जन्तु विज्ञान नोट्स

जीवमंडल Biosphere

जैव जीव विभिन्न प्रकार के आवास स्थानों में मिलते हैं, जैसे-भूतल अथवा समुद्र के जल में, बर्फ से ढके क्षेत्रों में, वायु तथा मृदा में। आप जैव जगत के संगठन से परिचित हैं। इस संगठन के पदानुक्रम को जैव वर्णक्रम की तरह माना जा सकता है, जो विभिन्न स्तरों से मिलकर बना है। इस स्तरों का प्रसार आण्वीय-कोशिकीय से लेकर पारिस्थतिकीय तंत्र तथा जीव मण्डल तक हो सकता है। विभिन्न स्तर एक-दूसरे को प्रभावित करने के अतिरिक्त ये एक-दूसरे पर निर्भर भी रहते हैं, इसलिये किसी स्तर पर अलग से विचार कर पाना कठिन है।

जीव मण्डल की अपनी संरचना होती है, जो जैव एवं अजैव घटकों से मिलकर बनी है। प्रत्येक घटक एक विशिष्ट कार्य सम्पन्न करता है। समस्त कार्यो का कुल योग जीव मण्डल को प्रकार्यात्मक स्थिरता प्रदान करता है। सम्भवत: यही कारण है कि जीव मण्डल को सबसे बड़ा जैव तंत्र माना जाता है।

जीव मण्डल-संरचना तथा कार्य

आप जनसंख्या, जैव समाज एवं पारिस्थितिक तंत्र जैसे शब्दों से परिचित हैं। किसी भी प्रजाति के एक स्थान पर पाए जाने वाले जीवों की कुल संख्या को जनसंख्या कहते हैं। किसी क्षेत्र के अन्तर्गत इन जीवों की कुल जनसंख्या सम्मिलित रूप में जैव समाज का निर्माण करती है। ये जैव समाज लगातार एक-दूसरे से तथा अपने भौतिक वातावरण से पारस्परिक क्रिया करते रहते हैं।

उदाहरण के लिए, अपने घर में आप अपने परिवार के सदस्यों के साथ पारस्परिक क्रिया करते हैं। आप पड़ोसियों के साथ भी पारस्परिक क्रिया करते हैं। पाठशाला में आप सहपाठियों, मित्रों एवं अध्यापकों के साथ पारस्परिक क्रिया करते हैं। इसी प्रकार आपका अपने आप-पास के जन्तुओं एवं पेड़ पौधों के साथ कुछ सम्बन्ध होता हैं। आप अपने भौतिक वातावरण के साथ भी पारस्परिक क्रिया करते हैं। जैव संसार में ऊर्जा एवं पदार्थ का निवेश आवश्यक है, जिनका जैव एवं अजैव घटकों के मध्य लगातार विनिमय (आदान-प्रदान) होता रहता है। यह प्रकार्यात्मक तंत्र, पारिस्थितिक तंत्र कहलाता है। उदाहरण के लिए, कोई तालाब, झील, जंगल (प्राकृतिक), खेत तथा मानव निर्मित जल-जीवशाला विभिन्न जलीय एवं स्थलीय पारिस्थतिक तंत्रों को निरूपित करते हैं।

किसी भौगोलिक क्षेत्र में समस्त पास्थितिक तंत्र एक साथ मिल कर एक और भी बड़ी इकाई का निर्माण करते हैं, जिसको जीवोम अथवा बायोम कहते हैं। उदाहरण के लिए मरुस्थली बायोम या वन बायोग में कोई तालाब, झील, घास का मैदान या वन भी दृष्टिगोचर हो सकते हैं। संसार के समस्त बायोमों को एक साथ मिलाकर एक और भी बड़ी इकाई का निर्माण होता है, जो एक विशाल स्वयंपोशी जैव तंत्र है और इसे जीवमंडल कहते हैं। जीव जंतु समुद्रतल से 7-8 किमी की ऊंचाई तक वायु में तथा 5 किमी तक की गहराई पर समुद्र के नीचे पाए जाते हैं। पृथ्वी का पोषण करने वाले ये क्षेत्र जीव मण्डल का निर्माण करते हैं।

जैसाकि आप जानते हैं पृथ्वी पर स्थल, जल तथा वायु जैव जीवों का पोषण करते हैं। पृथ्वी का जो भाग जल से बना है, वह जल मण्डल बनाता है। पृथ्वी के स्थलीय सतह पर तथा सागर जल के अन्दर भी मृदा एवं चट्टानें हैं। इस भाग को स्थल मण्डल कहते हैं। पृथ्वी सतह से ऊपर वायु पृथ्वी का गैसीय घटक है जिससे वायुमण्डल बनता है। जब हम इन तीनों मण्डलों (वायु-जल-स्थल) के साथ-साथ समस्त जैव जीवों को सम्मिलित रूप में एक बड़ी इकाई के रूप में लेते हैं, तो इसे जीव-मण्डल के रूप में जाना जाता है।

जीव मण्डल को जैव तंत्र के रूप में जाना जाता है। हम इसे तंत्र क्यों कहते हैं? शब्द कोष के अनुसार तंत्र शब्द का अर्थ है एक ऐसी इकाई जिसके विभिन्न घटक अथवा भाग सम्मिलित रूप में कुछ निवेश प्राप्त करते हैं, पारस्परिक क्रिया (प्रकार्य) करते हैं तथा उत्पाद प्रदान करने की कोई प्रविधि दर्शाते हैं, जिसके फलस्वरूप उस इकाई को कुल मिलाकर प्रकार्यात्मक स्थिरता प्राप्त होती है। उदाहरण के लिये घड़ी में चाबी भरना निवेश है, जिसका परिणाम होता है घड़ी के विभिन्न भागों में पारस्परिक क्रिया। घड़ी द्वारा समय दर्शाना इन समस्त पारस्परिक क्रियाओं का निर्गत या परिणाम है। कोई ऐसा तंत्र, जिसमें जैव तथा अजैव घटक उपरोक्त ढंग से पारस्परिक क्रिया करते हैं, किसी पारिस्थितिक तंत्र का निर्माण करते हैं या बड़े स्तर पर जीव मण्डल का निर्माण करते हैं। आइए हम जीव मण्डल का अध्ययन किसी बड़े जैव तंत्र के उदाहरण के रूप में करें। याद रहे कि जनसंख्या, समाज (जैव), भौतिक पर्यावरण (अजैव) सभी पारिस्थितिक तंत्र के घटक हैं। ये घटक पारिस्थितिक तंत्र को संरचना प्रदान करते हैं तथा लगातार होने वाली पारस्परिक क्रियायें तथा एक दूसरे पर उनकी निर्भरता के परिमाणस्वरूप ही इसके विभिन्न प्रकार्य सम्पन्न होते हैं। सम्मिलित रूप में यही प्रकार्य किसी पारिस्थितिक तंत्र को एक स्वतंत्र प्रकार्यात्मक इकाई का स्तर प्रदान करते हैं। हम किसी पारिस्थितिक तंत्र, जैसे कोई तालाब, वन, घास के मैदान इत्यादि की संरचना एवं प्रकायों का अध्ययन कर सकते हैं। यदि इस प्रकार प्राप्त समस्त जानकारी पर हम एक साथ विचार करें तो आप पाएंगे कि बड़ी इकाई, अर्थात् जीव मण्डल की संरचना तथा उसको अनेक प्रकार्य बहुत कुछ पारिस्थितिक तंत्र की संरचना तथा प्रकार्यों से मिलते-जुलते हैं।

जीव मण्डल के अजैव घटक बहुत से पदार्थों से बने हैं- जैसे, वायु, जल, मृदा तथा खनिज। प्रकाश, ताप, नमी तथा वायु दाब जैसे घटक जलवायु का निर्धारण करते हैं। किसी क्षेत्र की जलवायु, मृदा की प्रकृति तथा जल उपलब्धता से यह निश्चित होता है कि उस क्षेत्र में किस प्रकार के जीव पाए जाएंगे। वास्तव में, जैव तथा अजैव, दोनों ही घटक परस्पर एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। आप स्थलीय एवं जलीय आवासों में इन प्रभावों के बारे में अध्ययन कर चुके हैं।

जीव मण्डल में जैव-जीव पौधे एवं जन्तु हैं। तत्पश्चात्, इन जीवों को इनकी पोषण पद्धति के आधार पर उत्पादक, उपभोक्ता तथा अपघटक के रूप में वर्गीकृत किया गया है। आइए हम इन शब्दों पर विस्तारपूर्वक विचार करें। जैसा कि शब्दों से स्पष्ट है। उत्पादक वे जीव होते हैं जो खाद्य पदार्थ का उत्पादन करते हैं। हम प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया के बारे में पढ़ चुके हैं क्या आप इस वर्ग के अन्तर्गत समस्त पौधों को रख सकते हैं? यदि नहीं, तो क्यों? “उपभोक्ता’ शब्द उन जीवों के लिए प्रयुक्त होता है जो खाद्य पदार्थ का उपभोग करते हैं। ये जीव, अन्य जीवों अथवा उनके किसी अंग अथवा अंगों का अपने भोजन के रूप में उपभोग करते हैं। आप बड़ी सरलता से समस्त जंतुओं को इस वर्ग में रख सकते हैं। गाय या भैस क्या खाती हैं? वे अन्य जीव, जैसे घास को क्यों खाती हैं? जीवों का एक तीसरा वर्ग भी हैं जिसे अपघटक कहते हैं। ये सूक्ष्म जीव हैं जिनके अन्तर्गत जीवाणु तथा कवक या फंगस आते हैं। ये मृत पौधों एवं जन्तु शरीरों के अपघटन में सहायता करते हैं। क्या आप इन अपघटकों के महत्व का अनुमान लगा सकते हैं, कल्पना कीजिये कि अपघटक न होते तो मृत जीवों के शरीरों का क्या होगा? मृदा फसलों को पोषण कैसे कर सकेगी? हम इसके बारे में चर्चा बाद में करेंगे।

पोषण पद्धति के आधार पर जीवों को स्वयंपोषी एवं परपोषी के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है। आपको ज्ञात है कि पहले वर्ग के जीव अपना भोजन स्वयं बनाते हैं जबकि दूसरे वर्ग के जीव भोजन हेतु दूसरों पर निर्भर करते हैं। आप अध्ययन कर चुके हैं कि किस प्रकार जन्तु अपने भोजन के लिये पौधों एवं अन्य जन्तुओं का उपभोग करते हैं। मानव भी परपोषी है। हम भी अपना भोजन पकाकर स्वयं बनाते हैं, किन्तु यह प्रक्रिया पौधों से बहुत भिन्न है। वास्तव में हम सब्जियों एवं फलों का खाद्य पदार्थ के रूप में उपभोग करते हैं जो पौधों द्वारा प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया द्वारा बनाये जाते हैं। हम जन्तु उत्पाद भी लेते हैं, जैसे-दूध, अण्डा तथा मांस। यह भी हमें पौधों से ही प्राप्त होते हैं क्योंकि जन्तु पौधे खाते हैं।

हमारे बारें में

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My Name is Jitendra Singh (Rana) और मैं एक सफल शिक्षक बनने की तैयारी कर रहा हूं ! और मैं लखनऊ, उत्तर प्रदेश (भारत) से हूँ।
मेरा उद्देश्य हिन्दी माध्यम में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले प्रतिभागियों का सहयोग करना है ! आप सभी लोगों का स्नेह प्राप्त करना तथा अपने अर्जित अनुभवों तथा ज्ञान को वितरित करके आप लोगों की सेवा करना ही मेरी उत्कृष्ट अभिलाषा है !!
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