प्राचीन भारत का इतिहास नोट्स

मौर्योत्तर साहित्य, व्यापार और वाणिज्य

साहित्य

सातवाहन नरेश कवियों के आश्रयदाता तथा प्राकृत भाषा के परिपोषक थे। उनके शासन-काल में प्राकृत भाषा और साहित्य की बड़ी प्रगति हुई। सातवाहन शासक हाल द्वारा छद्म नाम से लिखी गयी गाथा सप्तशती कृति है। यह प्राकृत भाषा में लिखी गयी एक सुन्दर रचना है। दूसरी सदी ई.पू. में पतंजलि ने महाभाष्य लिखी।

पाणिनी के अष्टाध्यायी पर एक टीका है। चरक संहिता, भरत का नाट्यशास्त्र एवं वात्स्यायन का कामसूत्र इसी काल में लिखा गया। अश्वघोष की दो महत्त्वपूर्ण कृतियाँ बुद्धचरित एवं सौन्दरानद हैं। संभवत: सबसे पहले संपूर्ण नाटक रचना का श्रेय भाष्य (स्वप्नवासवदत्ता) को दिया जाता है।

अब अभिलेखों में प्राकृत भाषा के बदले संस्कृत भाषा पर विशेष बल दिया गया। संस्कृत का पहला अभिलेख रुद्रदामन का जूनागढ़ और कुषाणों का सुई बिहार अभिलेख है। पार्श्व वसुमित्र और अश्वघोष कनिष्क के समकालीन थे और चरक जैसे चिकित्सक उसके दरबार में रहते थे।

व्यापार और वाणिज्य

मौर्य काल के बाद भारतीय व्यापार में विकास के साथ मुद्रा प्रणाली में विशिष्ट प्रगति हुई। ई.पू. और ईसवी सदी के प्रारम्भ में रोम से आने वाले सोने का बड़ी मात्रा में व्यापारिक लेन-देन में प्रयोग किया जाने लगा।

पश्चिमी जगत में स्वर्ण मुद्राओं का प्रचलन हुआ तो भारतीय राजाओं ने परस्पर व्यापार में सुविधा एवं अन्य राष्ट्रों की तुलना में राष्ट्रीय मान को बनाये रखने के लिए सोने के सिक्के जारी किये। व्यापारिक विकास के साथ मौद्रिक व्यवस्था में परिवर्तन एवं बड़ी तादाद में प्रचलन इस युग का विशिष्ट लक्षण रहा है।

इस काल से सम्बद्ध बड़ी संख्या में मुद्राओं की प्राप्ति न केवल समृद्धि का प्रतीक है बल्कि व्यापारिक गतिविधियों के विस्तार को इंगित करती है। विदेशों में भारतीय माल की माँग बढ़ती जा रही थी। इन दिनों पश्चिम में रोमन साम्राज्य एवं चीन में उत्तर हान साम्राज्य का विकास हो रहा था।

रोमन सम्राज्य के अन्तर्गत पूर्व के उत्पादों जैसे गर्म मसाले, सुगन्धित लकड़ी, रेशमी एवं अन्य वस्त्रों की माँग थी। इसी प्रकार उत्तर हान साम्राज्य ने व्यापारियों को काफी प्रोत्साहन दिया जिसके कारण भारत, मध्य एशिया तथा चीन के सम्पर्क बढ़ते गये। बढ़ते विदेशी व्यापार ने स्थानीय आभूषण निर्माताओं, वस्त्र उत्पादकों एवं कृषकों को विविध व्यापार योग्य सामग्री के उत्पादन को प्रेरित किया।

इस काल में व्यापार एवं वाणिज्य को प्रोत्साहन देने वाले कारक- 1. नगरीय एवं ग्रामीण क्षेत्रों में नये वर्गों का उदय हुआ, 2. रोम एवं चीन के साथ व्यापारिक सम्बन्धों का विकास, 3. रोम के साथ व्यापारिक सम्बन्धों के फलस्वरूप दक्षिण-पूर्व एशिया के मसालों के साथ जुड़ाव। मौर्योत्तर काल में शिल्पियों का विशेषीकरण हुआ। मौर्य पूर्व काल की एक कृति, दीर्घनिकाय, में 24 प्रकार के शिल्पों की चर्चा है जबकि महावस्तु में 36 प्रकार के शिल्पों की चर्चा है। मौर्योत्तरकाल के एक ग्रन्थ मिलिन्दपञ्ही में 75 प्रकार के व्यवसायों की चर्चा है, जिनमें 60 विभिन्न प्रकार के शिल्प आते हैं।

इस ग्रंथ में विवेचित व्यवसायों में से सोना, चाँदी, ताँबा, टिन, सीसा, पीतल, लौहा आदि धातुओं से सम्बन्धित थे। पतंजलि के महाभाष्य से भी विविध शिल्पों का ज्ञान होता है। स्वर्णकार, बढ़ई (वर्धकी), माली (मालाकार), बांस के टोकरी निर्माता (बेसकार), गांधिक, मछुए (धनक), कुम्हार (कुलाल), लुहार, धनुषनिर्माता (धनुष्कार), रंगरेज (रंजक) आदि व्यवसायों से सम्बन्धित लोगों के गाँवों में निवास करने का उल्लेख मिलता है। कपड़ा बनाना महत्त्वपूर्ण दस्तकारी कला थी तथा सूती कपड़े भारत से निर्यात किये जाते थे। मथुरा, वाराणसी आदि कपड़ा उत्पादन के कई केन्द्र थे। उत्तर में उज्जैन मनके बनाने का मुख्य केन्द्र था।

यहाँ मनके अर्द्ध-बहुमूल्य पत्थरों, काँच, हाथीदांत तथा मिट्टी के बनाये जाते थे। उत्तर में अनेक नगरों में इनकी बड़ी मांग थी। अफगानिस्तान के प्राचीन कपिसा में हाथी दांत गठित आकृतियाँ भारी संख्या में प्राप्त हुई हैं। वास्तुकला का विशेष विकास इस काल की प्रमुख विशेषता रही है। शुंग काल में भरहुत, बोध गया और साँची कला के प्रमुख केन्द्र थे।

वास्तु कलाकारों ने न केवल स्तूपों का निर्माण किया बल्कि मन्दिर, प्रासाद एवं भवनों का निर्माण भी बड़ी संख्या में किया। कात्यायन ने शिल्पों के लिए कारि शब्द का प्रयोग किया है। अपने कार्य में कुशल एवं प्रवीण शिल्पी राजशिल्पी के रूप में राजा से सम्मान प्राप्त करते थे।

इस समय वास्तु शिल्प इतना अधिक विकसित हो गया था कि एक प्रासाद को बनाने में 18 शिल्पों के जानने वाले कर्मकारों के काम करने की चर्चा मिलती है। संभवत: इन शिल्पकारों में मूर्तिकार, वास्तुशिल्पकार, चित्रकार, जौहरी, लुहार, बढ़ई, स्वर्णकार आदि रहे होंगे। मूर्तिकला का विकास मौर्यकाल में ही हो गया था और इस युग में भी उत्कृष्ट मूर्तियों का निर्माण संभव हुआ।

कुषाण काल में मूर्तिकारों को पश्चिमी जगत के कलाकारों ने प्रभावित किया। परिणामस्वरूप गांधार कला का विकास हुआ। दूसरी ओर स्वदेशी भावना से प्रेरित कलाकारों ने ऐसी कला को विकसित किया जो पाश्चात्य कला से पूर्णतः अप्रभावित थी, जिसे मथुरा कला के नाम से जाना जाता है।

आंध्र क्षेत्र में करीमनगर और नालगोंडा जिले में बहुत सी लोहे की सामग्रियाँ प्राप्त हुई हैं। शिल्पी गाँव में भी बसते थे। तेलांगाना के करीमनगर गाँव में विभिन्न प्रकार के शिल्पी अलग-अलग बसते थे। कपड़े की बुनाई, रेशम बुनने और अस्त्रों के निर्माण एवं विलास की वस्तुओं का निर्माण मुख्य व्यवसाय था। पतंजलि के अनुसार मथुरा में शाटक नाम के एक विशेष वस्त्र का उत्पादन होता था।

दक्षिण भारत के नये नगर में रंगरेजी एक महत्त्वपूर्ण व्यवसाय था। उरेयूर में एक प्रकार का रंगाई हौज प्राप्त हुआ है। ऐसा ही हौज अरिकमेडु में प्राप्त हुआ है। मगध में लोहा बहुत अधिक मात्रा में होता था और वहाँ से बाहर भेजा जाता था। तांबे की खान राजस्थान में मिली हैं। हिमालय की ढलान में कस्तूरी और केसर का उत्पादन होता था।

पंजाब की नमक की पहाड़ी नमक का प्रमुख स्रोत थी। दक्षिण भारत में मसाला, सोना, रत्न तथा चंदन की लकड़ी मिलती थी। कश्मीर, कौशल, विदर्भ और कलिंग हीरे के लिए विख्यात थे। मगध वृक्षों के रेशों से बने वस्त्र के लिए प्रसिद्ध था। बंगाल मलमल के लिए प्रसिद्ध था। मिलिन्दपन्हो के अनुसार बुद्ध की मौसी गौतमी ने वस्त्र निर्माण के पाँच प्रकार बताए हैं। महाभारत, मिलिन्दपन्हो एवं दिव्यावदान के अनुसार गंगा बेसिन, वाराणसी, कोयम्बटूर और अपरान्त (महाराष्ट्र) में विभिन्न प्रकार के सूती वस्त्र निर्मित किए जाते थे।

बंग और पुंड्र क्षेत्र के मलमल को गंगई कहा जाता था। मसलिया और अरगुरु (उरैयूर) भी मलमल के लिए प्रसिद्ध थे। प्लिनी के अनुसार भारत में पीतल और सीसे का उत्पादन नहीं होता था। पेरीप्लस के अनुसार भारतीस इस्पात इतना विकसित था जो विश्व में अद्वितीय था और यह भारत में अरियाका (काठियावाड़) से पूर्वी अफ्रीका भेजा जाता था। भारत में सोने का उत्पादन कम था। महाभारत से ज्ञात होता है कि सोना पूरब से आता था अर्थात् दक्षिण पूर्व एशिया के देशों से। छोटानागपुर एवं असम क्षेत्र में नदी की रेत से भी सोना प्राप्त किया जाता था। पेरिप्लस के अनुसार सुवर्ण (बुलियन) फारस की खाड़ी से पूर्वी अरब क्षेत्र होकर पश्चिम भारत में आता था।

मोती- पेरिप्लस के अनुसार कोलची से प्राप्त होता था (कोरकोई क्षेत्र से)। पेरिप्लस के अनुसार मोती निचले गंगा क्षेत्र से भी निकाले जाते थे। टॉलमी के अनुसार यह सुदूर दक्षिण से प्राप्त होता था। प्लिनी के अनुसार मोती पेरीमोला (आधुनिक चौल) बंदरगाह से प्राप्त होता था। प्लिनी ने भारत को रत्नों की एकमात्र जननी कहा है।

साथ ही भारत को सबसे महंगी वस्तुओं की जन्मदात्री कहा है। ऑलमी के अनुसार हीरे, कोसा (बैराट), सबराई (संबलपुर) और एडम नदी के मुहाने से प्राप्त किये जाते थे। पेरिप्लस के अनुसार गोमेद और कालॅनियन दक्कन के पहाड़ों में पाया जाता था। इसके अनुसार दौशाहन दशारन (पूर्वी मालवा) से एक प्रकार के हाथी दांत का उत्पादन होता था। मध्य प्रदेश में उज्जैन मनके बनाने का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र था। अर्थशास्त्र में मदिरा के उत्पादन पर विशेष विचार किया गया है। इसकी लोकप्रियता की पहचान इस कुलु की मूर्तिकला में विशेषकर संघील एवं मथुरा में चित्रित मद्यपान में की जाती है।

इस काल की एक महत्त्वपूर्ण देन टकसाल कला का विकास होना है। भारत में स्वर्ण मुद्राओं का प्रचलन कुषाणों से प्रारम्भ होता है। कुषाणों से पूर्व ईरानी सम्राट् डेरियस ने सोने के सिक्के डेरिक तथा चाँदी के सिगलाय का प्रचलन किया था। लेकिन इन मुद्राओं का प्रचलन सुदूर पश्चिमोत्तर भारत के उस छोटे से प्रदेश तक सीमित रहा जहाँ ईरानी आधिपत्य स्थापित हो गया था।

कालान्तर में इण्डोग्रीक शासक यूक्रेटाइडीज ने सोने के सिक्के प्रचलित किये किन्तु इनकी संख्या सीकित थी। कुषाण शासक विम कदफिसस द्वारा स्वर्ण मुद्राओं का प्रचलन अपने आप में एक महत्त्वपूर्ण घटना है। इसका बहुत कुछ श्रेय तत्कालीन रोम के साथ भारत के व्यापारिक सम्बन्धों को जाता है। रोम के साथ व्यापारिक सम्बन्धों के कारण प्रभूत मात्रा में रोमन स्वर्ण मुद्राओं का भारत में आगमन हुआ। भारत एवं रोमन साम्राज्य के मध्य व्यापारिक सम्बन्ध आगस्टस (ई.पू. 31 से 14) से नीरो के काल तक अपनी पराकाष्ठा पर थे।

कुषाण सिक्के अपनी बनावट एवं योजना में पह्नव सिक्कों की अपेक्षा कहीं अधिक सुन्दर हैं। कुषाणकालीन ठप्पा बनाने की कला में पश्चिमी शैली का स्पष्ट अनुकरण दिखाई देता है। उस काल में रोमन मुद्रा ओरेई अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार जगत में स्वीकृत थी। अत: कुषाण शासकों ने इन्हीं सिक्कों के तौल एवं मान का अनुकरण किया। कुषाणकालीन सिक्कों में ग्रीक, पार्थियन, रोमन एवं भारतीय तत्त्वों का अनूठा मिश्रण देखा जा सकता है।

कुषाण शासकों ने स्वर्ण एवं ताम्र मुद्राओं के अतिरिक्त सीमित मात्रा में रजत मुद्राओं का प्रचलन किया। सोने एवं तांबे के सिक्के एक निश्चित तौल परम्परा पर आधारित थे। कुषाणों की सोने की दीनार मुद्रायें प्रायः रोम ओरई सिक्कों के तौल एवं मान के निकट हैं। सिक्कों को ढालने एवं ठप्पा अंकित करने से पूर्व साफ किए जाने की प्रक्रिया का मिलिन्द्पन् आदि में विवरण आया है।

  • सोने के सिक्के- निष्क सुवर्ण और पण कहलाते थे।
  • चाँदी के सिक्के- शतमान्, पूरण और धरण थे।
  • तांबे एवं रांगो के सिक्के को काकणि कहा जाता था।

सातवाहन भी कई प्रकार के सिक्के चलाते थे- अवन्ति से प्राप्त ताँबे के एक सातवाहन सिक्के पर नाव का चिह्न है। सातवाहन के सिक्के कार्षापण सोना, चाँदी, तांबा और सीसा चारों धातु के होते थे। सातवाहनों ने सीसे के सिक्के भी चलाए।

कार्षापण सोना, चाँदी, ताँबा और सीसा चारों धातु का होता था। कुषाणों ने 35 देवताओं का अंकन अपने सिक्कों पर किया है। कनिष्क के सिक्के पर निम्नलिखित देवताओं के चित्र मिलते हैं- बौद्ध देवता-अद्वैत बुद्ध, शाक्यमुनि। ब्राह्मण देवता-महासेन, स्कंद, कुमार, विशाख, उमा, वरूण (हेरोन), भवेस। इरानी दवता-मित्श्रा, हेलियोस, शेलेन, हेराक्लीज।

शहरी केन्द्रों का विकास- पुरातात्विक स्थलों के उत्खनन से प्राचीन नगरों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। तक्षशिला (आधुनिक इस्लामाबाद से 30 कि.मी. उत्तर पश्चिम में) के उत्खनन में मौर्यकाल के अवशेष प्राप्त हुए हैं। सर जॉन मार्शल ने 1913 ई. में इसकी खुदाई प्रारम्भ करवाई थी, जो दो दशक तक चलती रही। पक्की ईंटों का प्रयोग किया जाता था।

गोलाकार इमारतें अर्द्धवृत्ताकार ईंटों से बनाई जाती थीं। यमुना के किनारे पुराना किला, मथुरा एवं कौशाम्बी जैसे नगरों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। अहिछत्र (जिला बरेली) उत्तरी पांचालों की राजधानी थी। वाराणसी कपड़ा उत्पादन एवं हाथीदांत का महत्त्वपूर्ण केन्द्र था। वैशाली (उत्तरी बिहार स्थित आधुनिक वैशाली) से भारी संख्या में मुहरें आदि प्राप्त हुई हैं जो व्यापारिक गतिविधियों को इंगित करती हैं। तामलुक तथा चन्द्रकेतुगढ़ बंगाल के प्रमुख व्यापारिक केन्द्र थे। मध्य पश्चिमी भारत में उज्जैन मनका उत्पादन के लिए विख्यात था।

हमारे बारें में

एग्जाम टॉपर क्लास टीम

My Name is Jitendra Singh (Rana) और मैं एक सफल शिक्षक बनने की तैयारी कर रहा हूं ! और मैं लखनऊ, उत्तर प्रदेश (भारत) से हूँ।
मेरा उद्देश्य हिन्दी माध्यम में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले प्रतिभागियों का सहयोग करना है ! आप सभी लोगों का स्नेह प्राप्त करना तथा अपने अर्जित अनुभवों तथा ज्ञान को वितरित करके आप लोगों की सेवा करना ही मेरी उत्कृष्ट अभिलाषा है !!
दोस्तो अगर आपको यह पोस्ट/विडियो/क्लास अच्छी लगी हो तो इसे Share अवश्य करें ! कृपया कमेंट के माध्यम से बताऐं कि ये पोस्ट आपको कैसी लगी आपके सुझावों का भी स्वागत रहेगा Thanks !

Leave a Comment