मध्यकालीन भारत का इतिहास नोट्स

अलाउद्दीन खिल्जी: 1296-1316 ई. Alauddin Kilji: 1296-1316 AD.

पितृविहीन अलाउद्दीन खल्जी का पालन पोषण उसके चाचा जलालुद्दीन फिरोज ने किया था। फिरोज अपने इस भतीजे को इतना अधिक प्यार करता था कि उसे अपना दामाद भी बना लिया। दिल्ली के राजसिंहासन पर बैठने के बाद फिरोज ने उसे इलाहाबाद जिले में स्थित कड़ा की जागीर दे दी।

यहीं अलाउद्दीन के दिमाग में महत्त्वाकांक्षा के बीज बोये गये। यह भी हो सकता है कि अपनी सास मलिकाजहाँ तथा अपनी पत्नी के षड्यंत्रों से उत्पन्न घरेलू कष्ट से भी उसे दिल्ली दरबार से अलग शक्ति एवं प्रभाव स्थापित करने की प्रेरणा मिली हो।

1292 ई. में मालवा पर एक सफल आक्रमण तथा भिलसा नगर की विजय से, जिसके लिए उसे कड़ा के अतिरिक्त अवध की जागीर भी पुरस्कार के रूप में मिली, उसकी महत्त्वाकांक्षा और भी बढ़ गयी।

भिलसा में अलाउद्दीन ने देवगिरि के राज्य की अपरिमित सम्पत्ति की अस्पष्ट अफवाहें सुनी। यह राज्य पश्चिमी दक्कन (डेकन) में फैला हुआ था। तथा इस पर उस समय यादव वंश का रामचंद्रदेव शासन करता था।

अलाउद्दीन ने उसे जीतने की ठानी। अपने इस अभिप्राय को अपने चाचा से गुप्त रख, वह कई हजार अश्वारोहियों को लेकर मध्य भारत एवं विन्ध्य प्रदेश होता हुआ दक्कन की ओर बढ़ा और देवगिरि के सामने पहुंचा। भारत के इस भाग से इस्लाम का सम्पर्क बहुत पहले (अधिक-से-अधिक आठवीं सदी से ही) प्रारंभ हो चुका था।

रामचन्द्रदेव ऐसे आक्रमण के लिए तैयार न था। उसका पुत्र शंकरदेव उसकी अधिकतर सेना के साथ दक्षिण की ओर गया हुआ था। इस प्रकार उस पर बहुत असावधानी की हालत में आक्रमण हुआ। एक निष्फल प्रतिरोध के बाद उसकी हार हो गयी।

मजबूर होकर उसे आक्रमणकारी के साथ संधि करनी पड़ी, जिसके अनुसार उसे बहुत बड़ी धनराशि देने का वादा करना पड़ा। परन्तु अलाउद्दीन कड़ा लौटने को ही था कि शंकरदेव शीघ्रता से देवगिरि लौट आया तथा अपने पिता के रोकने पर भी वह आक्रमणकारियों से जा भिड़ा। अपने उत्साह के कारण आरम्भ में उसे सफलता मिली, परन्तु वह शीघ्र ही पराजित हो गया। उसकी सेना में सामान्य रूप से भय का संचार हो गया, जिससे उसके अनुचर भारी गड़बड़ी की हालत में विभिन्न दिशाओं में भाग खड़े हुए।

रामचंद्रदेव ने दक्षिण भारत के अन्य शासकों से सहायता मांगी, परन्तु उसका कोई फल न निकला। साथ-साथ उसे खाद्य पदार्थों की बड़ी कमी हो गयी। शान्ति के लिए प्रार्थना करने के सिवा उसके पास और कोई चारा न रह गया।

पहले से भी अधिक कठोर शतों पर संधि हुई। अलाउद्दीन सोने, चाँदी, रेशम, मोतियों और बहुमिली पठारों के रूप में लूट का काफी माल लेकर कड़ा लौट गया। खल्जी आक्रमणकारी के इस वीरतापूर्ण आक्रमण से दक्कन की न केवल विशाल आर्थिक क्षति ही हुई बल्कि विन्ध्य-पर्वत के पार के प्रदेशों पर अंतिम मुसलमानी विजय का रास्ता भी खुल गया।

अलाउद्दीन इस सम्पत्ति में हिस्सा बाँटकर दिल्ली के सुल्तान को नहीं देना चाहता था। बल्कि इससे उसकी महत्त्वाकांक्षा का क्षेत्र और भी विस्तीर्ण हो गया। दिल्ली का राजसिंहासन अब उसका लक्ष्य हो गया।

बूढ़े सुलतान जलालुद्दीन फिरोज को उसके पदाधिकारियों ने ईमानदारी के साथ सलाह डी। इनमें खासकर सबसे अधिक खरा चाप भी था। फिरोज अपने भतीजे एवं दामाद अलाउद्दीन के स्नेह में अंधा हो कर उसके बिछाये जाल में जा फँसा।

अपने दरबार के एक विश्वासघाती के कहने पर वह आत्मरक्षा का आवश्यक प्रबन्ध किये बिना ही शीघ्र अपने प्रिय भतीजे से मिलने, नाव पर कड़ा की ओर चल पड़ा। इसी प्रक्रिया में अलाउद्दीन ने अपने एक अनुचर द्वारा जलालुद्दीन खलजी की हत्या करवा दी।

इस प्रकार अपनी और सदा शयता के कारण उसे अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। अलाउद्दीन के अनुगामियों ने उसके पड़ाव में ही 19 जुलाई, 1296 ई. को उसे सुल्तान घोषित कर दिया।

इसके बाद यह आवश्यक हो गया कि अलाउद्दीन अपना पैर दिल्ली में दृढ़ता से जमाये। वहाँ इसी बीच में स्वर्गीय सुल्तान की बेगम मलिका जहाँ ने अपने छोटे पुत्र को रुक्नु इब्राहीम के नाम से राजसिंहासन पर बिठा दिया था।

उसका ज्येष्ठ पुत्र अरकली उसके कुछ कामों से असन्तुष्ट होने के कारण, मुलतान में रह गया था। अलाउद्दीन इस कलह के विषय में सुनकर शीघ्रता से भयानक वर्षा में ही दिल्ली की ओर बढ़ चला। कुछ क्षीण प्रतिरोध के पश्चात् तथा अपने विश्वासघाती अनुचरों के द्वारा त्याग दिये जाने पर इब्राहीम ने दिल्ली छोड़ दी और अपनी माँ एवं विश्वासी अहमद चाप को ले मुलतान भाग गया।

अलाउद्दीन ने दक्कन से प्राप्त सोना दिल खोलकर बाँटा। इस प्रकार सरदारों, अधिकारियों एवं दिल्लीवासियों को उसने अपने पक्ष में कर लिया। दिल्ली में प्रवेश करने पर 3 अक्तूबर, 1296 ई. को बलबन के लाल महल में उसका राज्याभिषक हुआ।

मृत सुल्तान के भगोड़े सम्बन्धियों एवं मित्र मुल्तान में नहीं रह सके। अलाउद्दीन के भाई उलूग खां तथा उसके मंत्री जफर खां ने उन्हें पा लिया। अरकली खाँ तथा इब्राहीम, अपने बहनोई उलगू खाँ मंगोल तथा अहमदचाप के साथ, दिल्ली ले जाते समय अँधे कर दिये गये।

अरकली के सभी पुत्र मार डाले गये। उसे तथा उसके भाई को हाँसी के दुर्ग में बन्द कर दिया गया। मलिकाजहाँ तथा अहमद चाप को कठोर नियंत्रण में दिल्ली में ही रखा गया।

अभी भी अलाउद्दीन की स्थिति अनिश्चित थी। उसे तुर्कों की दु:शीलता राजस्थान, मालवा एवं गुजरात के शासकों का विद्रोहपूर्ण रूख, कतिपय सरदारों के षड्यंत्र (ये सरदार उसी का अनुकरण करने का प्रयत्न कर रहे थे।) तथा मंगोल-आक्रमण की आशंका आदि अनेक प्रतिकूल शक्तियों का सामना करना था

परन्तु स्वभाव तथा दृष्टिकोण में अपने चाचा से सर्वथा भिन्न रहने के कारण नये सुल्तान ने दुर्जय स्फूर्ति पूर्वक इन बाधाओं के साथ संघर्ष करने की कोशिश की तथा उसके प्रयत्न सफल हुए। लेनपुल के अनुसार अलाउद्दीन खिलजी के साथ साम्राज्यवादी विस्तार का 50 वर्षीय इतिहास आरंभ होता है।

बहुत समय से मंगोल आक्रमण दिल्ली सरकार के लिए निरन्तर चिन्ता और भय का कारण बने हुए थे। अलाउद्दीन के राजसिंहासन पर बैठने के कुछ ही महीनों के अन्दर मंगोलों के एक विशाल दल ने भारत पर आक्रमण कर दिया, परन्तु जफर ने जालंधर के निकट बुरी तरह संहार कर उन्हें पीछे भगा दिया। सुल्तान के राज्य-कार्य के द्वितीय वर्ष में मंगोल अपने नेता सल्दी के अधीन पुन: उपस्थित हुए।

इस बार जफ़र खाँ ने उन्हें हरा दिया तथा उनके नेता को लगभग दो हजार अनुयायियों के साथ बन्दी बनाकर दिल्ली भेज दिया। परन्तु 1299 ई. में कुतलुग ख्वाजा कई हजार मंगोलों को लेकर भारत में घुस आया। इस बार उनका लक्ष्य लूटपाट न होकर विजय था। अत: उन्होंने अपनी राह में पड़ने वाले प्रदेशों को नहीं लूटा और न दुर्गों पर आक्रमण ही किया।

वे नगर को घेरने के अभिप्राय से दिल्ली के पड़ोस में पहुँच गये। जिसके फलस्वरूप वहाँ बहुत आतंक फैल गया। जफूर खाँ ने, जो उस युग का रूस्तम और उस समय का वीर था, उन पर उत्साह के साथ आक्रमण किया, परन्तु लड़ते-लड़ते मारा गया। उसके ईर्ष्यालु स्वामी को सन्तोष हुआ कि उसे अपमानित हुए बिना उससे छुटकारा मिल गया।

शायद जफ़र खाँ के पराक्रम से भयभीत होकर ही मंगोल शीघ्र लौट पड़े। उन्होंने भारत पर पुन: आक्रमण किया तथा 1304 ई. में वे अलीबेग एवं ख्वाजा ताश के अधीन अमरोहा तक बढ़ आये। किन्तु अत्याधिक क्षति के साथ उन्हें पीछे हटा दिया गया। उसके शासनकाल का अन्तिम मंगोल आक्रमण 1307-1308 ई. में हुआ।

इस बार इकबालमंद नामक एक सरदार सेना लेकर सिन्धु के पार चला आया। परन्तु वह भी हार गया तथा मार डाला गया। बहुत-से मंगोल सेनापति पकड़कर मार डाले गये। अपने सभी आक्रमणों में बार-बार असफल होने से हतोत्साह हो तथा दिल्ली के सुल्तान की कठोर कार्यवाहियों से भयभीत होकर उसके शासनकाल में मंगोल भारत में फिर उपस्थित नहीं हुए। फलत: उत्तर-पश्चिम सीमा एवं दिल्ली के लोगों ने अब चैन की साँस ली।

मंगोलों को हटाने के अतिरिक्त सुल्तान ने, बलबन की तरह, अपने राज्य को उत्तर पश्चिम सीमा का उत्तम रीति से संरक्षण करने के लिए कुछ प्रतिरक्षात्मक उपाय भी किये। उसने मंगोलों की राह में पड़ने वाले पुराने दुगों की मरम्मत करवायी तथा नये दुर्गों का निर्माण करवाया।

उत्तम सुरक्षा के लिए समाना तथा दीपालपुर की सुदूरवर्ती चौकियों में रखवाली करने वाली सेनाएँ रखीं, जो युद्ध के लिए सर्वदा तैयार रहती थीं। राजकीय सेना को मजबूत बनाया गया। गाजी मलिक ने (आगे चलकर ग्यासुद्दीन तुगलक के नाम से प्रसिद्ध), जिस पर 1305 ई. से पंजाब के शासक के रूप में सीमा की प्रतिरक्षा का भार था, करीब पचीस वर्षों तक योग्यता पूर्वक मंगोलों को रोक रखा।

अलाउद्दीन दिल्ली के निकट बसे हुए नव-मुस्लिमों (नये मुसलमान) के साथ भी कठोरता से पेश आया। वे असन्तुष्ट एवं व्यग्र थे, क्योंकि अपनी अधिवास-भूमि में उनको पद प्राप्त करने अथवा अन्य लाभों की उच्चाकांक्षाएँ पूरी नहीं हुई। और जब अलाउद्दीन की सेना गुजरात विजय कर लौट रही थी, तब वे वस्तुतः विद्रोह कर उठे।

सुल्तान ने सभी नव-मुस्लिमों (नये मुसलमानों) को अपनी नौकरी से भी अलग कर दिया। इससे उनका असन्तोष और भी बढ़ गया। निराश होकर उन्होंने सुल्तान की हत्या के लिए षड्यंत्र रचे। परन्तु शीघ्र इस षड्यंत्र का पता चल गया और सुल्तान ने, उन सबका पूर्ण संहार कर डालने की आज्ञा दे कर उनसे भयंकर प्रतिशोध लिया। इस तरह एक ही दिन में बीस से तीस हजार के बीच नव-मुस्लिम (नये मुसलमान) निर्दयता पूर्वक कत्ल कर दिये गये।

अलाउद्दीन को अपने शासन-काल के प्रारम्भिक वर्षों में बराबर सफलता मिलती गयी, इससे उसका दिमाग ही फिर गया। वह अत्यन्त असम्भव योजनाएँ बनाने लगा तथा बिल्कुल बे-सिर-पैर की इच्छाएँ सँजोने लगा। वह एक नया धर्म स्थापित करना चाहने लगा।

विश्वविजेता के रूप में वह सिकन्दर महान् का अनुकरण करने की इच्छा भी रखने लगा। इन योजनाओं में उसने काजी अलाउल्मुल्क (इतिहासकार जियाउद्दीन बरनी के चाचा) से परामर्श लिया। अलाउल्मुल्क पहले कडा में उसका प्रतिनिधि था तथा उस समय दिल्ली का कोतवाल था। उसने तुरन्त ही उसे उसकी योजनाओं की असारता को बतला दिया।

पहली योजना के विषय में काजी अलाउल्मुलक ने कहा कि जब तक संसार कायम है, धर्म प्रवर्त्तक के पद का कभी राजाओं से सम्बन्ध न हुआ है और न होगा ही, यद्यपि कुछ धर्मप्रवर्त्तकों ने राजकाज भी चलाया है। दूसरी योजना के विषय में उसने कहा कि अभी तो हिन्दुस्तान का ही एक बड़ा भाग अविजित है, राज्य पर मंगोलों के आक्रमण का भय है तथा सुल्तान की अनुपस्थिति में राज्य चलाने वाला अरस्तू के समान कोई वजीर भी नहीं है।

इस प्रकार सुल्तान को अपने होश में लाया गया। उसने अपनी पागलपन से भरी योजनाओं का परित्याग कर दिया। किन्तु फिर भी उसने अपने सिक्कों पर अपना उल्लेख द्वितीय सिंकदर के रूप में करवाया। अलाउद्दीन के शासनकाल में भारत के विभिन्न भागों में मुस्लिम राज्य का शीघ्रता से विस्तार हुआ। सर वुल्सेले हेग का कथन है कि इसके साथ सल्तनत का साम्राज्य काल आरम्भ होता है, जो लगभग आधी शताब्दी तक चलता रहा।

1297 ई. में अलाउद्दीन ने गुजरात के हिन्दू राज्य को जीतने के लिए अपने भाई उलुग खाँ तथा अपने वज़ीर नसरत खाँ के अधीन एक बलवती सेना भेजी। गुजरात को कई बार लूटा गया था, परन्तु यह अविजित ही रहा था। उस समय वहाँ का शासक राय कर्णदेव द्वितीय था, जो एक बधेल राजपूत था।

आक्रमणकारियों ने सारे राज्य की रौद डाला और कर्णदेव द्वितीय की रूपवती रानी कमला देवी को पकड़ लिया। राजा तथा उसकी पुत्री देवलदेवी ने देवगिरि के राजा रामचन्द्रदेव के यहाँ शरण ली। उन्होंने गुजरात के समृद्ध बन्दरगाहों को भी लूटा और विशाल परिमाण में लूट का माल तथा काफूर नामक एक युवक हिजडे को ले आये। विपुल सम्पत्ति, कमला देवी और काफूर के साथ दिल्ली लौटे।

कमला देवी बाद में अलाउद्दीन की प्रिय पत्नी (मल्लिकाजहाँ) बनी। काफूर आगे चलकर राज्य का सबसे प्रभावशाली सरदार हुआ तथा अलाउद्दीन की मृत्यु के पहले और कुछ समय बाद तक इसका असली स्वामी भी बन बैठा।

रणथम्भोर जिसे कुतुबुद्दीन तथा इल्तुतमिश ने जीता था, राजपूतों द्वारा लौटा लिया गया। यह इस समय वीर राजपूत राजा हम्मीर देव के अधीन था। उसने कुछ असन्तुष्ट नव-मुस्लिमों (नये मुसलमानों) को शरण दी थी, जिससे अलाउद्दीन क्रुद्ध हो गया।

1299 ई. में सुल्तान ने अपने भाई उलुग खाँ तथा नसरत खाँ (जो उस समय क्रमश: बियान एवं कड़ा के जागीरदार थे) के अधीन दुर्ग जीतने के लिए सेना भेजी। उन्होंने झाइन को जीतकर रणथम्भोर के सामने पड़ाव डाल दिया।

परन्तु राजपूतों ने शीघ्र ही उनको पराजित कर दिया। नसरत खाँ, एक पाशिब तथा एक गर्गज के निर्माण की देखभाल करते समय दुर्ग की मगरिबी (मंजनीक, ढेलमास) से छूटे हुए एक पत्थर से मारा गया।

अपनी सेना की इस पराजय की खबर सुनकर अलाउद्दीन स्वयं रणथम्भोर की ओर बढ़ा। जब वह गढ़ की राह में अपने कुछ ही अनुचरों के साथ तिलपत में शिकार कर रहा था, तभी उसके भतीजे आकत खाँ ने, कतिपय नये मुसलमानों के साथ मिलकर, उसकी प्रतिरक्षा-रहित अवस्था में उस पर आक्रमण कर उसे आहत कर दिया।

परन्तु वह विश्वासघाती शीघ्र ही पकड़ लिया गया और अपने मित्रों सहित मार डाला गया। इसी समय उमर खाँ और मंजू खाँ, जो क्रमश: अवध एवं बदायू के गवर्नर थे, विद्रोह कर दिया। उसी समय हाजी मौला का भी विद्रोह हुआ। इन विद्रोहों को दबा दिया गया।

अलाउद्दीन को सिंहासनच्युत करने के निमित्त किये गये अन्य षड्यन्त्रों का भी शमन कर दिया गया। उसने जुलाई, 1301 ई. में रणथम्भोर के गढ़ को एक वर्ष तक घेरा डालने के बाद बड़ी कठिनाई से जीत लिया। हम्मीर देव तथा नये मुसलमानों को, जिन्हें उसने शरण दी थी, मार डाला गया।

अलाउद्दीन ने वीर गुहिल राजपूतों की भूमि मेवाड़ पर भी आक्रमण करने की व्यवस्था की। प्रकृति ने मेवाड़ को प्रतिरक्षा के पर्याप्त साधन दिये हैं, जिनके बलपर यह अब तक बाहरी आक्रमणों की उपेक्षा करता रहा। यह आक्रमण भी सम्भवत: रणथम्भोर के विरुद्ध किये गये।

आक्रमण के सदृश सुल्तान की राज्यविस्तार की महत्त्वाकांक्षापूर्ण इच्छा का फल था। यदि परम्पराओं का विश्वास किया जाए, तो इसका तात्कालिक कारण था राणा रतन सिंह की अत्यन्त रूपवती रानी पद्मिनी के प्रति उसका मोहित होना। 

किन्तु इस बात का किसी भी समकालीन इतिहास अथवा अभिलेखों में स्पष्ट उल्लेख नहीं है। राणा बन्दी बनाकर सुल्तान के शिविर में ले जाया गया। परन्तु राजपूतों ने वीरतापूर्वक उसे छुड़ा लिया। राजपूतों का एक छोटा-सा दल अपने दो वीर नेताओं-गोरा तथा बादल-के अधीन चित्तौड गढ़ के बाहरी द्वार पर आक्रमणकारियों को रोकता रहा, किन्तु वे दिल्ली की सेना की सुव्यवस्थित शक्ति के सामने अधिक समय तक न टिक सके।

जब और अधिक अवरोध करना असम्भव जान पड़ने लगा, तब उन्होंने अपमान के बदले मृत्यु को पसन्द किया। अलाउद्दीन ने अपने पुत्र खिज्र खाँ को यहाँ का शासक नियुक्त किया और चितौड़ का नाम बदलकर खिज्राबाद कर दिया।

चित्तौड-विजय के बाद अलाउद्दीन ने मालवा को एक सेना भेजी। मालवा के राजा महलक देव तथा इसके प्रधान कोका ने एक विशाल सेना के साथ उसका सामना किया। परन्तु नवम्बर अथवा दिसम्बर, 1305 ई. में वे हराकर मार डाले गये। सुल्तान का हाजिबे-खास (आत्मीय कर्मचारी) ऐनुल्मुल्क मालवा का शासक नियुक्त हुआ।

इसके बाद मुसलमानों ने उज्जैन, मांडू, धार एवं चंदेरी को जीत लिया। इस तरह 1305 ई. के अन्त तक प्राय: सारा उत्तरी भारत खल्जी साम्राज्य के अधिकार के अधीन हो गया। इससे प्रोत्साहित होकर दक्षिण (दक्कन)-विजय के बारे में सोचा जाने लगा।

अपनी विजयों से खिलजी का मनोबल बढ़ गया और वह अपनी तुलना वह पैगम्बर मोहम्मद से करने लगा। उसने कहा कि जिस तरह से पैगम्बर के चार योद्धा हैं उसी तरह मेरे भी उलूग खाँ, नुसरत खाँ, जाफर खाँ और अलप खाँ चार योद्धा हैं। वह सिकन्दर से भी प्रभावित था और विश्व विजय करना चाहता था। माना जाता है कि अपने सिक्के पर उसने सिकन्दर-ए-सानी खुदवाया।

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