भूगोल (विश्व) नोट्स/ सामान्य अध्ययन

Earth Introduction to Physical Geology 

Earth Introduction to Physical Geology 

पृथ्वी परिचय

पृथ्वी का परिक्रमण तथा ऋतुएँ ( Revolution of Earth and Seasons )

21 जून को उत्तरी ध्रुव और 22 दिसम्बर को दक्षिणी ध्रुव सूर्य की ओर झुके होते हैं पर 21 मार्च और 23 सितम्बर को कोई भी ध्रुव सूर्य की ओर झुका नहीं होता ! 21 जून वाली स्थिति को ग्रीष्म अयनान्त( Summer solistice ) तथा 22 दिसम्बर वाली स्थिति को शीतअयनान्त ( Winter solistice )अथवा मकर सक्रांति कहते हैं,क्योंकि इस तिथि के बाद सूर्य उत्तर की ओर यात्रा आरंभ कर देता है जिसे उत्तरायण कहते हैं जो छः मास का होता है

21 मार्च और 23 सितम्बर को जब कोई भी ध्रुव सूर्य की ओर झुका हुआ नहीं होता है तो दोनों गोलार्द्धों में दिन- रात 12 घण्टे के होते हैं अर्थात दिन- रात बराबर होते हैं तो इसे विषुव कहते हैं 23 सितम्बर को शरद विषुव कहते हैं 21 मार्च को वसन्त विषुव, 3 जनवरी को उपसौर और 4 जुलाई की स्थिति को अपसौर कहते हैं उपसौर अर्थात 3 जनवरी को सूर्य, पृथ्वी के अधिक समीप रहता है जबकि अपसौर अर्थात 4 जुलाई को सूर्य व पृथ्वी के बीच की दूरी सर्वाधिक होती है

ग्लोब ( Globe )

हमारी पृथ्वी गोलाभ ( Spheroid ) है जो सूर्य की परिक्रमा अपने दीर्घवृत्ताकार ( Elliptical ) पथ पर करती है ग्लोब पृथ्वी का यथार्थ निरूपण है यद्यपि ग्लोब पर धरातल की आकृतियों एवं दिशाओं का प्रदर्शन शुद्धतापूर्वक किया जा सकता है, तथापि ग्लोब के प्रयोग में कई असुविधाएँ आती हैं ग्लोब पर सभी स्थान अक्षांश एवं देशान्तर रेखाओं (जो काल्पनिक रेखाएँ हैं) की सहायता से दर्शाए जाते हैं

अक्षांश रेखा ( Latitude line )
किसी स्थान की भूमध्य रेखा से उत्तर तथा दक्षिण की ओर कोणात्मक दूरी को उस स्थान का अक्षांश कहते हैं एक ही कोणात्मक दूरी वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा को अक्षांश रेखा कहते हैं भूमध्य रेखा से ध्रुवों तक 90° अक्षांश होते हैं (दोनों ध्रुवों की ओर 90°-90°)! भूमध्य रेखा से हम ज्यों-ज्यों ध्रुवों की ओर जाएंगे, अक्षांश रेखा का मान बढ़ता जाएगा यदि हम भूमध्य रेखा से उत्तर की ओर जाएंगे तो उस स्थान का अक्षांशीय मान (°N) में लिखेंगे और दक्षिण जाने पर °(S) में लिखेंगे सभी अक्षांश रेखाएं समांतर होती हैं और दो अक्षांशो के मध्य की दूरी लगभग 111 किलोमीटर होती है

विषुवत् रेखा सबसे बड़ी अक्षांश रेखा (40,069 किमी) होती है विषुवत् रेखा से ध्रुवों की ओर जाने पर वस्तु के भार में बढ़ोतरी होती है जो घूर्णन बल में कमी के कारण होती है उत्तरी गोलार्द्ध में विषुवत् रेखा से 23½° अंश पर खींचा गया काल्पनिक वृत कर्क रेखा है दक्षिणी गोलार्द्ध में विषुवत् रेखा से 23½° अंश पर खींचा गया काल्पनिक वृत मकर रेखा है
66½° N अक्षांश रेखा को आर्कटिक वृत्त एवं 66½° S को अण्टार्कटिक वृत्त कहते हैं इन्हें उप-ध्रुवीय वृत्त भी कहा जाता है इसी काल्पनिक रेखा पर पृथ्वी का अक्ष बिंदु स्थित है

देशान्तर रेखा ( Longitude line )

उत्तरी तथा दक्षिणी ध्रुव को मिलाने वाली काल्पनिक रेखाओं को देशान्तर रेखाएं कहते हैं यह रेखाएं समानान्तर नहीं होती हैं, क्योंकि ध्रुवों से विषुवत् रेखा की ओर बढ़ने पर देशान्तरो के बीच की दूरी बढ़ती जाती है तथा विषुवत् रेखा पर इनके बीच की दूरी अधिकतम 111.32 किमी होती है ब्रिटेन के ग्रीनविच (जहां प्राचीन वेधशाला अवस्थित है) से गुजरने वाली रेखा को प्रधान मध्याह्न रेखा ( Greenwich Mean Time, GMT ) कहते हैं एंव इसके दोनों और 180° अंशों में देशांतर रेखाएं विभाजित हैं चूँकि 1° देशान्तर रेखा को पार करने में 4 मिनट का समय लगता है अन्तः प्रधान मध्याह्न रेखा 0°से 90° पूर्व या पश्चिम पर जाने में 6 घण्टे का समय लगेगा

भारत में माध्य प्रमाणिक समय ( Mean Standard Time) रेखा 82½° पूर्व मिर्जापुर (उत्तर प्रदेश) से होकर गुजरती है जो ग्रीनविच मध्याह्न से 5 घण्टे 30 मिनट आगे है समय की सुविधा एंव देश में एकरूपता बनाए रखने के लिए अधिकांश देशों में एक ही मध्य प्रमाणिक समय निर्धारित किया गया है जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका में 7 एवं सर्वाधिक 9 टाइमजोन रूस में है वही ऑस्ट्रेलिया में 3 टाइमजोन है भारत एवं चीन में एक टाइमजोन निर्धारित है क्रोनोमीटर यंत्र की सहायता से ग्रीनविच समय के साथ साथ किसी भी स्थान का देशान्तर ज्ञात किया जाता है

वृहत वृत्त और न्यून वृत्त ( Large circle and low circle )

वृहत वृत्त वे वृत्त होते हैं जिनके तल पृथ्वी के बीचो-बीच से गुजरते हुए पृथ्वी को दो समान भागों में विभक्त करते हैं जो वृत्त पृथ्वी के बीच से नहीं गुजरते हैं और न ही पृथ्वी को दो समान भागों में बाँटते हैं न्यून वृत्त (Low circle) कहलाते हैं भूमध्य रेखा एवं सभी देशान्तर रेखाएँ वृहत वृत्त होती हैं नाविक वृहत वृत्तों का अनुसरण करते हैं क्योंकि ये पृथ्वी पर किन्ही दो स्थानों के बीच की न्यूनतम दूरी को दर्शाते हैं धरातल पर अनेक वृहत वृत्त खींचे जा सकते हैं

अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा ( International date line )

1884 ई. में वाशिंगटन में हुई सन्धि के बाद 180° याम्योत्तर के लगभग(स्थलखण्डों को छोड़कर) एक काल्पनिक रेखा निर्धारित की गई, जिसे अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा (International Date Line IDL) कहा जाता है अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा आर्कटिक सागर, चुक्सी सागर, बेरिंग जलसन्धि व प्रशान्त महासागर से गुजरती है बेरिंग जलसन्धि अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा के समान्तर स्थित है

इस रेखा के पूर्व से पश्चिम की ओर यात्रा करने या पार करने पर 1 दिन घट जाएगा, जबकि पश्चिम से पूर्व की ओर यात्रा करने पर 1 दिन बढ़ जाएगा अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा सीधी ना होकर टेढी- मेढी है ताकि यह किसी स्थलखण्ड से होकर न गुजरे ! यह रेखा चार बार विचलित होती है
वर्ष 2011 में समोआ द्वीप को अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा के पश्चिम में कर दिया गया है इसी तरह टोकेलाऊ भी अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा के पश्चिम में आ गया है इस परिवर्तन का कारण इन द्वीपों की ऑस्ट्रेलिया व न्यूजीलैंड से भौगोलिक समीपता एवं व्यापार की अधिकता है

ग्रहण ( Eclipse )

किसी खगोलीय पिण्ड का अन्धकारमय हो जाना ग्रहण कहलाता है ग्रहण दो प्रकार के होते हैं
1. चन्द्रग्रहण 2.सूर्यग्रहण

1. चन्द्रग्रहण ( Lunar eclipse )

जब पृथ्वी की छाया चन्द्रमा पर पड़ती है तो उसे चन्द्रग्रहण कहते हैं चन्द्रग्रहण आंशिक या पूर्ण हो सकता है पूर्ण चन्द्रग्रहण तब होता है जब चन्द्रमा पूरी तरह से पृथ्वी की छाया से ढक जाता है जबकि आंशिक चन्द्रग्रहण की स्थिति में चन्द्रमा का एक भाग ही पृथ्वी की छाया के अधीन आता है

पूर्ण चन्द्रग्रहण लगभग 1 घण्टे 40 मिनट तक का होता है यह स्थिति तब बनती है, जब सूर्य और चन्द्रमा के बीच पृथ्वी होती है और तीनों एक रेखा में होते हैं स्थिति को सिजगी कहते हैं यह स्थिति केवल पूर्णिमा को ही बनती है अतः चन्द्रग्रहण पूर्णिमा को ही होता है, किंतु सभी पूर्णिमा को नहीं, इसका कारण पृथ्वी के सापेक्ष चन्द्रमा का 5° झुकाव है जिन क्षेत्रों में पूर्ण चन्द्रग्रहण दिखाई देता है वहां की स्थिति को प्रच्छाया कहते हैं और जिन क्षेत्रों में अर्द्ध- चन्द्रग्रहण दिखाई देता है उन्हें उपच्छाया कहते हैं

2. सूर्यग्रहण ( Solar Eclipse )

जब सूर्य व पृथ्वी के बीच चन्द्रमा आ जाता है तो पृथ्वी के जिन क्षेत्रों में चन्द्रमा सूर्य को ढक लेता है वहां सूर्यग्रहण होता है सूर्य ग्रहण पूर्ण या आंशिक हो सकता है पूर्ण सूर्यग्रहण में सूर्य का कोरोना भाग दिखाई देता है यहाँ उल्लेखनीय है कि चन्द्रमा पश्चिम दिशा से सूर्य को ढकना आरम्भ करता है और आकाश में नीला- काला दिखाई देता है वर्ष में न्यूनतम 2 तथा अधिकतम 5 सूर्यग्रहण हो सकते हैं

सूर्यग्रहण के दौरान अन्धकारमय काल अवधि अधिकतम 7 मिनट 40 सेकण्ड तक हो सकती है औसतन यह अवधि 2.5 मिनट होती है सूर्य ग्रहण को कभी भी नग्न आंखों से नहीं देखना चाहिए, क्योंकि सूर्यग्रहण के समय कोरोना के विकिरण (पराबैंगनी किरणों) से भी आंखें चले जाने का खतरा रहता है

हमारे बारें में

J.S.Rana Sir

My Name is Jitendra Singh (Rana) और मैं एक सफल शिक्षक बनने की तैयारी कर रहा हूं ! और मैं लखनऊ, उत्तर प्रदेश (भारत) से हूँ।
मेरा उद्देश्य हिन्दी माध्यम में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले प्रतिभागियों का सहयोग करना है ! आप सभी लोगों का स्नेह प्राप्त करना तथा अपने अर्जित अनुभवों तथा ज्ञान को वितरित करके आप लोगों की सेवा करना ही मेरी उत्कृष्ट अभिलाषा है !!
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