम से बताऐं कि ये पोस्ट आपको कैसी लगी आपके सुझावों का भी स्वागत रहेगा Thanks !

Leave a Comment