मध्यकालीन भारत का इतिहास नोट्स

फिरोज शाह तुगलक: 1351-1388 ई. Firuz Shah Tughlaq: 1351-1388 AD.

थट्टा के निकट मुहम्मद बिन तुगलक की अचानक मृत्यु हो जाने के कारण नेतृत्वविहीन सेना में, जो खेमे में स्त्रियों एवं बच्चों की उपस्थिति के कारण पहले से ही व्यग्र थी, गडबड़ी एवं अव्यवस्था फैल गयी।

ऐसी अवस्था में सरदारों ने फ़िरोज़ से राजसिंहासन पर बैठने एवं हतोत्साह सेना को नष्ट होने से बचाने के लिए आग्रह किया। फ़िरोज राजमुकुट स्वीकार करने में कुछ हिचकिचाहट के बाद, जो शायद सच थी, सरदारों की इच्छा के सामने झुक गया तथा 23 मार्च, 1351 ई. को छियालीस वर्षों की अवस्था में सुल्तान घोषित हुआ।

वह सेना में व्यवस्था की पुन: प्रतिष्ठा करने में सफल हुआ तथा इसके साथ दिल्ली के लिए चल पड़ा। पर वह सिंध के बाहर भी नहीं आया था कि स्वर्गीय सुल्तान के प्रतिनिधि ख्वाजा-ए-जहाँ ने दिल्ली में एक लड़के को मुहम्मद बिन तुगलक का पुत्र एवं उत्तराधिकारी घोषित कर उसे गद्दी पर बैठा दिया। फ़िरोज़ के लिए स्थिति वास्तव में संकटपूर्ण हो गयी।

उसने मुल्तान पहुँचकर सरदारों एवं मुस्लिम कानून विदों से परामर्श लिया। सरदारों ने यह स्वीकार ही नहीं किया कि मुहम्मद बिन तुगलक के कोई पुत्र भी है। मुस्लिम कानून विदों ने ख्वाजा-ए-जहाँ के उम्मीदवार को नाबालिग होने के कारण अयोग्य ठहराया।

इस विषय पर कानून के दृष्टिकोण से विचार नहीं हुआ। ऐसा करना असंगत भी होता, क्योंकि मुस्लिम कानून में राजसत्ता परम्परा प्राप्त अधिकार की चीज नहीं समझी जाती थी। बालक सुल्तान के पक्ष के अत्यंत कमज़ोर होने के कारण ख्वाजा-ए-जहाँ शीघ्र फिरोज़ की शरण में आ गिरा।

फिरोजू ने उसकी पिछली सेवाओं को ध्यान में रखकर उसे क्षमा कर दिया तथा उसे समाना की जागीर में जाकर वहाँ एकान्तावस्था में अपने अन्तिम दिन व्यतीत करने की आज्ञा दी। पर सुनाम एवं समाना के सेनापति शेर खाँ के एक अनुचर ने अपने स्वामी, अन्य सरदारों तथा सेना के नायकों द्वारा उकसाये जाने के कारण राह में उसका (ख्वाजा-ए-जहाँ का) काम तमाम कर डाला।

फ़िरोज़ ने इस वृद्ध अधिकारी को, जिसकी निर्दोषिता का उसे विश्वास हो चुका था, सरदारों के प्रतिशोध का शिकार बनने देकर अपनी दुर्बलता का परिचय दिया।

फिरोज़ के समक्ष वस्तुत: बड़ा कठिन कार्य दिल्ली सल्तनत को शक्तिहीनता एवं आचार-भ्रष्टता की अवस्था से उठाना था जो, उसके पूर्वगामी के शासनकाल के अन्तिम वर्षों से गिर गयी थी। किसानों और अमीर वगों का असंतोष उभर रहा था।

साम्राज्य विघटन की समस्या से जूझ रहा था। मुहम्मद बिन तुगलक की नीतियों के कारण उलेमा वर्ग भी असंतुष्ट था। खजाना भी खाली था। पर नया सुल्तान अक्षम था। वह कमजोर, विचलित होने वाला तथा लगातार परिश्रम करने में अक्षम था।

उसमें उत्तम सेनापति के आवश्यक गुणों का अभाव था। उसने साम्राज्य के खोये हुए प्रान्तों को पुनः प्राप्त करने का कभी हार्दिक प्रयास नहीं किया तथा उसके सैनिक कार्य अधिकतर असफल रहे। अपने आक्रमणों के समय संकटपूर्ण क्षणों में जब वह करीब-करीब जीतने को होता था, तब अपने सहधर्मियों के रक्तपात से बचने के लिए वहाँ से लौट पड़ता था।

पूर्व में बंगाल का स्वतंत्र शासक हाजी इलियास, जिसने शम्सुद्दीन इलियास शाह की उपाधि धारण कर ली थी, विभिन्न दिशाओं में अपने राज्य की सीमाएँ बढ़ाने में व्यस्त था तथा दिल्ली राज्य की सीमाओं का भी उल्लंघन कर रहा था। इस पर सत्तर हजार घुड़सवारों को लेकर नवम्बर, 1353 ई. में दिल्ली से फिरोज़ उसे पीछे हटाने के लिए विदा हुआ।

उसके आने के विषय में सुनकर इलियास इकदाला के दुर्ग में लौट आया, जो पांडुआ से शायद दस या बारह की दूरी पर था। लेकिन वहाँ पर दिल्ली की सेना ने उस पर आक्रमण कर पराजित कर दिया। किन्तु फ़िरोज़ ने इस कठिनाई से प्राप्त की हुई विजय लाभ नहीं उठाया, क्योंकि वह बंगाल को अपने साम्राज्य में बिना मिलाये , जिसके लिए उसका सेनापति तातरि खाँ आग्रह कर रहा था, पहली सितम्बर,13 54 ई. को दिल्ली लौट आया।

उसके अपमानपूर्ण ढंग से पीछे हटने के कारण विषय में दो विभिन्न मत हैं। फ़िरोज़ के शासन-काल के अधिकारी इतिहासकार शम्से-सिराज अफूीफ के लेखानुसार, सुल्तान घिरे हुए दुर्ग की स्त्रियों के रोने और कराहने से द्रवित होकर लौट पड़ा।

पर कुछ उत्तरकालीन लेखकों ने इसका कारण वर्षा ऋतु के आरम्भ होने पर विपत्तियों का भय बतलाया है। उसके लौटने का जो भी कारण रहा हो, हमें टॉमस के कथन से सहमत होना पड़ता है कि- इस आक्रमण का परिणाम केवल दुर्बलता को स्वीकार करना ही हुआ।

कुछ वर्षों में फ़िरोज ने बंगाल को वशीभूत करने का पुन: प्रयत्न किया। उसे इसके लिए बहाना भी मिल गया। जब पूर्वी बंगाल के फखरुद्दीन मुबारक शाह के दामाद जफूर खाँ ने सोनारगाँव से समुद्र मार्ग द्वारा भाग कर, उसके दरबार में आकर बंगाल के शासक के अत्याचार के विषय में उससे शिकायत की।

वीर एवं योग्य शासक शम्सुद्दीन इलियास की मृत्यु से फ़िरोज़ बंगाल के विरुद्ध आक्रमण का संगठन करने को प्रोत्साहित हुआ। सभी पिछली संधियों एवं मित्रता के आश्वासनों को तिलांजलि देकर एक विशाल सेना ले वह 1359 ई. में शम्सुद्दीन इलियास के पुत्र एवं उत्तराधिकारी सिकन्दर शाह के विरुद्ध बढ़ा।

राह में गोमती के किनारे जूफराबाद में वह छः महीनों के लिए ठहरा तथा इसके पाश्र्व में अपने चचेरे भाई फखरुद्दीन जौन (मुहम्मद बिन तुगलक) की स्मृति में जौनपुर नगर की नींव डाली। वर्षा-ऋतु के बीत जाने पर उसने पुन: बंगाल की ओर बढ़ना जारी किया।

उसने सिकन्दर शाह द्वारा भेजे गये मित्रता के सन्देशों का कुछ उत्तर नहीं भेजा। इसलिए सिंकदर शाह अपने पिता के दृष्टान्त का अनुकरण कर, एकदाला के मिट्टी के किले में जा छिपा। दिल्ली की सेना ने इस दुर्ग पर घेरा डाल दिया, पर इस पर अधिकार करना बच्चों का खेल नहीं सिद्ध हुआ।

बंगाल की सेना तब तक वीरतापूर्वक अपने गढ़ की प्रतिरक्षा करती रही जब तक वर्षा ऋतु निकट नहीं आ गई थी तथा बाढ़ घेरा डालने वालों के विरुद्ध उसके पक्ष की सहायता के लिए नहीं आ गयी। शीघ्र सिकन्दर के पक्ष में ही अच्छी शतों के साथ एक संधि हो गयी। इस प्रकार दिल्ली के सुल्तान द्वारा किया गया बंगाल पर दूसरा आक्रमण भी पहले की ही तरह निष्फल रहा। इसने पुन: एक बार केवल उसके कमजोर एवं विचलित होने वाले स्वभाव का परिचय दिया।

दिल्ली लौटते समय सुल्तान कुछ समय के लिए जौनपुर में ठहर गया और तब जाम नगर (आधुनिक उड़ीसा) के विरुद्ध सेना लेकर बढ़ा। इस जगह का राय, दिल्ली सेना के आते ही, तेलंगाना की ओर भाग गया तथा शीघ्र उसने, कुछ हाथियों को समर्पित कर तथा कर के रूप में प्रतिवर्ष कुछ हाथियों को दिल्ली भेजने का वचन देकर, उसकी अधीनता स्वीकार कर ली। फ़िरोज़ अढ़ाई वर्षों की अनुपस्थिति के बाद अत्यंत कठिनाई एवं कष्ट सहकर दिल्ली लौटा।

अपने दिल्ली लौटने के शीघ्र बाद फिरोजू का ध्यान नगरकोट के गढ़ के पराजय की ओर गया, जिसको मुहम्मद बिन तुगलक ने 1337 ई. में जीता था, पर जो सुल्तान के शासन काल के अन्तिम वर्षों में दिल्ली के अधिकार से निकल गया था।

नगर पहुँच कर वह छः महीनों तक किले पर घेरा डाले रहा। छह माह के घेरे के बाद नगरकोट का गद्य क्षमा मांगने के लिए बाध्य हुआ। फ़िरोज़ का नगरकोट पर आक्रमण रोचक है, क्योंकि उसने विभिन्न विषयों पर तीन सौ संस्कृत पुस्तकों का, जो ज्वालामुखी के मन्दिर में सुरक्षित थीं, खालिद खानी नामक राजकवि द्वारा दलाइले-फ़िरोज शाही के नाम से फारसी-पद्य में अनुवाद करवाया।

1361-1362 ई. में फ़िरोज़ ने सिंध-विजय के कार्य को पुन: आरम्भ किया, जो लगभग 11 वर्ष पहले मुहम्मद बिन तुगलक की मृत्यु होने पर त्याग दिया गे था। वह 90 हजार, घुड़सवारों, बहुत से पैदल सिपाहियों, 480 हाथियों तथा हजार नावों को लेकर सिंध के जामों की राजधानी थट्टा की ओर चला।

सिंध के शासक जाम बाबनिया ने उसका सामना करने का निर्णय तथा बीस हजार घुड़सवारों एवं चार लाख पैदल सिपाहियों से एक -सेना का निर्माण किया। दुविधा पड़ने तथा संक्रामक पशुरोग फैल जाने दिल्ली की सेना को बहुत हानि उठानी पड़ी। रोग के कारण लगभग तीन चौथाई सेना का अंत हो गया।

पुनः सेनापति नये सैनिकों की भर्ती करने वह गुजरात लौट गया। पर किन्हीं विश्वासघात मार्ग-प्रदर्शकों द्वारा हो वह कच्छ के मैदान (रन) में बहक गया तथा उसकी सेना की में छः महीनों तक कुछ नहीं मालूम हो सका। लेकिन उसके योग्य मंत्री खाने-जहाँ-मकबूल ने दिल्ली से और सेना भेजी।

तब सुल्तान ने 13.. ई. में पुन: सिंधियों पर आक्रमण किया तथा उन्हें संधि करने को बाध्य किया। सुल्तान को प्रतिवर्ष कई लाख टके कर के रूप में देना स्वीकार किया तथा उसकी अधीनता भी मान ली। पर उसके बंगाल के आक्रमणों की तरह, उसके सिंधी आक्रमणों से भी उसमें सैनिक योग्यता एवं व्यूह-रचना की कुशलता का अभाव परिलक्षित हुआ।

फ़िरोज़ के शासन-काल में मंगोलों के आक्रमण नहीं हुए। यहिया हमें बताता है कि राज्य की सीमाएँ विशाल सेनाओं एवं सुल्तान के शुभचिंतको के अधीन सुरक्षित कर ली गयी थीं। पर फ़िरोजूने दक्कन को दिल्ली सल्तनत के अधीन लाने का कोई प्रयास नहीं किया जब उसके आधकारियों ने उसे दौलताबाद पर आक्रमण करने को कहा, तो जैसे शम्से-सिराज अफ़ीम कहता है, वह- दु:खी दिखलाई पड़ा, उसके नेत्र अश्रुपूर्ण हो गए तथा उनके तर्कों को स्वीकार करते हुए उसने कहा कि मैंने इस्लाम धर्म के लोगों से आगे कभी युद्ध नहीं करने का निश्चय कर लिया है।

फ़िरोज़ में धार्मिक कट्टरता थी और उसने हिन्दुओं को सताया। मिस्र के खलीफा के प्रति उसे बड़ी श्रद्धा थी। मुस्लिम भारत के इतिहास में सर्वप्रथम उसने अपने को उसका प्रतिनिधि कहा। अपने शासन-काल के प्रथम छ: वर्षों में उसे दो बार शासक के विशिष्ट अधिकार-पत्र तथा सम्मान के परिधान प्राप्त हुए।

उसके सिक्कों पर उसका अपना नाम खलीफा के नाम के साथ खुदा हुआ था। उसने राज्य के काम अपने धर्म के धर्मराज्यीय सिद्धान्तों पर चलाने का प्रयत्न किया। उसने अपनी विभिन्न मतावलम्बी प्रजा को उस धर्म का आलिंगन करने को प्रोत्साहित किया जिसमें उसे स्वयं शान्ति मिलती थी। उसने ऐसे नियम बनाये, जो उसके पूर्वगामियों द्वारा अनुसरण की हुई धार्मिक नीति से भिन्न थे।

शायद सरदारों एवं अधिकारियों को शान्त रखने की इच्छा से फ़िरोज जागीर-प्रणाली को पुनर्जीवित किया, जो अलाउद्दीन द्वारा उठा दी गयी उसने, उन्हें अधिक वेतन एवं भत्ता देने के अतिरिक्त; सारे राज्य को उन में ठीके पर बाँट दिया।

यद्यपि प्रकट रूप से इन कामों से नये सुल्तान की मजबूत हुई, पर इनसे अन्त में निष्केन्द्रीकरण की प्रवृत्ति उत्पन्न हो गयी, केन्द्रीय सरकार के अधिकार पर गुप्त रूप से क्षति पहुँची। राजकीय पदों उसने वंशानुगत कर दिया। असैनिक ही नहीं सैनिक पद भी वंशानुगत कर दिये गए। इस कार्य में क्लर्क को घुस देने के लिए उसने स्वयं एक सैनिक को पैसा दिया अर्थात् उसने भ्रष्टाचार को प्रोत्साहित किया।

हमारे बारें में

एग्जाम टॉपर क्लास टीम

My Name is Jitendra Singh (Rana) और मैं एक सफल शिक्षक बनने की तैयारी कर रहा हूं ! और मैं लखनऊ, उत्तर प्रदेश (भारत) से हूँ।
मेरा उद्देश्य हिन्दी माध्यम में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले प्रतिभागियों का सहयोग करना है ! आप सभी लोगों का स्नेह प्राप्त करना तथा अपने अर्जित अनुभवों तथा ज्ञान को वितरित करके आप लोगों की सेवा करना ही मेरी उत्कृष्ट अभिलाषा है !!
दोस्तो अगर आपको यह पोस्ट/विडियो/क्लास अच्छी लगी हो तो इसे Share अवश्य करें ! कृपया कमेंट के माध्यम से बताऐं कि ये पोस्ट आपको कैसी लगी आपके सुझावों का भी स्वागत रहेगा Thanks !

Leave a Comment