प्राचीन भारत का इतिहास नोट्स

चन्द्रगुप्त द्वितीय: 380-413 या 415 ई. Chandragupta II 380-413 or 415 AD.

चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य को भारत के महानतम सम्राटों में से एक माना जाता है। उसकी महानता की अभिव्यक्ति कई क्षेत्रों में मुखरित हुई है। वह क्षेत्र चाहे साम्राज्य के विस्तार का हो, चाहे शासन की सुव्यवस्था का हो, चाहे सामाजिक समृद्धि का हो अथवा साहित्य और कला के उत्कर्ष का। चन्द्रगुप्त द्वितीय या चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य का व्यक्तित्व और कृतित्व सर्वत्र उच्चतम शिखर पर दिखाई पड़ता है।

जहाँ उसके साम्राज्य के विस्तार का प्रश्न है उसकी गणना भारत के सुप्रसिद्ध विजेताओं में की जाती है। उसको अपने पिता से एक विशाल साम्राज्य मिला था। उसने इस साम्राज्य की न सुरक्षा की प्रत्युत उसका अच्छा विस्तार भी किया। चन्द्रगुप्त द्वितीय का सबसे प्रबल शत्रु गुजरात और काठियावाड़ का शक शासक था। उसने शक शासक रूद्रसिंह तृतीय को पराजित कर उसके राज्य को अपने साम्राज्य में मिला लिया।

इससे गुप्त साम्राज्य की सीमाएँ पश्चिम में अरब सागर तक पहुँच गई। इसके परिणामस्वरूप भारत के पश्चिमी देशों से सांस्कृतिक और व्यापारिक सम्बन्धों के विकास को नए आयाम मिले। उसने पश्चिमोत्तर के छोटे-छोटे राज्यों का अंत कर उत्तर भारत के पश्चिमी भाग में गुप्त साम्राज्य की सीमा का विस्तार किया।

यद्यपि महरौली के लोह स्तम्भ में जिस चन्द्र का उल्लेख किया गया है। उस पर इतिहासकार एक मत नहीं हैं, फिर भी यह कहा जा सकता है कि उन्होंने उत्तर-पश्चिम में वाह्लीक पर भी विजय स्थापित कर ली थी। यहाँ वाह्लीक से तात्पर्य बैक्ट्रिया (बल्ख) से नहीं बल्कि वाह्लीक जाति से है। उसके विजय-अभियानों में बंग विजय भी शामिल है। कुछ विद्वानों के अनुसार चन्द्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य) ने दक्षिणपथ पर पुनर्विजय प्राप्त कर गुप्तवंश पर आधिपत्य स्थापित किया था।

इन सामरिक विजयों के अतिरिक्त चन्द्रगुप्त अनेक शक्तिशाली राजवंशों से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित कर अपने साम्राज्य का विस्तार किया था। इन विविध विजयों से चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य को महान सेनानी और महान विजेता कहा गया है। उसका साम्राज्य पश्चिम में पंजाब से लेकर पूर्व में बंगाल तक और उत्तर में कश्मीर की दक्षिणी-पश्चिमी सीमा से लेकर दक्षिण-पश्चिमी में गुजरात और काढियावाड़ तक फैला हुआ था।

एक महान् विजेता होने के साथ चन्द्रगुप्त द्वितीय एक कुशल शासक भी था। उसने शासन की सुव्यवस्था की दृष्टि से विशाल गुप्त साम्राज्य को कई प्रान्तों में विभाजित कर दिया था (प्रान्तों को मुक्ति कहते थे)। प्रान्तों को जिलों में विभाजित कर दिया जाता था। जिला को विषय कहते थे। शासन में शीर्ष पर सम्राट् था जो समस्त सैविक और शासकीय शक्तियों का सर्वोच्च पदाधिकारी था। उसकी सहायता के लिए एक मंत्रि परिषद् होती थी। महाराजाधिराज, महाराज, परम भट्टारक, परम भागवत आदि उसकी विविध उपाधियाँ थीं।

गुप्त साम्राज्य में चन्द्रगुप्त द्वितीय का नाम अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। इसने विक्रमादित्य की उपाधि धारण की। भारत की साहित्यिक परम्परा में विक्रमादित्य का उल्लेखनीय स्थान है। चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय में भी भारतीय धर्म, कला, संस्कृति आदि विभिन्न क्षेत्रों में उन्नति हुई।

चन्द्रगुप्त द्वितीय के शासन-काल के कई अभिलेख उपलब्ध हुए हैं जिनमें से कई तिथियुक्त भी हैं। काल क्रम की दृष्टि से मथुरा का स्तम्भ लेख सबसे पहला है। संस्कृत भाषा में लिखा हुआ यह पहला प्रमाणिक गुप्त लेख है जिसमें तिथि का उल्लेख हुआ है। अभिलेखों में परमभृट्टारक एवं महाराज की उपाधियाँ प्रयुक्त मिलती हैं। पाशुपत धर्म की लोकप्रियता का बोध होता है और पाशुपति धर्म के लकुलीश सम्प्रदाय की मथुरा में लोकप्रियता ज्ञात होती है।

आचार्य लकु लश भगवान शिव का अंतिम अवतार था। इस आचार्य के प्रमुख शिष्यों में से कुशिक भी एक था। उसने धर्म का प्रचार-प्रसार मथुरा में किया। इस परम्परा के आचार्यों को भगवान् की उपाधि प्रदान की जाती थी और उनकी मृत्यु के पश्चात् उनके सम्मान में गुरु-मन्दिर में प्रतिमा स्थापित की जाती थी।

चन्द्रगुप्त द्वितीय के दो लेख उदयगिरी (पूर्वी मालवा) से प्राप्त हुए हैं। एक लेख मध्य प्रदेश में दीदारगंज के उत्तर पूर्व में स्थित साँची से मिला है। चन्द्रगुप्त को देवराज से सम्बोधित किया गया है। इस अभिलेख में चन्द्रगुप्त के सेनापित आम्रकार्दव द्वारा काकनादबोट के बौद्ध संघ को भिक्षुकों के भोजन और प्रकाश की व्यवस्था के निमित्त ईश्वरवासक गाँव तथा 25 दीनारों के दान का उल्लेख हुआ है। गुप्तकालीन सांस्कृतिक जीवन की झांकी इसमें प्राप्त होती है।

चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय में गुप्त मुद्रा कला अत्यधिक विकसित हुई। उसने समुद्रगुप्त कालीन मुद्राओं के आदर्श पर सिक्कों को प्रचलित किया तथा कई मौलिक प्रकार की मुद्राएँ प्रचलित कीं। उसकी विभिन्न प्रकार की मुद्राओं (धनुर्धर, सिंह-हन्ता, राजा-रानी, छत्र, पर्यक, अश्वारुढ़ आदि) से उसके व्यक्तित्व, उपलब्धियों एवं साम्राज्य-विस्तार आदि विषयों पर महत्त्वपूर्ण प्रकाश पड़ता है।

चन्द्रगुप्त द्वितीय प्रथम गुप्तकालीन शासक था जिसने चाँदी के सिक्के प्रचलित किये। रजत मुद्राएँ उसके राज्य की पश्चिमी सीमा को समझने में उपयोगी हैं। मुद्राओं से उसके साम्राज्य की समृद्धि, शान्ति तथा सांस्कृतिक प्रगति की जानकारी भी मिलती है। उसकी बहुत-सी ताम्र मुद्राएँ भी उपलब्ध हुई हैं।

साहित्यिक विकास की दृष्टि से भी चन्द्रगुप्त द्वितीय का काल अत्यन्त समृद्ध है। यद्यपि कालिदास की तिथि अभी तक विवादास्पद है लेकिन अधिकांश विद्वान् इस मत को ही मानते हैं कि कालिदास चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य (चन्द्रगुप्त द्वितीय की उपाधि) का ही समकालीन था। साहित्यिक साधनों में हम कालीदास की रचनाओं को रख सकते हैं जैसे रघुवंश, कुमारसंभव, मेघदूत, ऋतुसंहार, विक्रमोर्वशीय, मालविकाग्निमित्रम्, अभिज्ञानशाकुन्तलम्।

गुप्तकालीन वंशावलियों में समुद्रगुप्त के पश्चात् चन्द्रगुप्त द्वितीय का नाम आता है। गुप्तकालीन अभिलेखों में वर्णन आया है कि चन्द्रगुप्त द्वितीय को समुद्रगुप्त ने अपना उत्तराधिकारी चुना। उसके लिए तत्परिगृह शब्द का प्रयोग मिलता है। इससे तात्पर्य है उसके पिता द्वारा ग्रहण किया हुआ।

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