दर्शनशास्त्र नोट्स/ सामान्य अध्ययन

भारतीय दर्शनों एवं पाश्चात्य दर्शन (Indian Philosophies and Western Philosophies)

भारतीय दर्शन

इतिहास इस बात का साक्षी है कि भारत ही नहीं, अपितु समस्त संसार के प्राचीनतम ग्रन्थ वेदही हैं। भारतीय दर्शन का स्रोत वेद है। वेद कोई दार्शनिक ग्रन्थ नहीं है, वरन् दर्शनों के आधारभूत ग्रन्थ हैं। वेदों ने बाद के भारतीय दर्शनों पर अत्यधिक प्रभाव डाला, जिन्हें आज हम ‘षड्दर्शनकहते हैंवे सभी वेदों को मानने वाले हैं। कुछ दर्शन वेदों को नहीं मानते। ऐसे दर्शन तीन हैं- चार्वाक, बौद्ध तथा जैन ।

इस दृष्टि से भी वेदों का महत्व है। अर्थात् भारत में जो चिन्तन हुआ, वह या तो वेदों के समर्थन के लिए या फिर खण्डन के लिए। वस्तुतः पहले ‘नास्तिकशब्द वेदनिन्दक के लिए ही प्रयुक्त होता था, बाद में इसका अर्थ ‘अनीश्वरवादी’ हो गया। ‘नास्तिकशब्द के पहले अर्थ में केवल चार्वाक, बौद्ध तथा जैन दर्शन ‘नास्तिकहैं और दूसरे अर्थ में मीमांसा और सांख्य भी आते हैं, क्योंकि ये भी ईश्वर को नहीं मानते। एक अन्य अर्थ के अनुसार- नास्तिक उसे कहते हैं, जो परलोक में विश्वास नहीं करता है।इस अर्थ में षड्दर्शन तथा जैन एवं बौद्ध दर्शन भी आस्तिक दर्शन हो जाते हैं और केवल चार्वाक दर्शन आस्तिक है।

वेदवास्तव में एक ही है और उसी से चार वेद बन गये हैं, जैसा कि सनत्सुजात के निम्नलिखित कथन से विदित होता है

एकस्य वेदास्याज्ञानाद् वेदास्ते बहवः कृताः।” अर्थात्-अज्ञानवश एक ही वेद के अनेक वेद कर दिये गये हैं। स्थूल दृष्टि से वेद को ‘कर्म-काण्डएवं ज्ञान काण्ड’ में विभक्त किया गया है। ‘कर्म-काण्डमें उपासनाओं का तथा ‘ज्ञान-काण्डमें आध्यात्मिक तत्व का विवेचन है। देवताओं की स्तुतियों में अनेक मंत्र हैं। ऋग्वेद के दशम् मण्डल के 121वें सूक्त में हिरण्यगर्भ की स्तुति की गई है। इस सूक्त से आध्यात्मिक चिन्तन का अच्छा परिचय प्राप्त होता है।

श्रीमद्भगवद्गीता नीतिशास्त्र का विश्वविख्यात ग्रन्थ है। इसमें भगवान कृष्ण ने अर्जुन को उपदेश दिया है। गीता का मुख्य सन्देश ‘निष्काम कर्महै। अर्थात् बिना फल की इच्छा किये हुए कर्म करना चाहिए। आत्मा अजर-अमर है। न तो इसको कोई मार सकता है और न ही यह किसी को मार सकता है। गीता में ज्ञान, भक्ति एवं कर्म-तीनों मार्गो की महिमा बताई गई है। किन्तु निष्काम कर्म को सुगम एवं उत्तम साधन के रूप में स्वीकार किया गया है। लक्ष्य के रूप में ‘मुक्तिही स्वीकार्य है।

चार्वाक दर्शन भौतिकवादी दर्शन है। इसके अनुसार जड़-जगत सत्य है और यह वायु, अग्नि, जल तथा पृथ्वी- इन चार भौतिक तत्वों से बना है। चेतना की उत्पत्ति भौतिक तत्वों से ही है। आत्मा शरीरर को ही कहा जाता है। शरीर के नष्ट होने पर चैतन्य जो भौतिक तत्वों का विशेष है, नष्ट हो जाता है। मृत्यु के बाद कुछ नहीं बचता। परलोक, वेद, ईश्वर आदि को यह दर्शन स्वीकार नहीं करता। इसके अनुसार जब तक जियें सुख से जियें का सिद्धान्त सर्वोत्तम सिद्धान्त है।

जैन दर्शन के अनुसार प्रत्यक्ष के अतिरिक्त अनुमान एवं शब्द भी प्रमाण हैं। भौतिक जगत को जैन दार्शनिक भी चार्वाक की भांति वाय, अग्नि, जल तथा पथ्वी-इन्हीं चार तत्वों के मिश्रण से निर्मित मानते हैं। जैन दार्शनिकों के अनुसार चैतन्य की उत्पत्ति जड़-पदार्थो से नहीं हो सकती। जैन दर्शन के अनुसार जितने सजीव शरीरर हैं, उतने ही चैतन्य जीव हैं। प्रत्येक जीव में अनन्त सुख पाने की क्षमता है। मोक्ष-प्राप्ति सर्वथा संभव है। सांसारिक बंधन से छुटकारा पाने के लिए सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र, तीन उपाय बताये गये हैं।

बौद्ध दर्शन – जगत के सभी प्राणियों में एवं सभी दशाओं में दुःख वर्तमान है और इस दुःख का कारण है- क्योंकि कोई भी भौतिक-आध्यात्मिक वस्तु अकारण नहीं है। संसार की सभी वस्तुएं परिवर्तनशील हैं। मरण का कारण जन्म है। जन्म का कारण तृष्णा है और तृष्णा का कारण अज्ञान है। दुःखों के कारण यदि नष्ट हो जायें तो दुःख का भी अन्त हो जायेगा। चौथा सत्य दुःख-निवृत्तिके उपाय के रूप में है।

दर्शन का अर्थ

(i) पश्चिमी परिवेश में दर्शन का अर्थ

दर्शन शब्द संस्कृत के दृशधातु में ‘ल्यूटप्रत्यय लगाकर बनाया गया है। जिसका अर्थ हैदेखना। इसका अंग्रेजी शब्द Philosophy है, जिसकी उत्पत्ति दो यूनानी शब्दों से हुई है:- philo जिसका अर्थ है Love और Sophia जिसका अर्थ है व of wisdom इस प्रकार philosophy का अर्थ है- Love of Wisdom (ज्ञान से प्रेम)।

(ii) भारतीय परिवेश में दर्शन का अर्थ

दर्शनपद की व्युत्पत्ति दो अर्थ है। पहले, दुश्यते अनेन इति दर्शनम् इस व्युत्पत्ति के अनुसार संस्कृत में दर्शनका अर्थ होता है- जिसके द्वारा देखा जाये।‘ ‘दर्शनशब्द से वे सभी पद्धतियां अपेक्षित हैं, जिनके द्वारा परमार्थ का ज्ञान होता है। ‘देखा जायेइस पद का अर्थ यों तो ‘ज्ञान प्राप्त किया जायेयह भी हो सकता है, फिर भी इस संबंध में यह ध्यान रखना उचित है कि ज्ञान प्राप्त करने के अनेक साधन हैं। जैसे-प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द आदि। लेकिन इन सभी में सबसे प्रसिद्ध और प्रमुख साधन है-प्रत्यक्षा प्रत्यक्ष के भी इन्द्रिय-भेद से पांच प्रकार होते हैं, लेकिन इन सभी में जो ज्ञान चक्षु-इन्द्रिय से प्राप्त होता है-जिसे चाक्षुष प्रत्यक्ष कहते हैं-उसकी प्रामाणिकता सर्वोपरि है। शब्द भी एक प्रकार का प्रत्यक्ष है, जिसको आप्त (विश्वसनीय) पुरूषों ने अपनी अविचलित बुद्धि और शुद्ध अंतःकरण से प्राप्त करके लौकिक जनों के उत्थान हेतु गुरू-शिष्य परम्परा से प्रसारित किया है। प्रायः चार्वाक को छोड़कर जितने भी भारतीय दार्शनिक हैं वे सभी आप्त (विश्वसनीय) वाक्यों की श्रेष्ठ प्रमाणिकता में विश्वास करते हैं। वेद में आस्था रखने वाले शास्त्रकार तो ऐसा मानते ही हैं, किन्तु जैनों एवं बौद्धों के भी अपने-अपने आप्त-वचन अथवा आगम हैं, जिन्हें वे प्रमाण-स्वरूप मानते हैं। इन सबसे प्रत्यक्ष को सर्वोपरि प्रमाण मानने की बात सिद्ध होती है।

दूसरे ‘दृश्यते इति दर्शनम् जो देखा, समझा जाये वह दर्शन है। इस व्युत्पत्ति के अनुसार प्रामाणिक विषय-ज्ञान दर्शन है। इस प्रकार दर्शनके अर्थ में दोनों व्युत्पत्तिमूलक अर्थ शामिल हैं। संक्षेप में, ‘दर्शनशब्द से भारतीय शास्त्रकारों का तत्वसाक्षात्कार अभीष्ठ है। दर्शनशास्त्र में प्रायः उसी साक्षात्कार की कल्पना की जाती है, जिसकी तार्किक विवेचना भी हो सके। दर्शन शास्त्र का इतिहास ही आप्त पुरूषों द्वारा प्रदर्शित तत्व की युक्तिसंगत विवेचना है। इसके वास्तविक अर्थ को तर्क की कसौटी पर कस कर लाने का एक क्रमबद्ध प्रयास है। इस सबसे यह ज्ञात होता है कि दर्शन का अर्थ केवल अर्न्तज्ञान ही नहीं अपितु वे समस्त विचारधारायें हैं जो अंर्तज्ञान से उद्भूत होती हुई भी युक्तियों के आधार पर प्रमाणित की जाती हैं। भारतीय विद्वानों के दर्शन का यही अर्थ अभिमत है।

दर्शन शास्त्र सत्ता संबंधी ज्ञान कराकर मनुष्य का परम कल्याण करता है। यह परम कल्याण ही दर्शन का लक्ष्य है। अब प्रश्न है कि इस परम कल्याण का क्या स्वरूप है ? यद्यपि इस प्रश्न का उत्तर देने में भारतीय दर्शन के आचार्यों में मतभेद हैं, तथापि इन सबमें एक समानता है, जो न केवल वेदपथगामी दार्शनिक सम्प्रदायों की विशेषता है वरन जैन और बौद्ध-सरीखे अवैदिक सम्प्रदाय दो दार्शनिक विचारकों की भी आधारभूत मान्यता है। संसार के विषयों से उत्पन्न होने वाले जितने भी सुख हैं, उनमें दुःख किसी न किसी रूप में छिपा रहता है। इसी दुःख की ज्वाला से तप्त होकर दार्शनिकों ने उसकी निवृत्ति के उपायों की खोज की है।

 

जैनों के अर्हतत्व, बौद्धों के निर्माण, नैयायिकों की आत्यन्तिक दुःख निवृत्ति तथा वेदान्तियों के मोक्ष में दुःख के नाश की कल्पना अन्तर्निहित है। इस प्रकार दुःख का समूल नाश ही भारतीय दर्शन का परम लक्ष्य रहा है। भारतीय दर्शनकारों ने इसी लक्ष्य के साधनभूत अन्यान्य दर्शनों की रचना करके तथा उन्हें अधिकारभेद से मनुष्य की परमार्थसिद्धि में उपयोगी बताकर मनुष्य को परमपद प्राप्त करने का प्रयत्न किया है।

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