जन्तु विज्ञान नोट्स

जीव विज्ञान: परिचय एवं जीवधारियों का वर्गीकरण

जीव विज्ञान सजीवों का विज्ञान है (ग्रीक भाषा में बायोस का अर्थ जीवन तथा लोगोस का अध्ययन)। विज्ञान की वह शाखा, जिसके अन्तर्गत जीवधारियों का अध्ययन होता है, जीव विज्ञान कहलाती है। इस शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग लैमार्क (फ्रांस) तथा ट्रेविरेनस (जर्मन) ने 1802 में किया था। इसको पुन: दो भागों, वनस्पति (Botany) तथा जन्तु विज्ञान (Zoology) में बांटा गया है थियोफ्रेस्टस ने 500 प्रकार के पौधों का वर्णन अपनी पुस्तक Historia Plantarum में किया है। इन्हें वनस्पति शास्त्र का जनक कहा जाता है।

हिप्पोक्रेट्स ने मानव रोगों पर प्रथम लेख लिखा। इन्हें चिकित्सा शास्त्र का जनक माना जाता है। अरस्तु ने अपनी पुस्तक जंतु इतिहास (Historia Animalium) (460-377 BC) में 500 जन्तुओं का वर्णन किया है। इन्हें जंतु विज्ञान तथा जीवविज्ञान, दोनों का जनक कहा जाता है।

जीवविज्ञान का उदय, मनुष्य की सजीवों के प्रति जिज्ञासा तथा उत्तरजीविता की आवश्यकता के कारण हुआ होगा। जीवविज्ञान का ज्ञानक्रम लम्बे समय तक वैज्ञानिक तथा वैज्ञानिकों के समूहों द्वारा आविष्कार करने का फल है।

जीव वैज्ञानिक अध्ययन

जीव वैज्ञानिक कैसे कार्य करते हैं और वे क्या अध्ययन करते हैं? वे अपने चारों ओर पाई जाने वाली वस्तुओं का नामकरण, उनका विवरण और वर्गीकरण करते हैं। यहाँ तक कि आदि मानव भी इन्हीं क्रियाकलापों को जाने-अनजाने में करता रहा होगा। उसका अस्तित्व इस बात पर निर्भर करता था कि वह अपनी उपयोगी तथा अनुपयोगी वस्तुओं को पहचान सके। जीव वैज्ञानिक लगातार नए-नए जीवों की खोज करते रहे हैं तथा उन्हें वैज्ञानिक नाम देकर वर्गीकृत करते रहे हैं। आप आश्चर्य करेंगे कि क्रियाकलाप महत्वपूर्ण क्यों है? क्या आप जानते है: जन्तुओं की लगभग 1200,000 स्पीशीज हैं, जो पौधों की लगभग 500,000 स्पीशीज पर निर्भर करती हैं? इस संख्या में प्रतिवर्ष 15,000 नई प्रकार की स्पीशीज की वृद्धि हो जाती है। जिन जन्तुओं तथा पौधों की स्पीशीज का अभी पता लगाना है वे अमेरिका, एशिया तथा अफ्रीका के उष्णकटिबंधीय जंगलों में छिपी हुई हैं। प्रत्येक स्पीशीज अपने ढंग में निराली है, चाहे वह हमारे लिए आर्थिक महत्व की है या नहीं जीवविज्ञान की वह शाखा जो किसी स्पीशीज की पहचान, नाम तथा वर्गीकरण से सम्बन्ध रखती है, वर्गिकी कहलाती है। वर्गिकी चिरस्थापित विज्ञान है और जीवों के नामकरण करने के लिए अन्तर्देशीय नियम बने हुए हैं।

किसी जीव का सही वर्णन करने के लिए प्रशिक्षण तथा ऐसी शब्दावली की आवश्कता होती है, जो जीवविज्ञान के लिए अद्भुत है। आकार तथा बाह्य रचना के अध्ययन को आकारिकी कहते हैं। भीतरी रचना का बाह्य रचना से संबंध होता है। संरचनाएँ जो बाहर से समान प्रतीत होती हैं, भीतरी रचना में बिल्कुल भिन्न हो सकती हैं। ऐसे भी बहुत से उदाहरण हैं (जैसे लंगूर तथा मनुष्य) जिनमें भीतरी रचना समान होती है, लेकिन बाहरी रचना भिन्न होती है। पौधों तथा जन्तुओं की भीतरी रचना के अध्ययन को शारीरिकी कहते हैं। मानव शारीरिकी बहुत ही विशिष्ट है। आज हमारे पास मानव शारीरिकी के विषय में बहुत ही अधिक सूचनाएँ हैं। हम ऊतक की विस्तृत संरचना, विभिन्न प्रकार के प्रकाश सूक्ष्मदर्शी से देख सकते हैं। इसके लिए एक विस्तृत प्रक्रम जैसे स्पेशीमैन का स्थिरीकरण, निर्जलीकरण, अत: स्थित करना, काटना तथा अभिरति करना और फिर आरोपित करना है। ये सब अध्ययन ऊतक विज्ञान के अन्तर्गत आते हैं।

सभी जीव कोशिकाओं से बने होते हैं। कोशिका की संरचना, कार्य, जनन तथा जीवन चक्र, जीव के जीवन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कोशिका के इस अध्ययन को कोशिका विज्ञान कहते हैं। कोशिका की सूक्ष्म संरचनाओं को समझने में इलैक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप का बहुत ही अधिक योगदान रहा है। कोशिकीय स्तर पर जीवों में बहुत ही समानता होती है।

जीव विज्ञान की विभिन्न शाखाओं के जनक

शाखाजनकशाखाजनक
जीव विज्ञानअरस्तूवनस्पति विज्ञानथियोफ्रेस्टस
जीवाश्मिकीजार्ज क्यूवियरसुजननिकीएफ. गाल्टन
आधुनिक वनस्पति विज्ञानलिनियसप्रतिरक्षा विज्ञानएडवर्ड जैनर
आनुवंशिकीग्रेगर जॉन मण्डलआधुनिक आनुवंशिकीग्रेगरी बेटसन
कोशिका विज्ञानरॉबर्ट हुकवनस्पति चित्रणक्रेटियस
पादप शारीरिकीएन. गिऊजन्तु विज्ञानअरस्तू
वर्गिकीलीनियसचिकित्साशास्त्रहीप्पोक्रेटस
औतिकीमार्सेलो मैल्पीगीउत्परिवर्तन सिद्धांत के जनकह्यूगो डी. ब्राइज
तुलनात्मक शारीरिकीजी. क्यूवियरकवक विज्ञानमाइकोली
पादप कार्ययिकीस्टीफन हेल्सजीवाणु विज्ञानल्यूवेनहॉक
सूक्ष्म जीव विज्ञानलुई पाश्चरभारतीय कवक विज्ञानई. जे. बुट्लर
भारतीय ब्रायोलॉजीआर. एस. कश्यपभारतीय पारिस्थितिकीआर.डी. मिश्रा
भारतीय शैवाल विज्ञानएम. ओ. ए. आयंगरआधुनिक भ्रूण विज्ञानवॉन बेयर
एण्डोक्राइनोलॉपीथॉमस ऐडिसन

जैव अणु का भौतिक – रासायनिक संगठन, जीवविज्ञान का अत्यधिक उत्तेजक क्षेत्र है। उदाहरण के लिए न्यूक्लीक एसिड की रचना, प्रोटीन के घटक तथा उनके संश्लेषण की प्रक्रिया। अब यह विश्वास किया जाता है कि कोशिका का कार्य अणु के स्वभाव तथा उसकी पारस्परिक क्रियाओं पर निर्भर करता है। इस प्रकार के अध्ययन को अणु जैविकी जीवविज्ञान कहते हैं।

जैव-प्रक्रियाएँ जीव में घटने वाली क्रियाओं का परिणाम है। जीवन से सम्बन्धित प्रक्रियाओं तथा कायों (जैसे श्वास तथा पाचन) के अध्ययन को शरीर क्रिया विज्ञान कहते हैं।

लगभग सभी बहुकोशिकीय जीव अपना जीवन एक एकल कोशिका युग्मनज से आरम्भ करते हैं। इस प्रारम्भिक कोशिक में समन्वयित तथा क्रमबद्ध विभाजन होने से भ्रूण बन जाता है। प्रारम्भिक भ्रूण आकारविहीन होता है और यह व्यस्क से बिल्कुल भिन्न होता है। भ्रूण से व्यस्क बनने में विभिन्नता तथा वृद्धि की बहुत सी क्रमबद्ध एवं समन्वयित प्रक्रियाएँ होती हैं। अंडे के निषेचन से लेकर भ्रूण के परिवर्धन तक की क्रमबद्ध घटनाओं के अध्ययन को भ्रूण विज्ञान कहते हैं। आजकल बहुत सी विधियों द्वारा मानव के भ्रूण का अध्ययन करना सम्भव हो गया है। यहाँ तक कि गर्भावस्था में ही बच्चे के लिंग तथा जन्म के विकारों का पता भी किया जा सकता है।

कोई भी जीव पृथक रहकर जीवित नहीं रह सकता है। वे एक साथ रहते हैं और वे दूसरे जीवों तथा निर्जीव पदार्थों, जैसे-हवा, पानी तथा मिट्टी के साथ पारस्परिक क्रियाएँ भी करते हैं। जीवविज्ञान की ऐसी शाखा को, जो जीव तथा उसके वातावरण के सम्बन्ध का अध्ययन कराए, पारिस्थितिकी कहलाती है।

सभी जीवों में डी.एन.ए. आनुवंशिकी पदार्थ है। आपने जीन के विषय में सुना होगा जो रासायनिक रूप से डी.एन.ए. है। कौन से जीव हैं और वे कैसे कार्य करते हैं? यह जीन तथा उनकी वातावरण से पारस्परिक क्रिया पर निर्भर करता है। किसी स्पीशीज में स्थायीकरण अथवा परिवर्तन जीन के कारण होता है। जिज्ञासावश, कुछ जीवों जैसे तिलचट्टा तथा गिन्गो वृक्ष में लाखों वर्षों में कुछ परिवर्तन आ गए हैं। किसी स्पीशिज में आनुवंशिकी परिवर्तन होने के कारण उनका वर्गिक स्थान भी बदल गया है। जीवविज्ञान की – जो शाखा पित्रागति तथा विभिन्नता का अध्ययन करवाए, उसे आनुवंशिकी कहते हैं। आनुवंशिक का उपयोग उन्नत प्रकार की फसल तथा जानवर प्राप्त करने तथा सूक्ष्म जीवों में परिवर्तन करने के लिए किया जाता है। आनुवंशिक के नियम तथा जीव की उत्तरजीविता तथा लाभ में भी आनुवंशिकी सहायता करती है।

जीवविज्ञान की एक मूलभूत शाखा है-विकास। यह पौधों तथा जन्तुओं की समष्टि में वातावरण के प्रति लगातार होने वाले आनुवंशिक अनुकूलन का अध्ययन कराता है।

जीवविज्ञानी आदिकाल में पाए जाने वाले जीवों की उत्पत्ति, वृद्धि तथा रचना का अध्ययन करते हैं, जो आदिकाल में जीवाश्म के रूप में सरंक्षित हो गए थे। जीवविज्ञान की इस शाखा को पुरा जीवविज्ञान कहते हैं (ग्रीक भाषा में पैलिओ का अर्थ है पुराना)। पुरा वनस्पति विज्ञान पौधों के जीवाश्म का, तथा पुरा जन्तु विज्ञान जीवाश्म प्राणियों का अध्ययन है। मनुष्य अब अंतरिक्ष में स्थित जीवन के प्रकारों के अध्ययन में जानकारी प्राप्त करना चाहता है। वैज्ञानिक पूछताछ की इस शाखा को एक्सोबायोलोजी अथवा एस्ट्रोबायोलॉजी कहते हैं।

जीवविज्ञान का क्षेत्र बहुत विस्तृत है। हम अभी सीखने की ही अवस्था में है, जबकि वैज्ञानिक खोजें बहुत शीघ्रता से हो रही हैं। गत बीसवीं शताब्दी की अपेक्षा हमने अपना ज्ञान गत बीस वर्षों में अधिक बढ़ाया है।

  1. हमारे मस्तिष्क में प्रतिदिन असंख्य ऐसे प्रश्न उठते हैं। ऐसे ही प्रश्न आपने पूर्वजों ने भी पूछे होंगे। जीवविज्ञान इनमें से कुछ प्रश्नों का उत्तर दे सकता है और कुछ के ऐसे उत्तर सुझा सकता है, जिनको अभी समझना हमारे लिए कठिन है।
  2. जीवविज्ञान प्राप्त संसाधनों को उपयोगी बना सकता है, जिससे हमारी अर्थव्यवस्थाओं की पूर्ति होती है। यह परम आवश्यक है कि हमें फसलों तथा पशुओं को उत्पन्न करने का, उन्हें बीमारियों तथा पीड़कों से बचाने का तथा उनसे उपयोगी भोजन प्राप्त करने का वैज्ञानिक ज्ञान हो। हम आश्रय, कपड़े, ऊर्जा, औषधियों आदि के लिए पौधों तथा सूक्ष्मजीवों पर निर्भर करते हैं। दवाइयां, सर्जरी तथा सूक्ष्म जीवविज्ञान के ज्ञान में वृद्धि होने के कारण हम रोगों को नियंत्रित तथा उनका निदान कर पाए हैं, जिससे कि रहने का स्तर ऊँचा हो गया है।
  3. जीवविज्ञान का एक मुख्य अंग है- समस्याओं का समाधान करना। मलेरिया उन्मूलन इसका ज्वलंत उदाहरण है। जीवविज्ञानी, चिकित्सक, रसायनशास्त्री, तथा औषधि निर्माता, शिक्षक, इंजीनियर, तथा स्वास्थ्य अधिकारी, सभी ने मलेरिया उन्मूलन के लिए अपने-अपने ज्ञान को एकत्र किया है। इससे पता लगता है कि आविष्कार में अन्य विषयों के ज्ञान का लाभ लेना पड़ता है। इसलिए जीवविज्ञान सबक लिए आवश्यक है।
  4. जीवविज्ञान हमें बताता है कि हम इस जीवित उपग्रह का एक छोटा-सा भाग है और हमारा यह उत्तरदायित्व है। कि हम इसकी रक्षा करें और अन्य सभी जीवों का सम्मान करें।
क्या जानते हैं?
कुछ पौधों में फूलों के खिलने को दिन की लम्बाई तथा रात का तापक्रम नियमित करता है। कुछ बहुवर्षी पौधों में 12 से 120 वर्ष बाद एक बार ही फूल खिलते हैं। ऐसे पौधों में फल-फूल लगना विघटनकारी प्रक्रम है क्योंकि सारी आबादी समाप्त हो जाती है और बीज से नया पौधा बनता है। ऐसे पौधों को मोनोकार्पिक कहते हैं अर्थात् एक ही बार फूल खिलना और उनके फूल खिलने को ग्रिगेरियस फूल खिलना कहते हैं। भारत के उत्तर-पूर्व भाग में मोतक (मेलोकना बैम्बुसोइड्स) तथा रोथिंग (बैम्बुसा टुल्डा) में 48 वर्ष में एक बार फूल आते हैं। फूल खिलने से चूहों के कई स्पीशीज की संख्या बढ़ जाती है। चूहे बाँस के दाने खाते हैं और जब वे समाप्त हो जाते हैं तब वे पास में स्थित धान तथा मक्का की खड़ी फसलों को खाना आरम्भ कर देते हैं, जिससे इन खेतों की पैदावार की बहुत हानि होती है। इनके कारण अकाल पड़ जाता है, जिससे इन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों का जीवन प्रभावित होता है। हम न तो ग्रिगेरियस फूल खिलने के, न ही चूहों की आबादी बढ़ने के संकेत और न ही बाँस समाप्त होने के मूलभूत आधार को जानते हैं।
  1. जीवविज्ञान से पता लगता है कि हम अभी तक यह नहीं समझ पाए हैं कि पारिस्थितिक तंत्र और जीवों में पारस्परिक सम्बन्ध क्या हैं और हमें उनमें विघ्न डालने से पहले सावधान रहना चाहिए।
  2. जीवविज्ञान हमें पर्यावरण विनाश क विषय में भी सावधान करता है। पर्यावरण प्रदूषण हमारे ही क्रियाकलापों, जैसे कीटनाशी तथा उर्वरकों का बेतहाशा उपयोग करना, जंगलों का विनाश करना तथा प्रदूषकों का निष्कासन आदि से होता है।
  3. अपने विषय में ही ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रकृति का अध्ययन करना बहुत अच्छा अनुभव है। प्रकृति के अधिक निकट होने क कारण, एक जीवविज्ञानी लाखों वर्षों में हुए विकास से प्राप्त विभिन्न सजीवों को अपने चारों ओर देख सकता है। प्रकृति हमें सौन्दर्य का दर्शन कराती है, जैसे-तितलियों, पक्षियों तथा फूलों के विभिन्न रंग, विभिन्न प्रकार की आकृति, पैटर्न तथा शंख तथा कोरल की सममिति तथा उष्णकटिबंधीय नम जंगलों में विशालकाय वृक्ष तथा विसपी लताएँ, मरुस्थल में कटीली नागफनी। कवि तथा कलाकारों ने सदैव प्रकृति के सौन्दर्य की प्रशंसा की है। ज्ञान तथा समझ में वृद्धि होने से हम प्रकृति के सौन्दर्य को और अधिक अच्छी प्रकार से समझ सकते हैं।
  4. जीवविज्ञान से हमें पता लगता है कि विज्ञान का व्यवहार कैसे करें, कैसे प्रश्न करें और प्रयोगों तथा तकों द्वारा उसका सही उत्तर पता करें।

हमारे बारें में

एग्जाम टॉपर क्लास टीम

My Name is Jitendra Singh (Rana) और मैं एक सफल शिक्षक बनने की तैयारी कर रहा हूं ! और मैं लखनऊ, उत्तर प्रदेश (भारत) से हूँ।
मेरा उद्देश्य हिन्दी माध्यम में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले प्रतिभागियों का सहयोग करना है ! आप सभी लोगों का स्नेह प्राप्त करना तथा अपने अर्जित अनुभवों तथा ज्ञान को वितरित करके आप लोगों की सेवा करना ही मेरी उत्कृष्ट अभिलाषा है !!
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