प्राचीन भारत का इतिहास नोट्स

उत्तर वैदिक काल Later Vedic Period

उत्तर वैदिक काल (1000-600 ई.पू.)

उत्तर वैदिक सभ्यता का भौगोलिक विस्तार

  • 1500 ई.पू. से 1000 ई. पू. तक के काल को ऋग्वैदिक काल कहा जाता है एवं 1000 ई. पू. से 600 ई.पू. तक के काल को ‘उत्तर वैदिक काल’ कहा जाता है।
  • उत्तर वैदिक काल में ऋग्वेद को छोड़कर अन्य वेदों, ब्राह्मण, अरण्यक एवं उपनिषदों की रचना की गई।
  • उत्तर वैदिक काल में तीन वेदों सामवेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद के अतिरिक्त ब्राह्मण, अरण्यक, उपनिषद और वेदांशो की रचना हुई। ये सभी ग्रन्थ उत्तर वैदिक काल के साहित्यिक स्रोत माने जाते हैं।
  • इस काल के प्राप्त बर्तनों को धूसर मृदभांड कहा जाता है। चित्रित धूसर मृद्भाण्ड इस काल की विशिष्टता थी, क्योंकि यहाँ के निवासी मिट्टी के चित्रित और भूरे रंग के कटोरों तथा थालियों का प्रयोग करते थे।
  • इस काल में लोहे के प्रयोग ने समाजिक-आर्थिक क्रांति पैदा कर दी।
  • उत्तर वैदिक काल में आर्यो का विस्तार अधिक क्षेत्र पर इसलिए हो गया क्योंकि अब वे लोहे के हथियार एवं अश्वचालित रथ का उपयोग जान गए थे।
  • उत्तर वैदिक काल में आर्यों ने अपने क्षेत्र का विस्तार किया और गंगा के आगे बढ़ते हुए पूर्वी प्रदेशों में निवास करने लगे।
  • दिल्ली और दोआब के उपरी भाग पर अधिकार करते हुए बरेली, बदायूं, फर्रुखाबाद तक पहुँच गए और हस्तिनापुर को अपनी राजधानी बनाया, जो उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में स्थित है।
  • मगध में निवास करने वाले लोगों को अथर्ववेद में ‘व्रात्य’ कहा गया है। ये प्राकृत भाषा बोलते थे।
  • उत्तर वैदिक कालीन सभ्यता का मुख्य केंद्र मध्य प्रदेश था, जिसका प्रसार सरस्वती से लेकर गंगा के दोआब तक था।
  • विदेथ माधव कला का उल्लेख शतपथ ब्राह्मण में मिलता है। जो आर्यों के गंगा नदी के पूर्व की ओर विस्तार का प्रतीक है।

उत्तर वैदिक सभ्यता की राजनितिक व्यवस्था

  • ऐतरेय ब्राह्मण में वर्णित शासन पद्धतियाँ
स्थितिशासन का नामशासन का प्रधान
पूर्वसाम्राज्यसम्राट
मध्यराज्यराजा
पश्चिमीस्वराज्यस्वराट
उत्तरवैराज्यविराट
दक्षिणभोज्यभोज
  •  शतपथ ब्राह्मण ने पंजालों को वैदिक सभ्यता का सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधि कहा।
  • अथर्ववेद में परिक्षित को मृत्यु लोक का देवता कहा गया है।
  • राजा की दैवीय उत्पत्ति का सिद्धांत सर्वप्रथम ऐतरेय ब्राह्मण में मिलता है।
  • उत्तर वैदिक काल में राजतंत्रात्मक शासन व्यवस्था और सशक्त हुई।
  • इस काल में राज्य का आकार बढ़ने से राजा का महत्त्व बढ़ा और उसके अधिकारों का विस्तार हुआ। अब राजा को सम्राट, एकराट और अधिराज आदि नामों से जाना जाने लगा।
  • इस काल में राजा का पद वंशानुगत हो गया।
  • ‘राष्ट्र’ शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम उत्तर वैदिक काल में ही किया गया।
  • पुनर्जन्म के सिद्धांत का सर्वप्रथम वर्णन शतपथ ब्राह्मण में किया गया।
  • उत्तर वैदिक में संस्थाओं, सभा और समिति का अस्तित्व कायम रहा किन्तु विदथ का उल्लेख नहीं मिलता है।
  • उत्तर वैदिक काल में ‘सभा’ में महिलाओं का प्रवेश निषिद्ध हो गया।
  • वैदिक कालीन शासन की सबसे बड़ी इकाई जन का स्थान जनपद ने ले लिया।
  • यजुर्वेद में राज्य के उच्च पदाधिकारियों को ‘रत्नीय’ कहा जाता था। ये राजपरिषद के सदस्य होते थे।
  • ‘रत्नीय’ की संख्या 12 बतायी गयी है। रत्नियों को सूची में, राजा के सम्बन्धी, मंत्री, विभागाध्यक्ष एवं दरबारी आते थे।
  • उत्तर वैदिक काल में त्रिककुद, कैञ्ज तथा मैनाम (हिमालय क्षेत्र में स्थित) पर्वतों का उल्लेख भी मिलता है। 
सेनानीसेनापति
सूतराजा का सारथी
ग्रामणीग्राम का मुखिया
भाग दुककर संग्रहकर्ता
संगृहीताकोषाध्यक्ष
अक्षवायपासे के खेल में राजा का सहयोगी
क्षताप्रतिहारी
गोविकर्ताजंगल विभाग का प्रधान
पालागलविदूषक
महिषिमुख्य रानी
पुरोहितधार्मिक कृत्य करने वाला
युवराजराजकुमार
  •  सभा को अथर्ववेद में नरिष्ठा कहा गया है।
  • इस काल में राजा के प्रभाव में वृद्धि के साथ ही जन परिषदों (सभा और समिति का महत्त्व घट गया)।
  • ऋग्वैदिक काल में बलि एक स्वेच्छाकारी कर था, जो की उत्तर वैदिक काल में नियमित कर बन गया।
  • अथर्ववेद के अनुसार राजा को आय का 16वां भाग मिलता था।
  • उत्तर वैदिक कालीन यज्ञों-राजसूर्य, अश्वमेघ और वाजपेय का राजनीतिक महत्त्व था। ये यज्ञ राजा के द्वारा संपन्न कराये जाते थे।

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