मध्यकालीन भारत का इतिहास नोट्स

आर्थिक अवस्था: विजयनगर साम्राज्य

भू-राजस्व प्रशासन- राजस्व नगद और उपज दोनों में वसूल किया जाता था। नगद राजस्व को सिद्धदाय कहा जाता था। भू-राजस्व से सम्बंधित विभाग अठनवे विभाग कहलाता था और भू-राजस्व को शिष्ट कहा जाता था। विजयनगर साम्राज्य में विभेदकारी कर पद्धति प्रचलित थी।

जमीनो को कई भागों में विभाजित किया जाता था, यथा भीगी जमीन, सूखी जमीन और वन एवं जंगल। भू-राजस्व की राशि उपज के 1/6 भाग से 1/3 भाग तक निर्धारित थी। ब्राह्मणों को उत्पादन का 1/20 भाग कर के रूप में देना पड़ता था और मंदिरो को 1/30 भाग देना पड़ता था। सैनिक विभाग को कन्दाचार कहा जाता था और उसके प्रमुख महादण्डनायक कहलाते थे। न्यायालय चार प्रकार के होते थे- 1. तिस्ठिता 2. चल 3. मुद्रिता और 4. शास्त्रिता। कानून के सम्बन्ध में याज्ञवल्क्य स्मृति और पराशर स्मृति पर माधव का टीका महत्त्वपूर्ण ग्रंथ था।

भू-राजस्व कर के अतिरिक्त व्यवसायों एवं मकानों पर भी कर लगते थे। राजमहल की सुरक्षा से सम्बन्धित अधिकारी कवलकरस था। वह नायको के अन्दर कार्य करता था। कभी-कभी पुलिस के अधिकारों को बेच दिया जाता था जिसे पदिकावल कहा जाता था। पुलिस कर को अरसुस्वतंत्रम् कहा जाता था।

विदेशी विवरणों एव अन्य साधनों से भी यह स्पष्ट है कि विजयनगर साम्राज्य में असीम समृद्धि थी। राज्य के विभिन्न भागों में खेती उन्नति पर थी तथा राज्य सिंचाई की एक बुद्धिमत्तापूर्ण नीति का अनुसरण करता था। भूमि अधिकार के एक श्रेणी के अन्तर्गत सिंचाई में पूंजी निवेश के द्वारा आय प्राप्त की जाती थी।

तमिल क्षेत्र में इसे दशवन्दा एवं आन्ध्र तथा कर्नाटक में कटट्कोडर्गे कहा जाता था। ग्राम में कुछ विशेष सेवाओं के बदले भूमि प्रदान की जाती थी, ऐसी भूमि को उबलि कहा जाता था। युद्ध में मारे को दी गयी भूमि को रत्तकोडगै कहलाती थी। पट्टे पर ली गयी कुट्टगि कहा जाता था। भू-स्वामी एवं पट्टेदार के बीच उपज की हिस्सेदारी को वारम कहा जाता था। कृषक मजदूर कुदि कहलाते थे। कभी-कभी खरीद बिक्री के साथ कृषक मजदूर भी हस्तांतरित कर दिये जाते थे।

विदेशी व्यापार उन्नत अवस्था में था। मालावर तट पर सबसे महत्त्वपूर्ण बन्दरगाह कालीकट था। अब्दुर्र रज्जाक के अनुसार, सम्पूर्ण साम्राज्य में 300 बंदरगाह थे। निर्यात की मुख्य वस्तुएँ कपड़ा, चावल, शोरा, लोहा, चीनी एवं मशालें। साम्राज्य में आयात की मुख्य वस्तुएँ घोडे, मुक्ता, ताँबा, मुंगा, पारा, चीनी, रेशम और मखमल। बारबोसा के अनुसार दक्षिण भारत के जहाज मालद्वीप में बनते थे।

अब्दुर्र रज्जाक के अनुसार, चुंगीघर के आफीसर व्यापारिक सामानों की देख-रेख करते थे और बिक्री पर 40वाँ हिस्सा कर के रूप में लेते थे। मलक्का के साथ काली मिर्च का अच्छा व्यापार था। इतालवी यात्री बार्थेमा (1505 ई.) के अनुसार कैम्बे के निकट बहुत बड़े परिमाण में सूती वस्त्र बनते थे और हर साल सूती और सिल्क वस्त्र से लादे हुए 40 या 50 जहाज विभिन्न देशों में भेजे जाते थे। विजयनगर साम्राज्य में सिक्के बनाने के लिए तीन प्रकार के धातु प्रयुक्त होते थे- सोना, चाँदी और ताँबा। अब्बदुर रज्जाक भी शाही टकसाल का उल्लेख करता है।

सोने के सिक्के बराह और पेरदा कहलाते थे जबकि मिश्रित धातु (सोना और चाँदी) परतब (वराह का आधा), फनम (परतब का आधा हिस्सा) कहलाते थे। इन सब सिक्कों में फनम सबसे ज्यादा उपयोगी था। चाँदी का सिक्का टार (फनम का छठा हिस्सा) था और ताँबे का सिक्का डिजटेल कहलाता था।

विदेशी व्यापार में वस्तु विनिमय की अपेक्षा मुद्रा की अधिक आवश्यकता थी। विजयनगर साम्राज्य में अनेक टकसाले थीं तथा प्रत्येक प्रांतीय राजधानी की अपनी टकसाल होती थी। स्थानीय मुद्राओं के अतिरिक्त तटीय क्षेत्रों में विदेशी मुद्रा भी प्रचलित थी-जैसे पुर्तगाली मुद्रा कुज्रेडो, फारसी-दीनार, इटली का फ्लोरीन तथा दुकत।

ग्रामीण विकास में मंदिरों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती थी। मंदिर कृषि और व्यापार के अतिरिक्त सूद पर भी रुपये देते थे। ऋण पर ब्याज की दर 12 प्रतिशत से 30 प्रतिशत तक वार्षिक होता था। जब कर्जदार ऋण नहीं चुका पाता था तो उसकी भूमि मंदिर की हो जाती थी। मंदिर ही बंजर भूमि खरीद कर और उस पर जुलाहों को बसा कर अथवा सिंचाई योजनाओं का निरीक्षण कर ग्राम विकास को प्रोत्साहन देते थे।

प्रमुख व्यवसाय बुने हुए कपड़ों, खानों की खुदाई तथा धातुशोधनविद्या से सम्बन्धित थे तथा छोटे व्यवसायों में सबसे महत्वपूर्ण गंधी का पेशा था। राज्य के आर्थिक जीवन में शिल्पियों एवं व्यापारियों के संघों का एक महत्वपूर्ण भाग था। अब्दुर्रज्जाक लिखता है- प्रत्येक पृथक संघ अथवा शिल्प के व्यापारियों की दुकानें एक दूसरे के निकट हैं। पीज भी कहता है- प्रत्येक गली में मंदिर है, क्योंकि ये (मंदिर) सभी शिल्पियों तथा व्यापारियों की संस्थाओं (से संस्थाएँ हम लोगों के देश के गिल्ड के समान होती हैं जिन्हें आप जानते हैं) के होते हैं।

राज्य की आर्थिक अवस्था की सबसे उल्लेखनीय विशेषता थी देश के भीतर का, तटवर्ती एवं सामुद्रिक व्यापार। मालाबार तट पर सबसे महत्वपूर्ण बन्दरगाह कालीकट था तथा अबुर्रज्जाक के लेखानुसार साम्राज्य में तीन सौ बन्दरगाह थे। इसका भारत-महासागर के द्वीपों, मलय द्वीपपुज, बर्मा, चीन, अरब, फारस, दक्षिण अफ्रीका, अबिसीनिया एवं पुर्तगाल के साथ व्यापारिक सम्बन्ध था।

निर्यात की मुख्य वस्तुएँ कपड़ा, चावल, लोहा, शोरा, चीनी एवं मसाले थे। साम्राज्य के आयात घोडे, हाथी, मुक्ताएँ, ताम्बा, मूंगा, पारा, चीनी, रेशम एवं मखमल थे। देश के आन्तरिक व्यापार के लिए यातायात के सस्ते साधन कावडी, सिर पर बोझ ढोने वाले, लद्दू घोडे, लददू बैल, गाड़ियाँ एवं गधे थे।

तटवर्ती एवं सामुद्रिक व्यापार के लिए जहाजों का व्यवहार किया जाता था। बारबोसा के लेखानुसार दक्षिण भारत के जहाज मालदीप द्वीपों में बनते थे। अभिलेख-सम्बन्धी प्रमाण से यह सिद्ध होता है कि विजयनगर के शासक जहाजी बेड़े रखते थे तथा पुर्तगीजों के आगमन के पहले वहाँ के लोग जहाज-निर्माण कला से परिचित थे। पर हम लोगों को इस बात का कोई निश्चित ज्ञान नहीं है कि किस प्रकार विजयनगर-साम्राज्य समुद्री यातायात के महत्वपूर्ण प्रश्न को हल करता था।

विजयनगर-साम्राज्य के सिक्के विभिन्न प्रकार के होते थे। ये सोने और ताँबे दोनों के थे चाँदी के सिक्के का एक ही नमूना था। सिक्के पर विभिन्न देवताओं एवं पशुओं के प्रतीक रहते थे, जो शासकों के धार्मिक विश्वास के अनुसार बदलते रहते थे। वस्तुओं के मूल्य कम थे। विदेशी यात्रियों के विवरणों से हमें मालूम होता है कि उच्च वर्ग के लोगों के रहने का स्तर ऊँचा था। पर अभिलेखों से हम जानते हैं कि साधारण जनता भारी करों के बोझ से कराह रही थी, जो स्थानीय शासकों द्वारा कड़ाई से वसूले जाते थे। कभी-कभी सर्वोच्च शासक इन स्थानीय शासकों पर प्रतिबन्ध लगाते थे।

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