प्राचीन भारत का इतिहास नोट्स

मौर्यकालीन अर्थव्यवस्था Mauryan Economy

आर्थिक दृष्टि से मौर्य काल को बहुमुखी प्रगति का युग कह सकते हैं। इस काल में न केवल कृषि उत्पादन में वृद्धि हुई बल्कि उद्योग, पशुपालन व्यवसाय, खनिज उत्खनन एवं व्यापार में भी अतीव प्रगति हुई। लोहे के अधिक उपयोग के कारण तकनीकी आधार मिला। मगध साम्राज्य के आसपास लोहे की खाने थीं (वर्तमान दक्षिण बिहार क्षेत्र में) और महत्त्वपूर्ण जल और स्थल मार्ग पर उसका नियन्त्रण था।

कहा गया है- दक्षिण बिहार के समृद्ध लौह अयस्क तक आसानी से पहुँच होने की वजह से लोग लोहे के औजारों का अधिकाधिक प्रयोग करते थे। हमें मौर्यकालीन सकोटर कुल्हाड़ियाँ, हँसिए और साथ ही हल की फाल मिली हैं। हालाँकि अस्त्र-शस्त्रों पर मौर्य-राज्य का एकाधिकार था,किन्तु अन्य  लौह उपकरणों का इस्तेमाल किसी वर्ग तक सीमित नहीं था। उसका निर्माण और उपयोग गंगा द्रोणी से साम्राज्य के दूरवर्ती भागों में फैला होगा।

इन औजारों की सहायता से पूर्वी गंगा घाटी के घने जंगलों को काटने में आसानी हुई होगी और कृषि के क्षेत्र में कुशलता बढ़ी होगी। दक्षिणी बिहार के पूरे लौह क्षेत्र में लोहे के छोटे-छोटे टुकड़े बिखरे मिले हैं। गंगा घाटी की मिट्टी भारी दुम्मटी होने के कारण हल में भारी लोहे की जरूरत पड़ती थी।

आर्थिक व्यवस्था का आधार कृषि था। धीरे-धीरे व्यापार का महत्त्व बढ़ने लगा। बुद्ध युग में ही द्वितीय नगरीकरण की प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी थी। इस काल में पक्के ईंटों का प्रयोग होने कागा और नगरीय संरचना व्यवस्थित हुई।

अर्थशास्त्र में नई भूमि पर कृषि के विकास को प्रोत्साहन देने की बात की गयी ताकि राजस्व में वृद्धि हो। घने बसे हुए क्षेत्रों में बसने के लिए प्रोत्साहन दिया गया। राजकीय भूमि सीता कहलाती थी और इस भूमि पर उत्पादन कार्य के लिए सीताध्यक्ष नामक अधिकारी को नियुक्त किया जाता था। सीताध्यक्ष नामक अधिकारी निम्नलिखित प्रकार के मजदूरों की सहायता से यथा, दास, कर्मकार (मजदूरी पर कार्य करने वाले मजदूर) और दंड प्रतिकर्ता (अपराधी) की मदद से खेती का काम करते थे।

पहली बार मौर्य काल में ही बहुत बड़ी संख्या में शूद्रों को कृषि में लगाया गया। सीता भूमि पर कर बहुत बड़ी मात्रा में लिया जाता था। सीता भूमि लोगों को केवल जीवन भर के लिए दी जाती थी, किन्तु अगर जिस किसी ने स्वयं उसे बसाया है तो वह उसके उत्तराधिकारियों को भी मिल सकती थी। सीता गाँव में नट, नर्तक (Dancer), गायक, वादक और कथावाचक का प्रवेश वर्जित था।

मेगस्थनीज ने लिखा है कि कृषक संख्या में सबसे अधिक हैं। भारतीय समाज के विभाजन में किसानों को मेगस्थनीज ने तीसरे स्थान पर रखा है। यद्यपि भारतीय समाज का विभाजन सम्बन्धी उसका दृष्टिकोण ठीक नहीं था परन्तु यह तथ्य महत्त्वपूर्ण है कि खेती में लगे किसानों की बड़ी संख्या ने उसका ध्यान आकृष्ट किया। यूनानी स्रोत यह भी हमारी जानकारी में लाते हैं कि खेतिहरों के पास अस्त्र-शस्त्र नहीं होते थे। कृषकों को पवित्र एवं अवध्य समझा जाता था।

युद्ध के दौरान भी खेती करने वाले लोगों को पूर्णतया बिना किसी बाधा के कार्य करने की स्वतन्त्रता थी। कौटिल्य कृषि, पशुपालन तथा व्यापार के लिए वार्ता शब्द का प्रयोग करता है। ये तीनों वैश्यों के व्यवसाय बताये गये। लोग टिल, जौ, मुंग, उड़द, गेंहूं, चावल, प्रियंगु चावल, कोड़ों आदि का उत्पादन करते थे। चावल की दो नई किस्मों दारक एवं वरक का उल्लेख मिलता है। अन्य विक्रय योग्य उत्पादों में गोल मिर्च, जीरक, सरसों, धनिया प्रमुख थे। फलाम्ल वर्ग में आम, अनार, आवला, नींबू, इमली, करोंदा, बेर का विवरण आया है।

कृषि- क्षेत्र में मौर्यकाल की महत्त्वपूर्ण देन सिंचाई साधनों का विकास था। अर्थशास्त्र में अच्छा प्रशासन उसे कहा गया है जिसमें किसान खेती के लिए केवल वर्षा के पानी पर निर्भर न रहे। अतः सिंचाई के लिए अनेक साधन जुटाए जाने चाहिए एवं किसानों को सिंचाई साधनों का उपयोग करने में पूरी सावधानी बरतनी चाहिए। यह भी कहा जा सकता है की यदि कोई व्यक्ति तलब को तोड़ दे तो उसे तालाब में डुबो दिया जाये। मेगस्थनीज का क कि का अधिकांश क्षेत्र सिंचाई के अन्तर्गत है जिससे वर्ष में दो-दो फसलें तैयार हो जाती हैं।

अन्यत्र उल्लेख किया है कि कुछ लोगों को यह कार्य सौंप दिया गया गया है कि वे नदियों की देखभाल करें, भूमि की जाँच करें, जैसी की मिस्र में व्यवस्था है। उन नालियों का निरीक्षण करते रहें जिनके द्वारा बड़ी नहरों से पानी दूसरी शाखाओं में लाकर सिंचाई के लिए चारों ओर बार-बार पानी मिल सके। इससे स्पष्ट होता है कि खेतिहरों की भलाई के लिए जल आपूर्ति सम्बन्धी कुछ नियम थे। अर्थशास्त्र से सिंचाई साधनों की जानकारी मिलती है।

जो किसान नदी, सरोवर, तड़ाग या कुएं से सिंचाई करते थे उपज का चतुर्थाश देना होता था। यह कर केवल सिंचित भूमि पर लगाया जाता था, अतः इस निष्कर्ष पर पहुँच जा सकता है की राज्य कम वर्षा वाले क्षेत्र में ही सिंचाई सुविधा उपलब्ध करवाता था। ताकि उन इलाकों में सिंचाई की नियमित आपूर्ति से अच्छी फसल प्राप्त की जा सके।

नहरों द्वारा सिंचाई का एक मात्र अभिलेखीय प्रमाण रूद्रदामन का जूनागढ़ लेख है जिसमे यह वर्णन आया है की पुष्यगुप्त ने एक दुर्ग और एक चट्टान के मध्य प्रवाहित जल-स्रोत को बंधकर सुदर्शन नामक झील बनवाई। परन्तु उसे पूरा तुषाष्प ने करवाया था। यह झील 800 वर्षों अर्थात 5वीं शताब्दी ई. तक सिंचाई का स्रोत बनी रही। जूनागढ़ सौराष्ट्र प्रांत के अंतर्गत था और पुष्यगुप्त चन्द्रगुप्त के काल में तथा तुषाष्प अशोक के समय गवर्नर थे। सिंचाई की व्यवस्था को सेतुबंध कहा गया है। सिंचाई पर अलग कर लिया जाता था। इसे उदायभाग कहा जाता था। इसकी दर उपज की ⅕ से ⅓ भाग तक होती थीं। वर्षा के मापने के उपकरण को अरत्नी कहते हैं। एक अरत्नी 24 अंगुल के बराबर होती थी।

कहा गया है कि शास्त्रों ने राजा को ही पृथ्वी एवं जल का स्वामी माना है। अत: वह भूमि-कर के अतिरिक्त जल-कर लेने का भी अधिकारी है। अपने कुएं से सिंचाई करने वाले किसान फसल का पाँचवाँ हिस्सा अन्न राजा को जलकर के रूप में दें। स्वयं कन्धे पर रखकर घड़े द्वारा सिंचाई करने वाला चतुर्थांश और नहर आदि के जल से सिंचाई करने वाला तृतीयांश दें।

आपत्तिकाल में भूमिकर बढ़ाकर एक-तिहाई या एक-चौथाई किया जा सकता था, जिसे रायचौधरी अधिक मानते हैं। इस सन्दर्भ में लिखा है यूनानी इतिहासकारों के अनुसार, कभी-कभी किसान पैदावार का चतुर्थांश देने के बाद भी कुछ भूमि त्याग देते थे। कौटिल्य ने भूमिछिद्र विधानम् शीर्षक अध्याय में कृषि योग्य भूमि के अतिरिक्त अन्य भूमि का उल्लेख किया है। उस पर पशुओं के लिए तृण-जल आदि का क्षेत्र बनवा दिये जाने का विवरण मिलता है। सम्भवत: भूमिछिद्र से अभिप्राय ऐसी भूमि से होगा जो कृषि योग्य न हो।

भूमि का स्वामित्व- मेगस्थनीज यह कहता है कि राजा भूमि का मालिक होता था। परन्तु यह विवादास्पद है। साम्राज्य में भूमि मिल्कियत की पाँच संभावनाएँ हैं- (1) राजा, (2) राज्य या सरकार, (3) बड़े जमींदार, (4) सामूहिक मिल्कियत, (5) किसान।

अर्थशास्त्र में क्षेत्रक (भू-स्वामी) और उपवास (कास्तकार) में स्पष्ट भेद किया गया है।

कर निर्धारण- भू-राजस्व के आकलन में भूमि का प्रकार भी निर्धारित किया जाता था। भू-राजस्व के अनुसार गाँवों को भी श्रेणीबद्ध किया गया था।

  1. वैसे गाँव जो कर से मुक्त थे परिहारिक कहलाते थे।
  2. सैनिक प्रदान करने वाले गाँव आयुधीय कहलाते थे।
  3. अनाज-पशु एवं सोने के रूप में कर देने वाले गाँव हिरण्य कहलाते थे।
  4. कच्चा माल देने वाले गाँव कुप्य कहलाते थे।
  5. बेगार देने वाले गाँव विष्टि कहलाते थे।

मेगस्थनीज का मानना है कि भूमि राजस्व की राशि कुल उत्पादन का ¼ थी। किन्तु अधिकांश संस्कृत ग्रन्थों में इसकी दर कुल उत्पादन का ⅙ निर्धारित की गई है। इसलिए राजा को षड्भागी कहा जाता था। अर्थशास्त्र का कहना है कि कर की मात्रा सिंचाई सुविधा पर निर्भर करती थी। यह उपज के पाँचवें भाग की एक तिहाई होती थी। केवल रूस्मिन्दड़ शिलालख से अशोक काल के करारोपण का विवरण मिलता है। इसके अनुसार कर की राशि कुल उत्पादन का ⅛ कर दी गई थी एवं बलि को माफ कर दिया गया था। भू-राजस्व को भाग कहा जाता था।

बलि- अर्थशास्त्र में बलि का अर्थ वह उप कर प्रतीत होता है जो राजा उपज के भाग के अतिरिक्त प्रजा से लेता था।

पिंडकर- कुछ गाँवों को जो कर, इकट्ठा देना होता था उसे पिंड कर कहा जाता था।

सेनाभक्त- संभवत: गाँव वालों को सेना को भोजन व्यवस्था के लिए जो धन देना होता था उसे सेनाभक्त कहा जाता था।

हिरण्य- संभवत: यह किसानों से नकद कर के रूप में लिया जाता था।

प्रणय कर- इस कर का उल्लेख सबसे पहले पाणिनी ने किया था। परन्तु, पहली बार विस्तार से इसका विवरण अर्थशास्त्र में है। यह एक प्रकार का युद्ध कर था। जो कुल उपज के ⅓ से ¼ भाग तक एक ही बार में लिया जाता था।

मेगस्थनीज का मानना है कि भारत में अकाल नहीं पड़ते थे, किन्तु जैन परंपरा एवं सोहगौरा और महास्थान अभिलेख से यह ज्ञात होता है कि भारत में दुर्भिक्ष आते थे। कौटिल्य ने लिखा है कि दुर्भिक्ष होने पर राजा को भूराजस्व वसूल नहीं करना चाहिए। जैसा पूर्व में उल्लेख किया गया है कि गाँवों को कर मुक्त (परिहारक), सैनिक प्रदान करने वाले (आयुधीय), अनाज तथा पशु आदि रूप में कर देने वाले (हिरण्य), कच्चा माल देने वाले (कुप्प), बेगार द्वारा ऋण चुकाने वाले (विष्टि) आदि श्रेणियों में बाँटा जाता था।

सैनिक नहीं होते थे। वरन उनकी स्थिति आज के आरक्षित सैनिकों की तरह थी। सैनिकों के निम्न प्रकार थे- (1) वंशानुगत सैनिक (2) भाडे पर लाये गए सैनिक (3) सैनिकों का निगम (4) जनजातियों से बनी सेना। खेती की जमीन रज्जु के पैमाने मापी जाती थी। वन दो प्रकार के होते थे हस्तिनवन और द्रव्यवन। कौटिल्य कृषि, पशुपालन और वाणिज्य व्यापार के लिए वार्ता शब्द का प्रयोग किया कौटिल्य का मानना है कि भूमि ऐसी होनी चाहिए जिसमें बिना वर्षा की होती है और ऐसी भूमि को अदेवमातृक कहा है। मौर्यकाल में वित्तीय वर्ष जुलाई (आषाढ़) से प्रारंभ होता था। वर्ष 354 दिनों का होता था।

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