मध्यकालीन भारत का इतिहास नोट्स

आर्थिक और सामाजिक अवस्था: सल्तनत काल

आर्थिक अवस्था

तुर्क-अफगान-शासन की तीन शताब्दियों के अन्दर भारत के बहुसंख्यक लोगों की आर्थिक अवस्था का ठीक-ठीक अनुमान करना आसान नहीं है। फिर भी इतिहास-ग्रंथों, अमीर खुसरो की पुस्तकों, जनविश्वासों एवं कहानियों, कविता एवं ग्रामगीतों, हिन्दू एवं मुस्लिम रहस्यवादियों की रचनाओं, व्यवहारिक कलाओं के ग्रन्थों, कानून एवं नीति-शास्त्र की किताबों, विदेशी यात्रियों के विवरणों तथा कुछ सरकारी एवं व्यक्तिगत पत्र-व्यवहार के आकस्मिक उल्लेखों का संग्रह कर हाल में इस बात का पता लगाने के प्रयत्न किये गये हैं।

उस समय देश अपने अकथित धन के लिए प्रसिद्ध था। फरिशता हमें बतलाता है कि किस प्रकार महमूद गजनवी विशाल मात्रा में लूट का माल ले गया तथा यह ध्यान देने योग्य है कि मुहम्मद बिन तुगलक के अविवेकपूर्ण अपव्यय तथा उत्तर तुगलक-युग की बहुत समय तक रह गयी अव्यवस्था के बाद भी तैमूर ने दिल्ली में अपार धन लूटा।

पर राज्य कोई ऐसी व्यापक आर्थिक-नीति विकसित नहीं कर सका। जिसका ध्येय लोगों की दशा में सुधार करना हो। खल्जियों अथवा तुगलकों ने जो थोडे प्रयोग किये भी, उनका कोई स्थायी परिणाम नहीं हुआ। एक आधुनिक मुसलमान लेखक लिखता है कि- सामान्य रूप से उत्पादन के तरीके में कोई बड़ा सुधार, आर्थिक सम्पत्ति का और भी समान वितरण अथवा विभिन्न सामाजिक वगों की आर्थिक स्थिति की अधिक उत्तम व्यवस्था राज्य की नीति के बाहर थी।

फिर भी भारत में व्यवसायिक संगठन तथा विस्तृत आन्तरिक एवं बाह्य व्यापार की परंपराएं थीं। व्यवसायिक संगठन ग्राम-समुदायों तथा नागरिक क्षेत्रों के संघों और शिल्पों द्वारा होता था। व्यापार, आलोच्य काल में राज्य के मार्ग-प्रदर्शन एवं समर्थन के अभाव के बावजूद, राजनैतिक क्रान्तियों के आघातों के बाद भी जीवित रहा।

दिल्ली के सुल्तानों तथा आगे चलकर कुछ छोटे प्रान्तीय शासकों ने केवल अपनी राजनैतिक एवं प्रशासनिक आवश्यकताओं के लिए व्यवसायों और व्यापार को प्रोत्साहन दिया। इस तरह दिल्ली के शाही कारखानों में सुल्तानों की मांगों की पूर्ति के लिए दूसरी चीजों के कारीगरों के अतिरिक्त कभी-कभी रेशम के चार हजार जुलाहे नियुक्त किये जाते थे।

आज की तरह कारखाने (फैक्ट्रियाँ) अथवा बड़े पैमाने पर व्यवसायिक संगठन नहीं थे। अधिकतर कारीगरों का सम्बन्ध सीधे व्यापारियों से रहता था, यद्यपि कभी-कभी वे अपने माल मेलों में बेच लेते थे तथा उनमें से कुछ कतिपय दिलेर व्यापारियों द्वारा उनकी (व्यापारियों की) देखरेख मे माल तैयार करने को रख लिये जाते थे।

यद्यपि कृषि अधिकतर लोगों की जीविका थी, पर देश के नागरिक एवं ग्रामीण क्षेत्रों में कुछ महत्त्वपूर्ण व्यवसाय भी थे। ये थे-बुनाई का व्यवसाय, जिसमें सूती, ऊनी एवं रेशमी कपड़ों का व्यवसाय सम्मिलित था; रँगने का व्यवसाय तथा सूती कपड़े पर नक्शे की छपाई; चीनी का व्यवसाय; धातु का कार्य; पत्थर तथा ईंट का कार्य तथा कागज का व्यवसाय।

छोटे व्यवसाय थे- प्याले बनाना; जूते बनाना; अस्त्र बनाना विशेषकर धनुष तथा बाण; इत्रों, आसवों तथा मादक द्रव्यों का व्यवसाय इत्यादि। बंगाल तथा गुजरात बुने हुए सामानों के व्यवसाय और निर्यात में विशेष रूप से प्रसिद्ध थे। बंगाल के माल की उत्तमता की प्रशंसा अमीर खुसरो तथा विदेशी यात्रियों ने मुक्त कंठ से की है।

इन विदेशी यात्रियों के नाम इस प्रकार हैं- जो 1406 ई. में बंगाल आया था; बार्थेमा, जो सोलहवीं सदी के प्रारम्भिक भाग (1503-1508 ई.) में भारत आया था; तथा बारबोसा, जो यहाँ 1518 ई. के लगभग आया था।

इस युग में भारत के आंतरिक व्यापार का परिमाण बड़ा था। केवल राज्य के एकाधिकार अथवा कठोर प्रशासनिक नियंत्रण के कारण यह कभी-कभी निष्फल हो जाता था। उसका बाह्य जगत् के साथ व्यापारिक सम्बन्ध भी ध्यान देने योग्य है, समुद्र-मार्ग से उसका व्यापारिक सम्बन्ध यूरोप के दूरस्थ क्षेत्रों, मलय द्वीप-पुंज तथा चीन एवं प्रशान्त महासागर के अन्य देशों के साथ था।

स्थल-मार्गों से उसका संबंध मध्य एशिया, अफगानिस्तान, फारस, तिब्बत और भूटान के साथ था। मसालिकुल-अवसर का लेखक लिखता है, सभी देशों के व्यापारी भारत से शुद्ध सोना ले जाने से कभी नहीं चूकते तथा उसके साथ ही जडीबूटियों गोंद के सामान ले जाते हैं। मुख्य आयात थे धनी वर्ग के लिए विलास की वस्तुएँ, घोडे एवं खच्चर।

मुख्य निर्यात थे कृषि-सम्बन्धी माल की किस्में गौर बुने हुए सामान। कम महत्त्वपूर्ण निर्यात थे सफेद मिलावटी धातु, अफीम, नील की टिकिया आदि। फारस की खाड़ी के चारों ओर के कुछ देश अपने भोजन की आपूर्ति के लिए भारत पर पूर्णतः निर्भर थे।

उस समय भारत के निर्यात व्यापार के लिए मुख्यत: बंगाल तथा गुजरात के बन्दरगाह प्रयुक्त होते थे। बर्थोमा ने बंगाल को रुई, अदरक, चीनी अन्न तथा हर प्रकार के मांस के लिए संसार का सबसे अधिक समृद्ध देश समझा जाता था।

सम्पूर्ण युग में वस्तुओं के मूल्य एक से नहीं थे। दुर्भिक्ष तथा अभाव के समय में ये असाधारण रूप से बढ़ जाते थे, पर अत्याधिक उत्पादन के समय में बहुत घट जाते थे। इस प्रकार मुहम्मद बिन तुगलक के राज्यकाल में भीषण दुर्भिक्षों के कारण अनाज का मूल्य सोलह तथा सत्रह जीतल प्रति सेर हो गया तथा बहुत से लोग भूख से मर गये।

सिंध पर फ़िरोज शाह के द्वितीय आक्रमण के बाद उस प्रान्त में इसके फलस्वरूप हुए अभाव के कारण अन्न का मूल्य प्रति पसेरी (पाँच सेर) आठ और दस जीतल तथा दलहन का चार और पाँच टंका प्रतिमन अथवा क्रमश: 6.4 और 8 जीतल प्रति सेर हो गया। फिर इब्राहिम लोदी के राज्य-काल में मूल्य बहुत ही कम थे।

एक बहलोली से, जिसका मूल्य 1.6 जीतल के बराबर था, दस मन अनाज, पाँच सेर तेल तथा दस गज मोआ कपड़ा खरीदा जा सकता था। अलाउद्दीन के राज्य-काल के मूल्य स्वाभाविक समझे गये हैं। ये थे (प्रतिमन के हिसाब से)- गेहूँ-साढ़े सात जीतल, जौ-चार जीतल, धान अथवा चावल-पाँच जीतल, दहलन-पाँच जीतल, मसूर-तीन जीतल, चीनी (सफेद)-सौ जीतल, चीनी (मुलायम-साठ जीतल, भेड़ का मांस-दस जीतल तथा घी-सोलह जीत)।

दिल्ली की मलमल सत्रह टके में एक टुकड़े के हिसाब से आती थी और अलीगढ़ की छ: टके में एक। प्रत्येक मोटे कम्बल का मूल्य छ: जीतल था तथा प्रत्येक महीन कम्बल का छत्तीस जीतल था। अलाउद्दीन, मुहम्मद बिन तुगलक तथा फीरोज शाह के राज्यकालों के सामनों के मूल्यों की तुलना करने पर हम पाते है कि साधारणत: द्वितीय सुल्तान के राज्य-काल में ये बढ़ गये थे पर फीरोज शाह के राज्य काल में ये फिर घटकर अलाउद्दीन के राज्य-काल की पुरानी सतह पर चले आये।

सामान्यतः दोआब, प्रदेश तथा प्रान्तों में भोजन तथा वस्तुएँ सस्ती थीं। इब्नबतूता लिखता है कि ऐसा देश नहीं देखा था, जहाँ वस्तुएँ बंगाल से अधिक हों। तीन मनुष्यों के एक परिवार के वार्षिक खर्च के लिए यहाँ आठ दिरहम काफी थे। पर हम लोगों के पास उस जमाने के किसी भारतीय की औसत आय तथा जीवन-व्यय काटने का कोई साधन नहीं है।

और भी, हमें इस पर ध्यान देना आवश्यक है कि देश-विशेष रूप से बंगाल-मुद्रा का असाधारण अभाव झेलता रहा। अत: यह निश्चित करना एक तौर से कठिन है कि उस समय में प्रचलित वस्तुओं के कम मूल्यों से लोग कहाँ तक लाभान्वित हुए।

समाज के विभिन्न-वगों के रहने के स्तर के सम्बन्ध में यह जान लेना आवश्यक है कि धनी वर्गों तथा कृषकों की जीवन-शैली में लगभग धरती और पाताल का फर्क था। जबकि शासक-वर्ग तथा अधिकारी-वर्ग संपत्ति और विलास में हिलकोरे लेते थे, भूमि जीतने वालों की रहन-सहन का स्तर बहुत नीचा था।

कर का बोझ उन पर बहुत अधिक रहा होगा तथा उनकी दशा दुर्भिक्ष के समय दयनीय हो जाती थी, जब उन तक पर्याप्त सहायता के साधन नहीं पहुँचाये जा सकते थे। अमीर खुसरो का यह कथन् मृहत्त्वपूर्ण है कि- राजमुकुट का प्रत्येक मोती दरिद्र किसान के अश्रुपूर्ण नेत्रों से गिरे हुए रक्तबिन्दु का ठोस रूप है।

बाबर, जो भारतीय ग्रामीण जनों की अत्यल्प आवश्यकताओं से चकित हुआ था, लिखता है- लोग जहाँ वर्षों से रहते आये हैं, वहाँ से लगभग डेढ़ दिनों में बिलकुल गायब हो जाते हैं। इस प्रकार मध्यकालीन भारत के कृषक अपने आधुनिक काल के वंशजों से अधिक सम्पन्न नहीं मालूम पड़ते।

पर आज के मापदंडों से विचार करने पर उनकी आवश्यकताएँ कम थीं। गाँव आर्थिक क्षेत्र में स्वत: पूर्ण थे, अत: ग्रामीण जनता की साधारण आवश्यकताएँ स्थानीय रूप से उनके संतोषानुकूल पूरी हो जाती थीं। और भी, राजधानी की राजनैतिक क्रान्तियों तथा षड्यंत्रों के बावजूद गाँववाले बिलकुल बेफिक्री के साथ अपने साधारण जीवन-व्यापार चलाते थे। दरबार की राजनीति ग्रामजीवन की सीधी गति में कभी बाधा नहीं देती थी।

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