मध्यकालीन भारत का इतिहास नोट्स

अकबर: 1556-1605 ई. Akbar: 1556-1605 AD.

अकबर को, जो उस समय अपने अभिभावक एवं अपने पिता के पुराने साथी बैरम खाँ के साथ पंजाब में था, तेरह वर्ष की आयु में 14 फरवरी, 1556 ई. को विधिवत् हुमायूँ का उत्तराधिकारी घोषित किया गया। परन्तु अभी भी हिन्दुस्तान पर मुगलों की प्रभुता अनिश्चित थी। शेरशाह के उत्तराधिकारियों के मूर्खतापूर्ण कारनामों और झगड़ों के कारण देश उसके सुधारों के लाभों से वंचित हो गया था। उसी समय उसे एक भयंकर दुर्भिक्ष का शिकार बनना पड़ा।

साथ-साथ भारत के विभिन्न भागों में प्रत्येक स्वतंत्र राज्य शक्ति के लिए स्पर्धा कर रहा था। उत्तर-पश्चिम में अकबर का सौतेला भाई मिर्जा मुहम्मद हकीम काबुल पर लगभग स्वतंत्र रूप से शासन कर रहा था। उत्तर में कश्मीर एक स्थानीय मुसलमान वंश के अधीन था। हिमालय के राज्य भी स्वतंत्र थे। सिंध तथा मुल्तान शेरशाह की मृत्यु के बाद दिल्ली के अधिकार से मुक्त हो गये थे। उड़ीसा, मालवा एवं गुजरात तथा गोंडवाना (आधुनिक मध्यप्रदेश में) के स्थानीय नायक किसी भी प्रभुसत्ता के नियंत्रण से मुक्त थे। विन्ध्य पर्वत के दक्षिण विस्तृत विजय नगर-साम्राज्य तथा खानदेश, बरार, बीदर, अहमदनगर एवं गोलकुंडा की मुस्लिम सल्तनतें थीं, जिन्हें उत्तरीय राजनीति में कोई दिलचस्पी नहीं थी।

पुर्तगीजों ने गोआ एवं दिव पर अधिकार कर पश्चिमी तट पर अपना प्रभाव स्थापित कर लिया था। अपनी मृत्यु के पहले हुमायूँ हिन्दुस्तान में अपने राज्य का एक बहुत छोटा हिस्सा फिर से लौटा सका था। अभी भी शेरशाह के राज्य के अधिकांश भाग पर सूरों का कब्जा था। जैसा अहमद यादगार हमें बताता है, आगरे से मालवा तक के देश तथा जौनपुर की सीमाओं पर आदिलशाह की राजसत्ता थी; दिल्ली से छोटे रोहतास तक, जो काबुल के रास्ते पर था, शाह सिकन्दर के हाथों में था; तथा पहाड़ियों के किनारे से गुजरात की सीमा तक इब्राहिम खौं के अधीन था।

हिन्दुस्तान पर प्रभुत्व के दावों के लिए अकबर तथा शेर के प्रतिनिधियों के बीच कुछ चुनना नहीं था। जैसा स्मिथ लिखता है- निर्णय केवल तलवार से ही हो सकता था। इस प्रकार अकबर की पैतृक सम्पत्ति अनिश्चित किस्म की थी तथा उसका साम्राज्य-निर्माण का कार्य वास्तव में बहुत कठिन था।

अकबर के राज्याभिषेक के शीघ्र बाद आदिलशाह सूर के योग्य सेनापित तथा मंत्री हीमू ने आगे बढ़ मुगलों का विरोध किया। वह रेवाड़ी का एक बनिया था। उसने पहले दिल्ली के मुग़ल शासक तर्दी बेग को पराजित कर आगरे एवं दिल्ली पर अधिकार कर लिया। तदीं बेग को दिल्ली की प्रतिरक्षा करने में असफल होने के कारण बैरम खाँ की आज्ञा से मार डाला गया। हीमू ने राजा विक्रमजित् अथवा विक्रमादित्य की उपाधि धारण की।

एक विशाल सेना लेकर जिसमें डेढ़ हजार लड़ाई के हाथ थे, उसने पानीपत के ऐतिहासिक मैदान में अकबर एवं बैरम का मुकाबला किया। उसे मुग़ल सेना के उभय पक्षों के विरुद्ध प्रारम्भिक सफलताएँ मिलीं परन्तु लड़ाई का निर्णय एक तीर ने कर दिया, जो अचानक उसकी आँख में जा लगा। उसकी चेतना जाती रही तथा उसके सैनिक अपने नेता से वंचित होकर घबड़ाहट में तितर-बितर हो गये। ऐसी असहाय अवस्था में हीमू मार डाला गया। कुछ के मतानुसार उसे अपने हाथों से मारने में अकबर के अस्वीकार करने पर बैरम ने मार डाला तथा कुछ दूसरों के मतानुसार अपने संरक्षक के उकसाने पर अकबर ने स्वयं उसे मार डाला।

पानीपत की दूसरी लड़ाई का परिणाम निर्णायक हुआ। उसने मुगलों के पक्ष में अपना निर्णय देकर भारत में प्रभुता के लिए अफगानों तथा मुगलों के बीच के संघर्ष का अन्त कर दिया। विजेताओं ने शीघ्र दिल्ली एवं आगरे पर अधिकार कर लिया। मई, 1557 ई. में सिकन्दर सूर ने उनके समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। पूर्वी प्रान्तों में उसे एक जागीर मिली। अकबर ने शीघ्र उसे वहाँ से निकाल दिया।

एक भगोडे की दशा में बंगाल में उसकी मृत्यु हुई (1558-1559 ई.)। मुहम्मद आदिल मुंगेर में बंगाल के शासक के विरुद्ध लड़ता हुआ मर गया (1556 ई.)। इब्राहिम सूर को इधर-उधर भटकने के बाद उड़ीसा में आश्रय मिला, जहाँ लगभग दस वर्षों के बाद वह मारा गया (1567-1568 ई.)। इस प्रकार हिन्दुस्तान पर अकबर की प्रभुता के दावों का विरोध करने वाला कोई सूर प्रतिद्वन्द्वी न रहा। आगे चलकर सोलहवीं तथा सत्रहवीं सदियों में मुगलों के विरुद्ध जो अफगानों के विद्रोह हुए, वे प्राय: इतने छिटपुट एवं स्थानीय थे कि उनसे मुग़ल आधिपत्य पर कोई भयंकर संकट उपस्थित नहीं हो सकता था।

पानीपत की दूसरी लड़ाई (1556 ई.) से भारत में मुग़ल साम्राज्य का वास्तविक प्रारम्भ हुआ तथा इसने उसके विस्तार का मार्ग प्रशस्त कर दिया। 1558 ई. तथा 1560 ई. के बीच ग्वालियर, अजमेर एवं जौनपुर इसमें मिला लिये गये। पर अपने अभिभावक एवं संरक्षक बैरम खाँ की रक्षा के जाल में बँधे रहने के कारण अकबर स्वेच्छापूर्वक काम करने की स्वतंत्र न था।

संरक्षक ने मुगलों की बहुमूल्य सेवा की थी, परन्तु उच्छृखल तरीके से कार्य करने के कारण उसने अब तक बहुतों को अपना शत्रु बना लिया था। 1560 ई. में बादशाह ने अपने हाथों में शासन-सूत्र ले लेने का अपना निर्णय बैरम खाँ के सामने स्पष्ट रूप से व्यक्त किया तथा उसे बर्खास्त कर दिया। संरक्षक प्रत्यक्ष रूप से आत्मसमर्पण दिखलाते हुए अपने स्वामी के निर्णय के सामने झुक गया तथा मक्का चला जाना स्वीकार कर लिया।

परन्तु जब अकबर ने बैरम के एक व्यक्तिगत शत्रु तथा पहले के अधीन अफसर पीर मुहम्मद को अपने संरक्षक (बैरम) को शाही राज्य के बाहर छोड आने के लिए अथवा, जैसा बदायूंनी कहता है, उसे शीघ्रातिशीघ्र मक्का रवाना करने के लिए नियुक्त किया, तब बैरम ने इसे अपना अपमान समझ कर विद्रोह कर दिया। वह जालंधर के निकट परास्त हो गया।

पर अकबर ने उसकी विगत सेवाओं का विचार कर उसके साथ उदारता का व्यवहार किया और इस प्रकार बुद्धिमानी का परिचय दिया। मक्का की राह में जनवरी, 1561 ई. में एक लोहानी अफगान ने छुरा भोंक कर बैरम खाँ को मार डाला। उस अफगान के पिता को पहले कभी संरक्षक के अधीन मुग़ल सिपाहियों ने मार डाला था। यद्यपि अफगानों ने उसका सब-कुछ लूट लिया परन्तु उसका परिवार अपमानित होने से बच गया। उसका पुत्र अब्दुर्रहीम अकबर के संरक्षण में ले लिया गया। आगे चलकर वह साम्राज्य का एक प्रमुख सरदार बन गया। बैरम खाँ की पत्नी से अकबर ने विवाह कर लिया।

बैरम खाँ के पतन के शीघ्र बाद शासन-सूत्र अकबर के हाथों में नहीं आया और दो वर्षों तक (1560-1562 ई.) उसकी धाई माहम अनगा, उसके पुत्र आदम खाँ तथा अपने सम्बन्धियों के साथ राज्य पर अनुचित प्रभाव जमाये रही।

शासन पर एक महिला के वर्चस्व स्थापित करने के कारण इस समय की सरकार को पेटीकोट सरकार भी कहा जाता है। आदम खाँ तथा पीर मुहम्मद ने ऐसे उपायों से मालदा पर विजय प्राप्त की (1561 ई.), जिनका वर्णन उनके अत्याचारों के चश्मदीद गवाह बदायूनी ने स्पष्टता से किया है, पर उन्हें कोई दण्ड न मिला। अन्त में उनके प्रभाव से ऊब कर अकबर ने आदम खाँ को मरवा डाला। उसकी माँ शोकाकुल होकर चालीस दिनों के बाद चल बसी। इस प्रकार 1562 ई. के मई महीने तक अकबर अपने को अन्त:पुर के प्रभाव से मुक्त कर सका।

अकबर स्वभाव से ही प्रबल साम्राज्यवादी था। उसने जनवरी, 1601 ई. में असीरगढ़ पर अधिकार करने तक अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए देश-विजय की नीति का अनुसरण किया। अदृष्ट एवं नियंत्रणहीन परिस्थितियों ने उसे इसे और बढ़ाने से रोक दिया। उसका विश्वास था कि- राज्य को सदैव, विजय करने को कृतसंकल्प रहना चाहिए, अन्यथा उसके पड़ोसी उसका सशस्त्र विरोध करते हैं। सच तो यह है कि चालीस वर्षों के अन्दर अनेक बार दूसरे राज्यों को अपने साम्राज्य में मिलाकर अकबर ने लगभग सम्पूर्ण उत्तर एवं मध्य भारत का राजनैतिक एकीकरण कर दिया।

मालवा को आदम खाँ तथा पीर मुहम्मद ने 1561 ई. में जीता था। परन्तु इसके शासक बाज बहादुर ने शीघ्र इस पर पुन: अधिकार कर लिया तथा कई वर्षों तक उसने मुगलों की अधीनता स्वीकार नहीं की। बाज बहादुर की रानी रूपमती थी। दोनों उच्च कोटि के गायक माने जाते थे। उस काल में मालवा संगीत का केन्द्र माना जाता था।

1962 में अकबर ने मालवा को अंतिम रूप से जीत लिया। बाज बहादुर अकबर के मनसबदारों में शामिल हो गया। 1564 ई. में अकबर ने कड़ा तथा पूर्वी प्रदेशों के शासक आसफ खाँ को गढ़ कटंगा (गोंडवाना में) के राज्य को जीतने के लिए भेजा। इस राज्य में मोटे तौर पर (आधुनिक) मध्य प्रदेश के उत्तरी जिले पड़ते हैं।

उसका राजा वीर नारायण अल्पवयस्क था, परन्तु उसकी माँ दुर्गावती, जो एक अत्यन्त रूपवती एवं वीर राजपूत स्त्री थी, उस पर योग्यतापूर्वक शासन करती थी। 15वीं सदी के अंत में अमनदास ने इस राज्य की स्थापना की थी। उसने गुजरात के शासक बहादुर शाह को रायसीन का क्षेत्र जीतने में मदद की थी तो बहादुर शाह ने खुश होकर उसे संग्राम राय की उपाधि दी।

दुर्गावती से उसके पुत्र की शादी हुई थी। दुर्गावती एक कुशल योद्धा एवं शेर के शिकार में दक्ष थी। उसने वीरतापूर्वक शाही दल का विरोध किया, परन्तु गढ़ एवं मण्डला (आजकल जबलपुर जिले में) के बीच उस दल के साथ युद्ध में वह पराजित हुई।

सच्चे राजपूत की तरह उसने अपमान की अपेक्षा मृत्यु को अधिक पसन्द किया तथा आत्महत्या कर ली। इस प्रकार जैसा उसका जीवन उपयोगी था, वैसा ही महान् एवं त्यागपूर्ण उसका अन्त भी हुआ। अल्पवयस्क शासक वीर नारायण अपने शत्रुओं से वीरतापूर्वक लड़ता हुआ युद्ध में काम आया। आक्रमणकारियों ने काफी माल लूटा। आसफ खाँ ने कुछ समय तक राज्य को अपने अधिकार में रखा लेकिन आगे चलकर यह पुराने शासक-परिवार के एक सदस्य को दे दिया गया। मुगलों ने उसे- अपने राज्य के उस भाग पर से अधिकार छोड़ देने को विवश कर दिया, जो आजकल भोपाल कहलाता है।

खनवा के युद्ध (1527 ई.) के परिणामस्वरूप उत्तर में राजपूतों के प्रभाव का पूर्ण ह्रास नहीं हुआ। भारत के इतिहास में राजस्थान अभी भी एक प्रबल तत्त्व था। अकबर एक राजनीतिज्ञ की सच्ची सूझ तथा उदार दृष्टिकोण से सम्पन्न था। उसका खानदान विदेशी था। अफगान इसी भूमि के लाल थे। ऐसी परिस्थिति में उसने भारत में अफगानों को हटाकर अपने खानदान के लिए साम्राज्य निर्माण के अपने कार्य में राजपूत मैत्री के मूल्य को अनुभव किया।

इस प्रकार उसने के मिलाने का तथा अपने लगभग सभी कायों में उनका सक्रिय सहयोग प्राप्त करने और स्थिर रखने का यथासम्भव प्रयत्न किया। अपनी विवेकपूर्ण एवं उदार नीति से उसने उनमें से अधिकांश के दिल इस हद तक जीत लिये कि उन्होंने उसके साम्राज्य की बहुमूल्य सेवायें कीं तथा इसके लिए अपना रक्त तक बहाया।

वास्तव में अकबर का साम्राज्य मुग़ल पराक्रम एवं कूटनीति तथा राजपूत वीरता एवं सेवा के एकीकरण का परिणाम था। 1562 ई. में अम्बर (जयपुर) के राजा बिहारी मल ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली और उसके साथ हुई इस मित्रता को एक वैवाहिक सम्बन्ध द्वारा पुष्ट किया। बिहारी मल, अपने पुत्र भगवानदास तथा पौत्र मानसिंह के साथ आगरे गया। उसे पाँच हजार की मनसबदारी मिली। उसके पुत्र एवं पौत्र को भी सेना में उच्च पद मिले। इस मध्यकालीन भारत में उत्पन्न कुछ महान् सेनापतियों एवं कूटनीतिज्ञों की सेवाएँ प्राप्त करने में समर्थ हुए।

परन्तु मेवाड़, जहाँ राजपूत भावना अपने विशुद्धतम रूप में प्रस्फुटित थी, जो अपने ऊँचे पर्वतों एवं मजबूत किलों द्वारा प्रतिरक्षा के उत्तम साधनों से सम्पन्न था तथा जिसने उत्तरी भारत पर प्रभुता के लिए बाबर से संघर्ष किया था, मुग़ल बादशाह के समक्ष आज्ञाकारी बनकर नतमस्तक नहीं हुआ। इसने मालवा के भगोडे शासक बाज बहादुर को शरण देकर उसे क्रुद्ध कर दिया।

इसकी स्वतंत्रता अकबर के लिए कष्टकर थी। वह एक अखिल भारतीय साम्राज्य के आदर्श का समर्थक था। इसके आर्थिक हित के लिए भी मेवाड़ पर नियंत्रण रखना आवश्यक था, जिससे होकर गंगा-यमुना के दोआब तथा पश्चिमी तट के बीच वाणिज्य के रास्ते गुजरते थे। राणा साँगा की मृत्यु के पश्चात् मेवाड़ में आन्तरिक फूट के फैले रहने तथा एक कुलीन पिता के अयोग्य पुत्र उदय सिंह की दुर्बलता के कारण अकबर की महत्त्वाकांक्षापूर्ण योजना सुगम हो गयी। टॉड कहता है- मेवाड़ के लिए यह कितना अच्छा होता यदि वहाँ का इतिहास अपने राजाओं की सूची में उदय सिंह का नाम कभी अंकित नहीं करता।

जब अक्टूबर, 1567 ई. में अकबर ने चित्तौड़ के गढ़ को घेर लिया तब राजधानी को अपने भाग्य के भरोसे छोड़ कर उदय सिंह पहाड़ियों में जा छिपा। पर राणा के कुछ अनुगामी साहसी थे, जिनमें जयमल एवं पत्ता प्रमुख थे। इन्होंने शाही दल का चार महीनों तक (20 अक्टूबर, 1567 से लेकर 23 फरवरी, 1568 ई.) तक भयंकर विरोध किया।

अंत में जयमल स्वयं अकबर के द्वारा छोड़ी गयी एक बन्दूक की गोली से मारा गया। बाद में पत्ता भी मारा गया। प्रतिरक्षा के नेताओं की मृत्यु के कारण घिरी हुई सेना हतोत्साह होकर हाथ में तलवार लेकर शत्रुओं पर टूट पड़ी। उस सेना का प्रत्येक मनुष्य वीरतापूर्वक लड़ता हुआ मारा गया। राजपूत स्त्रियों ने जौहर व्रत का पालन किया।

तब अकबर ने चित्तौढ़ के गढ़ को रौद डाला। अकबर का रोष उन पर भी पड़ा, जिन्हें टॉड राजकीयता के प्रतीक कहता है। इस प्रकार वह बड़े नगाड़े (जिनका व्यास आठ अथवा दस फीट था तथा जिनकी प्रतिध्वनि मीलों तक राजाओं के चित्तौड़ के द्वार पर आगमन और वहाँ से प्रस्थान को घोषित करती थी) एवं चित्तौड़ की महामाता के मंदिर से विशाल झाड़-फानूस भी आगरे ले गया। यह अभियान अकबर के चरित्र पर एक दाग है क्योंकि पहली और अंतिम बार उसने चित्तौड़ के किले पर ही कत्लेआम करवाया। अकबर ने जयमल और पत्ता की वीरता से प्रभावित होकर आगरे के किले में इनकी मूर्तियाँ बनवाई।

चित्तौड़ के पतन से भयभीत होकर अन्य राजपूत नायकों ने, जो अब तक अकबर का विरोध करते रहे थे, उसकी अधीनता स्वीकार कर ली। फरवरी, 1569 ई. में रणथम्भोर के राय सुरजन हाड़ा ने अपने दुर्ग की कुजियाँ अकबर को समर्पित कर दी तथा बादशाह के यहाँ नौकरी कर ली। उसी वर्ष बुन्देलखंड में कालिंजर के प्रधान राजा रामचंद्र ने भी उसका अनुकरण किया। कालिंजर पर अधिकार करने से अकबर की सैनिक स्थिति बहुत दृढ़ हो गयी तथा इसे मुग़ल साम्राज्यवाद की प्रगति में एक महत्वपूर्ण कदम माना गया। 1570 ई. में बीकानेर तथा जैसलमेर के शासकों ने न केवल मुग़ल बादशाह की अधीनता ही स्वीकार की बल्कि उससे अपनी पुत्रियों का विवाह भी कर दिया।

इस प्रकार एक-एक कर राजपूत नायकों ने मुगलों की प्रभुता स्वीकार कर ली। पर मेवाड़ ने अब भी इसे मानना कबूल नहीं किया। अपनी पैतृक राजधानी खोने पर भी उदय सिंह ने स्वतंत्रता कायम रखी। 3 मार्च, 1572 ई. को उदयपुर से लगभग उन्नीस मील उत्तर-पश्चिम की ओर गोगुंडा नामक स्थान पर उसकी मृत्यु हुई। इसके बाद उसके पुत्र प्रताप के रूप में मेवाड़ को एक सच्चा देशभक्त एवं नेता मिला। वह हर तरह से अपने देश की परम्पराओं का भक्त था। उसने आक्रमणकारियों का दृढ़ता से प्रतिरोध किया।

उसके कार्य की महत्ता अच्छी तरह तब समझी जा सकती है, जब हम यह देखते हैं कि बिना राजधानी के अल्य साधनों के साथ उसे मुग़ल बादशाह की संगठित शक्ति का विरोध करना पड़ा, जो उस समय धरती पर सबसे अधिक और बेहद धनी सम्राट् था। उसके साथ नायक एवं पडोसी तथा उसका सगा भाई तक, जो शूरता एवं स्वतंत्रता के उच्च राजपूती आदशों से हीन थे, मुगलों से जा मिले थे।

परन्तु राजस्थान का यह राष्ट्रीय वीर, जो अपने सम्बन्धियों की अपेक्षा श्रेष्ठतर धातु का बना था, किसी भी विघ्न से डरने वाला नहीं था। संकट की विकरालता से प्रताप का साहस और भी दृढ़ हो जाता था। उसने, टाड के शब्दों में- अपनी माँ का दूध समुज्ज्वल करने की सौगन्ध खायी थी और उसने अपनी इस प्रतिज्ञा को अच्छी तरह निभाया।

उसके राज्य पर अनिवार्य शाही आक्रमण अप्रैल, 1576 ई. में हुआ। इस फौज का सेनापतित्व आम्बेर के राजा मानसिंह एवं आसफ खाँ ने किया। गोगुंडा के निकट हल्दीघाट की घाटी में घमासान लड़ाई हुई। प्रताप पराजित हुआ। वह किसी प्रकार अपनी जान बचाकर भागा, जो झाला के नायक की निस्वार्थ भक्ति के कारण बच सकी, क्योंकि उसने अपने को राणा घोषित कर शाही दल के आक्रमण को अपने ऊपर ले लिया था।

अपने प्रिय घोडे चेतक पर सवार हो राणा ने पहाड़ियों की ओर भागकर आश्रय लिया। उसके शत्रुओं ने एक-एक कर उसके गढ़ों पर अधिकार कर लिया। परन्तु प्रताप अत्यन्त भयानक विपत्ति में भी अधीनता स्वीकार करने की बात नहीं सोच सकता था। अपने कठोर शत्रु द्वारा एक चट्टान से दूसरी चट्टान खदेड़ा जाकर तथा अपने परिवार को स्थानीय पहाड़ियों के फल खिलाकर उसने निर्भीक उत्साह और स्फूर्ति के साथ युद्ध जारी रखा।

उसने अपनी मृत्यु के पहले अपने बहुत-से किलों पर पुन: अधिकार कर लेने का संतोष प्राप्त किया। उसने अपनी नई राजधानी चांवड़ बनाई। सत्तावन वर्षों की आयु में 19 जनवरी, 1597 ई. को उसकी मृत्यु हुई। गुरिल्ला युद्ध का जनक महाराणा प्रताप ही था।

यह राजपूत देशभक्त अपने अन्तिम क्षण तक अपनी मातृभूमि के लिए चिन्तित रहा, क्योंकि उसे अपने पुत्र पर भरोसा न था। अपने मरने के पहले उसने अपने नायकों से प्रतिज्ञा करवाई कि उसका देश तुर्कों के हाथों में नहीं सौंपा जायेगा। इस प्रकार एक राजपूत के जीवन का अंत हुआ, जिसकी स्मृति की आज भी प्रत्येक सिसोदिया पूजा करता है। टाड के शब्दों में- यदि मेवाड़ का उसका अपना

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