भूगोल नोट्स

भारतीय अपवाह प्रणाली Indian drainage system

अपवाह तंत्र से अभिप्राय: वह जलमार्ग है जहां से नदियों इत्यादि का जल प्रवाहित होता है। किसी की मात्रा इत्यादि पर निर्भर करता है। एक नदी एवं उसकी सहायक नदियों द्वारा अपवाहित क्षेत्र को अपवाह द्रोणी कहा जाता है। एक अपवाह द्रोणी को दूसरे से अलग करने वाली सीमा को जल विभाजक कहा जाता है।

भारतीय अपवाह तंत्र को विभिन्न तरीके से विभाजित किया जा सकता है। समुद्र में जल के बहाव के आधार पर, भारत के धरातल का 75 प्रतिशत जल बंगाल की खाड़ी में बहता है तथा बाकी बचा जल अरब सागर में जाता है। अरब सागर अपवाह तंत्र तथा बंगाल की खाड़ी अपवाह तंत्र को दिल्ली रिज, अरावली पर्वत श्रृंखला तथा सह्याद्रि द्वारा निर्मित जल विभाजक द्वारा पृथक् किया जाता है।

गंगा, ब्रह्मपुत्र, महानदी, गोदावरी, कृष्णा तथा कावेरी भारत के बड़े नदी तंत्र हैं जो बंगाल की खाड़ी में गिरती है, जबकि सिन्धु, साबरमती, नर्मदा तथा तपती का बड़ा नदी तंत्र अरब सागर में अपवाहित होता है। भारत का मात्र कुछ प्रतिशत क्षेत्र ही अंर्तभूमि अपवाह के तहत् आता है। जलक्षेत्र/बेसिन के आकार के आधार पर, भारतीय नदियों को तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है:

  1. जो नदियां 20,000 वर्ग किमी. से अधिक जलागम या अपवाह क्षेत्र रखती हैं, विशाल नदियां हैं। ऐसी 14 नदियां हैं जिन्हें भारी वर्षा प्राप्त होती है।
  2. ऐसी नदियां जिनका जलागम या अपवाह क्षेत्र 2,000-20,000 वर्ग किमी. तक है, मध्यम नदियां हैं। इस श्रेणी में 44 नदियां आती हैं।
  3. जिन नदियों का अपवाह क्षेत्र 2,000 वर्ग किमी. से कम है, लघु नदियां हैं। ऐसी नदियां भारी संख्या में हैं।

सामान्यतया अपवाह प्रणाली को दो रूपों में विभाजित कर अध्ययन किया जाता है:

  1. क्रमबद्ध अपवाह तंत्र
  2. अक्रमवतीं अपवाह तंत्र

क्रमबद्ध अपवाह प्रणाली

ढालों के अनुरूप प्रवाहित होने वाली सरिताओं को क्रमबद्ध अपवाह कहते हैं। इसके अंतर्गत निम्नलिखित प्रकार हो सकते हैं-

अनुवर्ती सरिता (Consequent Streams): ढाल के अनुरूप गमन करने वाली नदी को अनुवर्ती या अनुगामी सरिता कहते हैं। दक्षिण भारत की अधिकांश नदी अनुवर्ती श्रेणी की हैं। इन्हें नतजल धारा (DIP) भी कहा जाता है क्योंकि इनका प्रवाह नमन की दिशा में होता है। वलित पर्वतीय क्षेत्रों में इनका उद्गम अभिनति में होता है।

बाद में इनका प्रवाह जालीनुमा विकसित होता है। इनके विकास हेतु सर्वाधिक उपयुक्त स्थलाकृति जलवायुमुखी शंकु तथा गुम्बदीय संरचना होती है।

इनका विकास दो रूपों में सर्वाधिक होता है, प्रथम-वलित पर्वतों की अभिनतियों में तथा द्वितीय-अपनतियों के पार्श्व भागों पर। प्रथम को अनुदैर्ध्य अनुवर्ती तथा द्वितीय को पार्श्ववर्ती अनुवर्ती कहते हैं।

परवर्ती सरिता (SubsequentStream): अनुवर्ती सरिताओं के बाद उत्पन्न होने वाली तथा अपनतियों के अक्षों का अनुसरण करने वाली सरिताओं को परवर्ती सरिता कहते हैं।

जितनी भी नदियाँ प्रमुख अनुवर्ती नदी से समकोण पर मिलती हैं, उन्हें सामान्यतया परवर्ती सरिता कहा जाता है।

प्रतिअनुवर्ती सरिता (ObsequentStreams): प्रधान अनुवर्ती नदी की प्रवाह दिशा के विपरीत प्रवाहित होने वाली नदी को प्रति अनुवर्ती कहते हैं। यह ढाल के अनुरूप प्रवाहित है,

अतः यह भी अनुवर्ती ही होती है, परंतु क्षेत्र की द्वितीय श्रेणी की नदी होने के कारण तथा मुख्य नदी की विपरीत दिशा में प्रवाहित होने के कारण इसे अनुवर्ती न कहकर प्रतिअनुवर्ती कहा जाता है। यह परवर्ती नदियों को समकोण पर काटती हैं।

नवनुवर्ती सरिता (Resequent Streams): ढल के अनुरूप तथा प्रधान अनुवर्ती नदी के प्रवाह की दिशा में प्रवाहित होने वाली नदी को नवानुवर्ती सरिता कहते हैं। नवानुवर्ती, प्रधान अनुवर्ती के बाद विकसित होती है तथा द्वितीय श्रेणी की सरिता होती है। इसका उद्गमवलित संरचना पर द्वितीय अपरदन के समय होता है।

अक्रमबद्ध अपवाह प्रणाली

जो नदियां क्षेत्रीय ढाल के प्रतिकूल तथा भू-वैन्यासिक संरचना के आर-पार प्रवाहित होती हैं; उन्हें अक्रमबद्ध अथवा अक्रमवर्ती नदी कहा जाता है।

ये सरिताएं दो प्रकार से विकसित होती हैं-

पूर्ववर्ती अपवाह तंत्र (Antecedent Drainage system): ऐसे प्रवाह पर संरचना तथा उत्थान का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। यदि किसी क्षेत्र में अपवाह प्रणाली का विकास हो चुका है तथा बाद में प्रवाह मार्ग पर स्थलखण्ड का उत्थान हो जाता है एवं नदी उत्थित भू-खण्ड को काटकर अपने पुराने प्रवाह मार्ग का अनुसरण करती है; तो ऐसे प्रवाह प्रणाली को पूर्ववर्ती अपवाह तंत्र कहते हैं। सिन्धु, सतलज एवं ब्रह्मपुत्र नदियाँ भारतीय उपमहाद्वीप में इस प्रवाह प्रणाली के प्रमुख उदाहरण हैं।

अध्यारोपित प्रवाह प्रणाली (Superimposed Pattern): जब किसी भू-आकृतिक प्रदेश में धरातलीय संरचना नीचे की संरचना से भिन्न होती है, तो इस प्रकार की प्रवाह प्रणाली का विकास होता है। सर्वप्रथम उक्त धरातल पर ऊपरी संरचना के अनुसार प्रवाह विकसित होता है तथा धीरे-धीरे, नदी अपनी घाटी को निम्नवर्ती कटाव द्वारा गहरा करती है

जैसे ही निचली संरचना मिलती है अपरदन कार्य में परिवर्तन आ जाता है परंतु नदी घाटी उस संरचना पर भी निम्नवर्ती कटाव जारी रखती है। इससे उस संरचना पर इसे अध्यारोपित माना जाता है। सोन नदी (रीवा पठार), चम्बल, स्वर्ण रेखा, बनास आदि नदियां इसका प्रमुख उदाहरण हैं।

अपवाह प्रतिरूप

किसी भी, प्रदेश में अपवाह तंत्र के ज्यामितिक आकार तथा सरिताओं की स्थानिक व्यवस्था को अपवाह प्रतिरूप कहते हैं। यह उक्त प्रदेश की संरचना, सरिताओं की अवस्थिति तथा संख्या, प्रवाह दिशा, ढाल, शैलों की विशेषता, विवर्तनिक कारकों तथा हलचलों, जलवायु तथा वनस्पतिक स्वरूप आदि से नियंत्रित होती है। अतः अपवाह प्रतिरूप के अध्ययन में उक्त कारक समाविष्ट हैं। सामान्यतया निम्नलिखित प्रवाह प्रतिरूप विकसित होते हैं-

  1. वृक्षाकार प्रतिरूप: ग्रेनाइट चट्टानों वाले क्षेत्रों में विकसित दक्षिण भारतीय नदियाँ इसी प्रकार की हैं।
  2. समानांतर प्रतिरूप: तीव्र ढाल वाले क्षेत्रों में विकसित होता है।
  3. जालीनुमा प्रतिरूप: क्वेस्टा स्थलाकृति वाले क्षेत्रों में पाया जाता है।
  4. आयताकार प्रतिरूप: जहां चट्टानों की संधियां आयत के रूप में होता है, जैसे- पलामू क्षेत्र।
  5. अरीय प्रतिरूप: ज्वालामुखी शंकु या गुम्बदीय क्षेत्र।
  6. अभिकद्री प्रतिरूप: अंतः स्थलीय प्रवाह के क्षेत्र में पायी जाती है, जैसे-तिब्बत, काठमाण्डू घाटी, लद्दाख आदि।
  7. वलयाकार प्रतिरूप: गुम्बदीय संरचना, जैसे-किऊल नदी (मुंगेर)।
  8. कंटकीय प्रतिरूप: सरिता अपहरण वाले क्षेत्रों में विकसित होता है। सिन्धु एवं ब्रह्मपुत्र नदियों की ऊपरी घाटी में ऐसे प्रतिरूप मिलते हैं।

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