आधुनिक भारत का इतिहास नोट्स

भारतीय राजनीति में गांधीजी का अभ्युदय

प्रारंभिक जीवन तथा दक्षिण अफ्रीका में सत्य का प्रयोग

मोहनदास करमचन्द गांधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के काठियावाड़ में पोरबंदर नामक स्थान में हुआ था। उनके पिता काठियावाड़ के दीवान थे। इंग्लैंड से बैरिस्टरी पास करने के उपरांत वे गुजरात के एक व्यापारी दादा अब्दुल्ला का मुकदमा लड़ने दक्षिण अफ्रीका गये।

वहां उन्होंने देखा कि जो एशियाई मजदूरी करने दक्षिण अफ्रीका गये थे वे किस प्रकार प्रजातीय उत्पीड़न तथा भेदभाव के शिकार थे। वहां उन्होंने गोरो द्वारा काले लोगों से रंगभेद की नीति के विरुद्ध विरोध प्रकट किया। इसके पश्चात् गांधीजी ने निश्चय किया कि वे वहां रूककर भारतीय मजदूरों को उनके अधिकारों के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा देंगें तथा उन्हें संगठित करेंगें। गांधीजी 1914 तक दक्षिण अफ्रीका में रुके, तत्पश्चात् वे भारत वापस आये।

दक्षिण अफ्रीका में कार्यरत भारतीय तीन वर्गों में संगठित थे-

प्रथम-वर्ग में मुख्यतया दक्षिण भारत से आये हुए मजदूर थे, जो 1890 के पश्चात् गन्ने के खेतों में काम करने दक्षिण अफ्रीका आये थे।

दूसरे-वर्ग में भारत से आये मैमन मुसलमान थे, जो मजदूरों के साथ दक्षिण अफ्रीका आये थे तथा,

तीसरे-वर्ग में भारत से आये वे मजदूर थे, जो कार्य का अनुबंध समाप्त होने के पश्चात् अपने परिवार के साथ वहीं रहने लगे थे। ये भारतीय मुख्यतः अशिक्षित थे तथा उन्हें अंग्रेजी का अत्यल्प या बिलकुल ज्ञान नहीं था। ये सभी दक्षिण अफ्रीका में प्रजातीय भेदभाव के शिकार थे।

दक्षिण अफ्रीका की गोरी सरकार इन भारतीयों पर अनेक जुल्म ढाती थी। इन्हें मत देने के अधिकार से वंचित रखा गया था। इन्हें कुछ विशेष स्थानों में ही रहने की अनुमति थी, जो अत्यन्त संकीर्ण तथा गंदे थे एवं यहां की मानवीय दशायें अत्यन्त निम्न थीं। गोरी सरकार ने 9 बजे रात्रि के पश्चात् भारतीय तथा काले अफ्रीकियों के घर से बाहर निकलने पर प्रतिबंध लगा दिया था तथा उन्हें सार्वजनिक फुटपाथों के प्रयोग की अनुमति नहीं थी।

संघर्ष का उदारवादी चरण 1894-1906 ई.

इस चरण में गांधीजी ने दक्षिण अफ्रीकी सरकार को याचिकायें एवं प्रार्थना-पत्र सौंपने की नीति अपनायी। उन्होंने ब्रिटेन को भी इस संबंध में अनेक प्रार्थना-पत्र भेजे। उन्होंने ब्रिटेन से मांग की कि वह इस विषय पर हस्तक्षेप कर भारतीयों की दशा सुधारने का प्रयत्न करे क्योंकि भारत, ब्रिटेन का उपनिवेश है।

अतः ब्रिटेन का उत्तरदायित्व है कि वह भारतीयों पर हो रहे प्रजातीय भेदभाव एवं उत्पीड़न को रोकने का प्रयास करे। गांधीजी ने सभी भारतीयों को संगठित कर ‘नटाल भारतीय कांग्रेस‘ की स्थापना की तथा इण्डियन ओपीनियन नामक पत्र का प्रकाशन प्रारम्भ किया।

अहिंसात्मक प्रतिरोध या सत्याग्रह का काल 1906-1914

दक्षिण अफ्रीका में गोरी सरकार के विरुद्ध गांधीजी के संघर्ष का दूसरा चरण 1906 में प्रारंभ हुआ। इस चरण में गांधीजी ने अहिंसात्मक प्रतिरोध या सविनय अवज्ञा की नीति अपनायी, जिसे उन्होंने सत्याग्रह का नाम दिया।

पंजीकरण प्रमाणपत्र के विरुद्ध सत्याग्रह 1906

दक्षिण अफ्रीकी सरकार ने एक विधान बनाकर प्रत्येक भारतीय के लिये यह अनिवार्य कर दिया कि वे अपने अंगूठे के निशान वाले पंजीकरण प्रमाणपत्र को हर समय अपने पास रखें। तदुपरांत गांधीजी के नेतृत्व में सभी भारतीयों ने इस भेदभावमूलक कानून का विरोध करने का निर्णय लिया।

गांधीजी ने इस हेतु ‘अहिंसात्मक प्रतिरोध सभा’ का गठन किया। गांधीजी सहित कई भारतीयों को पंजीकरण कानून का विरोध करने के कारण जेल में डाल दिया गया। बाद में सरकारी अधिकारियों ने स्वयं इन सभी निडर भारतीयों का छलपूर्वक रजिस्ट्रेशन कर दिया। लेकिन भारतीयों ने अपना विरोध अभियान जारी रखा तथा गांधीजी की अगुवायी में अपने रजिस्ट्रेशन के कागजातों को सामूहिक रूप से जला दिया।

प्रवासी भारतीयों के प्रवेश पर रोक का विरोध

इस बीच सरकार ने एक और कानून बनाया, जिसका उद्देश्य प्रवासी भारतीयों के प्रवेश को रोकना था। इस कानून का विरोध करने हेतु अनेक वरिष्ठ भारतीय नटाल से ट्रांसवाल आये। ट्रांसवाल के तमाम भारतीयों ने भी आंदोलनकारियों का साथ दिया। लोगों ने कई स्थानों पर लाइसेंस का उल्लंघन किया।

कानून का विरोध करने के लिये भारतीयों ने एक प्रांत से दूसरे प्रांत की यात्रा की। सरकार ने विरोधियों के प्रति दमन का मार्ग अपनाया। 1908 में गांधीजी की कारागार भेज दिया गया। कई अन्य भारतीयों को भी जेल में डाल दिया गया तथा उन्हें तरह-तरह की यातनायें दी गयीं। इसके शिकार ज्यादातर गरीब हुये। व्यापारियों को आर्थिक हानि पहुंचाने की भी सरकार ने धमकी दी।

टाल्सटाय फार्म की स्थापना

गांधीजी के नेतृत्व में चल रहा आंदोलन धीरे-धीरे संकटग्रस्त होने लगा। आंदोलनकारियों की सक्रियता धीरे-धीरे कम होने लगी तथा सरकार का अड़ियल रूख बरकरार रहा। 1909 में गांधीजी तथा अंग्रेज अधिकारियों के मध्य वार्ता का कोई खास परिणाम नहीं निकला।

यद्यपि अभी भी आंदोलन को जारी रखना आवश्यक था लेकिन आंदोलन से सम्बद्ध भारतीयों के मध्य आर्थिक समस्या खड़ी हो गयी। इन्हीं सब परिस्थितियों के कारण गांधीजी ने ‘टालस्टाय फार्म‘ की स्थापना की। इस फार्म में गांधीजी ने अपने एक जर्मन शिल्पकार मित्र कालेनबाख की मदद से सत्याग्रहियों के परिवार की पुर्नवास समस्या को हल किया तथा उनके भरण-पोषण की व्यवस्था की। भारत से भी यहां काफी पैसा भेजा गया।

पोल टैक्स तथा भारतीय विवाही को अप्रामाणित करने को विरुद्ध अभियान

इस बार सत्याग्रह का स्वरूप बड़ा था। इकरारनामे की अवधि समाप्त होने पर दक्षिण अफ्रीका में बसे भारतीयों पर सरकार ने तीन पौंड का कर लगा दिया। इसके खिलाफ तीव्र सत्याग्रह छिड़ गया। भारतीयों में ज्यादातर गरीब मजदूर थे, जिनकी मासिक आमदनी 10 शिलिंग से भी कम थी। ऐसे में तीन पौंड का कर उनके लिये बहुत ज्यादा था।

जब इस नियम के विरुद्ध सत्याग्रह प्रारम्भ हुआ तो, इसमें लगभग सभी भारतीयों ने भाग लिया तथा इसे व्यापक जन-आंदोलन का रूप दे दिया। इसी बीच सुप्रीम कोर्ट के एक निर्णय ने आंदोलन को और भड़का दिया। कोर्ट ने उन सभी विवाहों को जो ईसाई पद्धति से नहीं सम्पन्न हुये थे तथा जिनका पंजीकरण नहीं हुआ था, अवैध घोषित कर दिया।

इस कानून के अनुसार, हिन्दू, मुस्लिम और पारसी रीति-रिवाजों मे सम्पन्न सभी शादियां अवैध थीं तथा ऐसी शादियों से उत्पन्न सभी संतानें भी अवैध। भारतीयों ने इस फैसले को अपनी महिलाओं का अपमान समझा। गांधीजी सहित अनेक सत्याग्रही कानून की अवहेलना कर नटाल से ट्रांसवाल पहुंच गये। सरकार ने इन लोगों को बंदी बनाकर कारावास में डाल दिया।

शीघ्र ही खदान मजदूर तथा बागान मजदूर भी सक्रिय रूप से आंदोलन में सम्मिलित हो गये। इन मजदूरों ने सरकारी दमन के विरोध में हड़ताल कर दी। सरकार की कठोर दमनकारी नीतियों से समूचा भारतीय समुदाय तिलमिला उठा। गोपाल कृष्ण गोखले ने पूरे देश का दौरा कर इस अत्याचार के खिलाफ जनमत तैयार किया। लार्ड हडिंग तक ने इसकी निंदा की तथा अत्याचारों के आरोप की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की।

गांधीजी, लार्ड हार्डिंग तथा गोखले तथा सी.एफ.एन्ड्रयूज से कई दौर की लंबी बातचीत के पश्चात् दक्षिण अफ्रीकी सरकार ने भारतीयों की मुख्य मांगें मान ली। तीन पौंड का कर तथा पंजीकरण प्रमाणपत्र से सम्बद्ध कानून समाप्त कर दिये गये। भारतीय अप्रवासियों की अन्य कठिनाइयों पर दक्षिणी अफ्रीकी सरकार ने सहानुभूतिपूर्वक विचार करने का आश्वासन दिया।

दक्षिण अफ्रीका में गांधीजी के अनुभव

दक्षिण अफ्रीका में गरीब आवश्यकता पड़ने पर किसी उदात्त उद्देश्य के लिये जुझारू संघर्ष और बलिदान की तैयार हो सकती है।

यहां गांधीजी विभिन्न सम्प्रदाय एवं समाज के विभिन्न वर्ग के लोगों के मध्य एकता स्थापित करने में सफल हुये। उनके नेतृत्व में हिन्दू, मुस्लिम, पारसी, अमीर, गरीब, पुरुष, महिला सभी ने कंधे से कंधा मिलाकर आंदोलन में भाग लिया।

गांधीजी ने यह सबक सीखा कि कई बार नेताओं को ऐसे सख्त निर्णय भी करने पड़ सकते हैं, जो उनके समर्थकों को भी पसंद न आयें।

दक्षिण अफ्रीका में गांधीजी को विरोधी राजनीतिक धाराओं से उन्मुक्त वातावरण में एक विशिष्ट राजनीतिक शैली, नेतृत्व के नये अंदाज और संघर्ष के नये तरीकों को विकसित करने का अवसर मिला। इसके फलस्वरूप वे गांधीवादी रणनीति व संघर्ष के तरीकों की विशेषताओं और कमियों दोनों से भली-भांति परिचित की गये तथा उन्हें विश्वास हो गया कि ये ही सबसे बेहतर हैं।

गांधीजी की सत्याग्रह की तकनीक

गांधीजी ने अपने दक्षिण अफ्रीका के प्रवास के दिनों में इस तकनीक का प्रयोग किया। 1906 के पश्चात् गांधीजी ने यहां अवज्ञा आदोलन प्रारम्भ किया, जिसे ‘सत्याग्रह’ का नाम दिया गया। सत्याग्रह, सत्य एवं अहिंसा के सिद्धांतों पर आधारित था। इसकी मुख्य विशेषतायें इस प्रकार थीं-

सत्याग्रही यह कभी विचार नहीं करता कि गलत क्या है। वह सदैव सच्चा, अहिंसक एवं निडर रहता है।

सत्याग्रही में बुराई के विरुद्ध संघर्ष करते समय सभी प्रकार की यातनायें सहने की शक्ति होनी चाहिये। ये यातनायें सत्य के लिये उसकी आसक्ति का एक हिस्सा हैं।

बुराई के विरुद्ध संघर्ष की प्रक्रिया में एक सच्चा सत्याग्रही बुराई करने वाले से अनुराग रखता है, घृणा या द्वेष नहीं।

एक सच्चा सत्याग्रही बुराई के सामने कभी सिर नहीं झुकाता, उसका परिणाम चाहे कुछ भी हो।

केवल बहादुर एवं दृढ़ निश्चयी व्यक्ति ही सच्चा सत्याग्रही बन सकता है। सत्याग्रह, कायर और दुर्बल लोगों के लिये नहीं है। कायर व्यक्ति हिंसा का सहारा लेता है, जिसका सत्याग्रह में कोई स्थान नहीं है।

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My Name is Jitendra Singh (Rana) और मैं एक सफल शिक्षक बनने की तैयारी कर रहा हूं ! और मैं लखनऊ, उत्तर प्रदेश (भारत) से हूँ।
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