प्राचीन भारत का इतिहास नोट्स

गुप्त काल में अर्थव्यवस्था Economy in the Gupta period

गुप्तकाल में समाज, धर्म, कला, साहित्य व विज्ञान के विकास के साथ ही एक मजबूत आर्थिक ढाँचे का गठन हुआ। विभिन्न क्षेत्रों में गुप्तकाल की उपलब्धियों के कारण ही इसे क्लासिकल एज की संज्ञा दी गई है। गुप्तकाल के सांस्कृतिक विकास में इसकी आर्थिक समृद्धि का प्रमुख योगदान रहा है।

कृषि, उद्योग और व्यापार में इस काल में काफी वृद्धि हुई। कई इतिहासकारों ने गुप्तकाल के अंतिम चरण में सामंतवाद का उदय बताया है और सामन्तीय व्यवस्था को देश की अर्थव्यवस्था के विघटन का संकेत माना जाता है। गुप्तकाल क्लासिकल युग था अथवा अर्थव्यवस्था के धीरे-धीरे ह्रास का काल, यह एक अत्यन्त विवादास्पद तथ्य है।

कृषि- सामान्यतः भूमि पर कृषक का ही स्वामित्व माना जाता है। मनु और गौतम जैसे स्मृतिकारों ने राजा को भूमि का स्वामी माना है, परन्तु मनु दूसरी जगह कहते हैं कि भूमि उसकी होती है जो उसे आबाद करता है। दूसरी तरफ बृहस्पति और नारद भूमि का स्वामी उसे मानते हैं जिसके पास कानूनी दस्तावेज हो।

शबरस्वामि के अनुसार साधारण मनुष्य खेत के स्वामी होते हैं। राजा भी पूरी भूमि का स्वामी नहीं होता है, उसकी भी निजी भूमि होती है। प्राचीन काल में राजा सामान्यतः उपज के 1/6 भाग का अधिकारी माना गया है। यह भाग प्रजा की सुरक्षा करने के लिए, राजा को प्रजा द्वारा प्रदान किया जाने वाला कर था।

राजा अपनी निजी भूमि में से ही भूदान आदि करता था। राजा द्वारा लिया जाने वाला कर भाग, भोग कर आदि कहलाता था। लगान के निर्धारण व की प्रतिष्ठा के संदर्भ में व्यापक विवरणों का अभाव है। कर के निर्धारण में भूमि की प्रकृति का ध्यान रखा जाता होगा।

स्मृतियों एवं बृहतसंहिता, अमरकोश, कालिदास की रचनाओं आदि से गुप्तकालीन कृषि के बारे में जानकारी मिलती है। गुप्तकाल में कृषि परम्परागत तरीकों से ही होती थी। हल में लोहे के फाल का प्रयोग किया जाता था। बृहस्पति व नारद की स्मृतियों में उनके लिए कठोर दण्ड की व्यवस्था की गयी है जो कृषि उपकरणों को क्षति पहुँचाते थे।

कृषि में हल के महत्त्व के कारण ही उसे पवित्र माना जाने लगा। सीर-यज्ञ के आयोजन से भी इसका महत्त्व स्पष्ट हो जाता है। कृषि में अच्छे बीजों का महत्त्व माना गया था। वराहमिहिर ने बृहतसंहिता में बीजों की गुणवत्ता बढ़ाने व धरती की उर्वरा शक्ति में वृद्धि के तरीके बताए हैं। गुप्तकाल में कृषि व्यवस्था में राजा का हस्तक्षेप पहले की तुलना में बढ़ गया था।

अमरकोश में बारह प्रकार की भूमि का उल्लेख है- उर्वरा, ऊसर, मरू, अप्रहत, सद्वल, किल जलप्रायमनुपम, कच्छा, शर्करा, शकविती, नदीमातृक, देवमातृक।

आर्थिक उपयोगिता की दृष्टि से भूमि को कई भागों में विभाजित किया गया है-

1. वास करने योग्य भूमि-वास्तु,

2. चारागाह भूमि,

3. खेती के उपयुक्त भूमि-क्षेत्र,

4. नहीं जोती जाने वाली भूमि-सील,

5. बिना जोती गयी जंगल भूमि-अप्रहत।

गुप्तकालीन अभिलेखों में भू धारण पर प्रकाश डालने वाली पाँच शब्दावलियाँ हैं

1. नीवीधर्म- इसके अन्तर्गत दानग्रहिता को सदा के लिए भूमि दे दी जाती थी।

2. अक्षयनीवी धर्म- संभवत: सबसे पहले कुषाणों ने किसानों को अक्षयनीवी पद्धति पर भूमि दी थी। इसके अनुसार किसान उस भूमि से प्राप्त आय का उपभोग कर सकता था। किन्तु वह उस जमीन का हस्तातरण नहीं कर सकता था। गुप्तकाल में भूमि खरीदकर अक्षयनीवी पद्धति पर ब्राह्मणों को दान में भी दी जाने लगी।

3. नीवी धर्म अक्षयन- इसके अनुसार नीवी धर्म समाप्त कर यह भूमि दूसरे को दी जा सकती थी।

4. अप्रदानीवी धर्म- दानग्रहिता को इस भूमि पर प्रशासनिक अधिकार नहीं था और न वह किसी अन्य व्यक्ति को भूमि दे सकता था।

5. भूमि-न्याय- कौटिल्य के अर्थशास्त्र में एक संपूर्ण अध्याय ही इस पर लिखा गया है। इसके अन्तर्गत बंजरभूमि को आबाद करने के ऐवज में किसी व्यक्ति को उस भूमि पर लगान माफ कर दिया जाता था।

राजस्व– सामान्यतः भू-राजस्व को भागकहा जाता था। मनुस्मृति में एक कर भोगकी चर्चा है। भोग में राजा के प्रत्येक दिन की आवश्यकता शामिल थी। यथा-फल-फूल, सब्जी आदि। उद्रग भी भूमि कर का ही एक रूप था।

उपरिकर उन रैयतों पर लगाया जाता था जो भूमि के स्वामी नहीं थे। भू-राजस्व नकद (हिरण्य) और अनाज (मेय) दोनों में लिया जाता था। नकद कर वसूलने वाला अधिकारी हिरण्य सामुदायिक कहलाता था। अनाज में कर वसूलने वाला अधिकारी औद्रगिक कहलाता था।

अन्य कर– 

1. धान्य,

2. भूत,

3. बैष्ठिका- बलात् श्रमिक,

4. भत या भट्ट (पुलिस कर),

5. प्रणय- ग्रामवासियों पर लगाया गया एक अनिवार्य कर,

6. चारासन- चारागाहों पर शुल्क,

7. चाट- लुटेरे द्वारा उत्पीड़न से मुक्ति का कर,

8. दशापराध- दस प्रकार के अपराधों के लिए किए गए जुर्माने,

9. हलदण्ड- यह हल पर लगाया जाता था।

सातवाहन काल से भूमि दान की प्रथा शुरू हुई थी। गुप्तकाल तक आकर प्रशासनिक अधिकार भी दान ग्रहिता को सौंप दिया गया। हर्षकाल में राज्य अधिकारियों को भी अनुदान में वेतन दिया जाने लगा।

भूमि की माप माप का पैमाना, 1. निर्वतन, 2. कुल्यावाप, 3. द्रोणवाप, 4. आढ़वाप।

1 कुल्यावाप = 8 द्रोणवाप = 32 आढ़वाप

बंगाल में पाटक प्रचलित था। इस प्रकार हम देखते हैं कि विभिन्न क्षेत्र में यह भिन्न-भिन्न था। अमरकोष में हलों की बनावट का वर्णन है। बृहस्पति के अनुसार हल का फाल का वजन 12 पल होना चाहिए और यह आठ अंगुल लंबा और चार अंगुल चौड़ा होना चाहिए।

प्राचीन काल में प्रजा को कृषि हेतु सिंचाई की सुविधाएँ मुहैया करवाना राजा का कर्त्तव्य माना गया है। कालिदास के ‘रघुवंश’ से भी राजा के इस रूप का बोध होता है। बृहत्संहिता में दकार्गलाध्यायनामक पूरा अध्याय पृथ्वी के नीचे जल खोजने की विधियों से संबंधित है।

प्राचीन काल में इस प्रकार के अध्ययन का प्रयोग कुओं और तालाबों के खोदने में निश्चित रूप से किया जाता होगा। अमरकोश में भी इस प्रकार का विवरण है। जूनागढ़ अभिलेख से प्राचीन भारतीय शासकों की सिंचाई व्यवस्था के प्रति गहन रुचि जाहिर होती है।

सुदर्शन झील जो मौर्यकाल में सुरक्षित थी, स्कंदगुप्त के राज्यकाल में क्षतिग्रस्त होने से समस्या बन गयी थी। जूनागढ़ अभिलेख के अनुसार सुदर्शन झील अधिक वर्षा के कारण उफन पड़ी तथा उसका जल समुद्र की तरह हो गया।

इससे गिरनार नगर की सुरक्षा को भय उत्पन्न हो गया तथा नागरिक किकर्त्तव्यविमूढ़ होकर भय और विषाद से भर उठे। ऐसे समय गिरनार नगर के अधिकारी चक्रपालित ने अनुपम साहस दिखाकर दो महीने तक सहस्रों लोगों को दिन रात लगाकर, अपार धन व्यय करके झील के बाँध का पुनरूद्धार किया।

गुप्त काल में कृषि में मध्यस्थों की संख्या में वृद्धि होने लगी थी। इसी आधार पर इतिहासकार गुप्तकाल को भारतीय सामंतवाद के उदय का काल मानते हैं। आर्थिक संबंधों के आधार में परिवर्तन आने था। इस काल में यह एक नया विकास हुआ कि गाँव की भूमि दान में दिये जाने के सैनिक एवं प्रशासनिक अधिकारियों को भी उनके वेतन के बदले में दी जाने लगी।

इस भूपति को ही कृषक अपने कर देता था। भूपति कृषकों व उसके परिवार से बेगारले सकता था, लेकिन उनको बेदखल नहीं कर सकता था। राजनैतिक शक्तियों के साथ-साथ मध्यस्थों की आर्थिक शक्तियों का विकास हुआ।

विकेन्द्रित कर-प्रणाली की प्रवृत्ति में विकास के कारण अनेक नवीन वित्तीय इकाइयों का उद्भव हुआ। कृषक के ऊपर करों का दबाव भी बढ़ने लगा था। यह तो स्पष्ट है की भूपतियों की विशाल भूमि में कृषिक मजदूर ही करते थे।

याज्ञवल्क्य स्मृति में उल्लेख है की खेत में कार्य करने वाले श्रमिक को फसक का दसवां हिस्सा प्राप्त होता था। ग्रामीण जीवन में कृषक मजदूरों की संख्या बढ़ने लगी थी। कृषकों द्वारा कई फसलें बोयी जाती थी। वराहमिहिर ने फसलों के 3 प्रकार बताएं हैं- गर्मी (रबी), पतझड़ (खरीफ) और साधारण समय में होने वाली फसलें।

अमरकोश में भी उन वस्तुओं के नाम मिलते हैं जो सरसों, अलसी, अदरक, कालीमिर्च आदि। धान के कई नाम थे जैसे नीवार, शालि और कमल। चावल की फसल लगभग 60 दिन में तैयार हो जाती थी। बाण के अनुसार श्रीकण्ठ जनपद में चावल, गेहूँ, ईख, सेम, अंगूर आदि पैदा थे। इत्सिंग के यात्रा-विवरण से भी तत्कालीन फसलों की जानकारी मिलती है। केला, आम, द्राक्षा, कटहल, केसर आदि की भी खेती की जाती थी।

पशुपालन- प्राचीन भारतीय अर्थव्यवस्था का आधार पशु थे। पशुपालन को भी कृषि के साथ स्वतंत्र व्यवसाय माना गया है। अमरकोश, बृहतसंहिता, कामन्दकीय नीतिसार के पशु संबंधी उल्लेखों से स्पष्ट है कि गुप्तकाल में भी पशु अर्थव्यवस्था के आधार थे। गाय और बैल की आर्थिक उपयोगिता के कारण ही उन्हें पवित्र माना गया।

उनके साथ दुव्र्यवहार करने पर दण्ड का विधान था। स्मृतियों में पशुओं से संबंधित अलग अध्याय (स्वामिपाल विवाद) मिलता है। पशुओं की सुरक्षा के लिए चरवाहा उत्तरदायी होता था। नारद के अनुसार उसे पारिश्रमिक के रूप में सभी पशुओं का दूध प्रति आठवें दिन और प्रति वर्ष 100 पशुओं के लिए एक बछिया और 200 पशुओं के लिए एक दुधारू गाय देय थे। हाथी और घोड़ों का महत्त्व सामरिक दृष्टि से था। हाथी दाँत निर्यात की प्रमुख वस्तु थी।

उद्योग व शिल्प- गुप्तकालीन आर्थिक सम्पन्नता उद्योग व शिल्प में दिखायी देती है। कच्चे माल की अधिकता और शिल्पियों की कुशलता के कारण व्यवसाय और उद्योगों ने गुप्तकाल में बड़ी उन्नति की। गुप्तकालीन अभिलेखों व साहित्यिक ग्रन्थों से भी इसकी पुष्टि हो जाती है।

इस काल में खनिज पदार्थों का बड़ी मात्रा में उत्खनन किया जाने लगा था। कालिदास ने अपनी रचनाओं में बहुत-सी धातुओं व रत्नों का उल्लेख किया है जैसे- स्वर्ण, कनकसिकता (नदियों की बालू में से निकाला गया स्वर्ण), रजत, ताम्र (तांबा), अयस (लोहा), बज्र (हीरा), पद्याराग (लाल), पुष्पराग (पुखराज), इन्द्रनील (नीलम), मरकत (पन्ना), वैदूर्य (बिल्लोर), स्फटिक, मणिशिला (संगमरमर) आदि।

जेवरों का निर्माण गुप्तकाल का प्रमुख उद्योग था। वात्सायन के कामसूत्र में धातुकर्म को 64 कलाओं में गिनाया गया है। शूद्रक के मृच्छकटिकम् में सुनारों के द्वारा अनेक प्रकार के आभूषण बनाने एवं उनमें रत्नों को जड़ने आदि का बड़ा सजीव चित्रण है।

सुवर्णकार का क्षेत्र एवं महत्त्व गुप्तकाल में बढ़ गया था। वह जौहरी का भी कार्य करता था। रत्नों से संबंधित वैज्ञानिक अध्ययन भी विकसित हुआ जिसे रत्न परीक्षा के नाम से संबोधित किया गया। कामसूत्र में रूपरतनपरीक्षा व मणिरागकरज्ञानम् का संबंध रत्नों व उसके परीक्षण से था। रत्नों का प्रयोग विभिन्न प्रकार से होता था जैसे स्वर्ण की वस्तुएँ, आभूषणों और मुद्राओं को जड़ने-वस्त्रों को सजाना आदि।

वस्त्रोद्योग भी गुप्तकाल का प्रमुख उद्योग था। वराहमिहिर ने वज्रलेप का उल्लेख किया है, जिससे बोध होता है कि उस समय लोग वस्त्रों को रंगने की रासायनिक प्रक्रिया से परिचित थे। प्राचीन काल में रंग वृक्षों से तैयार किए जाते थे।

लौहकार अनेक उपयोगी अस्त्र-शस्त्र, उपकरण और वस्तुओं को बनाते थे। मेहरौली का लौह स्तंभ तत्कालीन लौहकारों के कौशल और उच्च तकनीक का एक विशिष्ट उदाहरण है।

शताब्दियों की उथल-पुथल, प्राकृतिक प्रकोप भी इसका कुछ नहीं बिगाड़ सके हैं। इसमें अभी तक जंग भी नहीं लगी है। इस काल की 7½ फुट ऊँची महात्मा बुद्ध की मूर्ति भागलपुर जिले के सुल्तानगंज से मिली है। इससे भी धातु विज्ञान की उन्नति का बोध होता है।

कुम्हार का व्यवसाय भी प्रचलित था। उत्खनन से प्राप्त हुए बहुत से बर्तनों में से कुछ सांचे में ढले हुए हैं और कुछ चाक पर बने हुए हैं। बर्तनों को रंग कर उस पर उत्कीर्णन भी किया जाता था। पीने के बर्तनों पर हत्थे भी लगाये जाते थे।

कामसूत्र में तक्षण को 64 कलाओं में एक बताया गया है। वाकाटक अभिलेखों से ज्ञात होता है कि नमक बनाने पर राज्य का एकाधिकार था। नमक दो प्रकार से बनाया जाता था- समुद्र के जल से व चट्टानों से।

प्राचीन भारतीय श्रृंगार प्रेमी थे। श्रृंगार की सामग्री, सुगंधित पदार्थों, कुमकुम आदि का निर्माण भी अवश्य किया जाता होगा। बृहतसंहिता में सुगंधित पदार्थों और तेलों आदि से संबंधित विवरण प्राप्त होता हैं। गुप्तकाल में वास्तुकला का पूर्ण विकास दिखाई देता है। गुप्तकालीन कलाकृतियों से स्पष्ट है कि वास्तुशिल्पी उत्कृष्ट रहे होंगे। इस काल की विभिन्न कलाकृतियों में कल्पना व यथार्थ का अद्भुत मिश्रण है।

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