बाल मनोविज्ञान नोट्स

विकास की अवधारणा और अधिगम से सम्बन्ध (MEANING OF DEVELOPMENT AND RELATION WITH LEARNING

विकास की अवधारणा और अधिगम से सम्बन्ध (MEANING OF DEVELOPMENT AND RELATION WITH LEARNING)
विकास(Development)

  • सम्पूर्ण आकृति या रूप में परिवर्तन ही ‘विकास’ है। वास्तव में विकास सम्पूर्ण अभिवृद्धियों का संगठन है। इसके कारण बालक की कार्यक्षमता और कुशलता में प्रगति होती है। उदाहरणार्थ-पैरों की वृद्धि, अभिवृद्धि है, किन्तु इनका सम्मिलित रूप ‘शारीरिक विकास कहलाता है। इस विकास से ही शारीरिक क्षमता में परिवर्तन आता है।
  • शिक्षा बालक के लिए है न कि बालक शिक्षा के लिए। अतः शिक्षा के उद्देश्य निर्धारित करते समय बालक की ओर ध्यान जाता है अर्थात् शिक्षा का केन्द्र बिन्दु बालक है।” बालक का विकास कैसे होता है ? बालक में किस प्रकार परिवर्तन आते हैं? इसका उत्तर प्राप्त करने के लिए विकास को समझना आवश्यक है।
  • विकास के सम्बन्ध में कहा जाता है कि बालक में होने वाले क्रमिक परिवर्तनों के फलस्वरूप होने वाली प्रगति ही विकास है। बालक परिपक्वता और अधिगम के आधार पर पूर्व मे अधिगमित (सीखे हुए) गुणों अथवा योग्यताओं को परिमार्जित करता है तथा अपने भीतर नवीन गुणों और योग्यताओ का विकास करता है।

हरलॉक 1990 ने विकास के विषय में लिखा है-”विकास का अर्थ गुणात्मक परिवर्तनों से है। विकास की परिभाषा क्रमिक सम्बद्धतापूर्ण परिवर्तनों की प्रगतिपूर्ण शृंखला के रूप मे दी जा सकती है। प्रगतिपूर्ण का अर्थ है कि परिवर्तन दिशात्मक (Directional) होते है तथा यह पृष्ठोन्मुख की अपेक्षा अग्रोन्मुख होते हैं।’
लाबार्बा 1981 के अनुसार, “विकास का अर्थ परिपक्वात्मक परिवर्तन या परिवर्तनों से है जो जीवधारी के जीवन में समय के साथ घटित होते हैं।”
एण्डरसन 1996 के अनुसार, ”विकास का अर्थ मात्र किसी व्यक्ति की ऊँचाई या योग्यता में कुछ वृद्धि से नहीं है। इसके स्थान पर विकास अनेक संरचनाओं और प्रकार्यों के समन्वय की एक जटिल प्रक्रिया है।”
विकास की विशेषताएँ (Characteristics of Development)

  • विकास प्रगतिपूर्ण शृंखला के रूप में घटित होता है।
  • विकास में क्रमिक परिवर्तन पाए जाते हैं। परिवर्तनों में निरन्तरता पायी जाती है, यह परिवर्तन अविराम गति से चलते हैं। विकास किसी भी विकास-अवस्था में सामान्य नहीं होता है।
  • क्रमिक परिर्वतन एक-दूसरे के साथ किसी-न-किसी रूप

से सम्बन्धित रहते हैं। यह परिवर्तन एक-दूसरे से अलग न होकर जुड़े हुए होते हैं।

  • विकास परिवर्तनों की गति भिन्न-भिन्न अवस्थाओं में भिन्न-भिन्न होती है। विकास की गति गर्भकालीन अवस्था में सर्वाधिक और परिपक्वावस्था के पश्चात् मन्द हो जाती हैं।
  • विकास के पश्चात् व्यक्ति में अनेक नई विशेषताएँ और

क्षमताएँ उत्पन्न होती हैं।
विकास के स्वरूप
(Forms of Development)
1. आकार में परिवर्तन (Changes in Size)-विकास के द्वारा
बालक के शारीरिक आकार में निरन्तर परिवर्तन होता रहता है। आकार में होने वाला परिवर्तन स्पष्ट रूप से दिखाई देता है जैसे-लम्बाई, भार आदि ।
2. अनुपात में परिवर्तन (Changes in Proportion)-बालक
के शरीर का विकास एक अनुपात में होता है। समस्त शारीरिक अग एक निश्चित अनुपात में होते हैं।
3. पुरानी संरचना में परिवर्तन (Changes in Old Features)-विकास के क्रम में बालक की पुरानी शारीरिक संरचना में भी परिवर्तन होता है।
4. नवीन गुणों की प्राप्ति (Aquisition of New Features) – विकास द्वारा जहाँ पुरानी संरचना परिवर्तित होती है वहीं पर नवीन गुणों की प्राप्ति भी होती है।
विकास के सिद्धान्त (Principles of Development)
1. निरन्तरता का सिद्धान्त (The Principle of Continuity)-मानव के जन्म से लेकर मृत्यु तक विकास की प्रक्रिया सदैव निरन्तर गति से चलती रहती है। मानव जीवन के कुछ वर्षों में विकास तीव्र गति से होता है तथा कुछ में विकास की गति धीमी होती है। इस सिद्धान्त के अनुसार विकास की प्रक्रिया कभी रुकती नहीं है।
2. विकास क्रम का सिद्धान्त (The Principle of Development Sequence)-
बालक के विकास का एक क्रम होता है। जन्म के समय बालक केवल रोना जानता है। छः-सात महीने बाद वह ‘पा’, ‘मा’, ‘बा’ आदि शब्द अपने मातापिता के लिए प्रयोग करने लगता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि बालक का गामक (Motor) और भाषा सम्बन्धी
विकास एक निश्चित क्रम में होता है।
3. व्यक्तिगत विभिन्नताओं का सिद्धान्त (The Principle of individual differences)-
डगलस (Dauglas) तथा हॉलैंड (Holland) के मतानुसार प्रत्येक के विकास की गति भिन्न होती है। व्यक्ति की बुद्धि, लिंग, वातावरण आदि का प्रभाव उसके विकास पर पड़ता है। एक ही आयु के दो बालकों के शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक विकास में अन्तर
होता है, जो व्यक्तिगत विभिन्नताओं का ही प्रभाव है।
4. विकास दिशा का सिद्धान्त (The Principle of Develop
mental Direction)-
मानव विकास सिर से शुरू होकर पैर की ओर चलता है। जन्म लेने के पश्चात् प्रथम सप्ताह में बालक केवल सिर को उठा पाता है। तीन माह में वह अपनी आँखों पर नियन्त्रण कर लेता है। छ: माह में वह अपने हाथों की गति करने लगता है। एक वर्ष में स्वयं बैठने और घिसट कर चलने लगता है। गर्भावस्था में भी पहले सिर का विकास होता है, फिर धड़ व टाँगों का विकास होता है।
5. समान प्रतिमान का सिद्धान्त (The Principle of Uniform
Pattern)-
हरलॉक (Hurlock) के अनुसार, प्रत्येक जाति, चाहे वह पशु जाति हो या मानव जाति अपनी जाति के अनुरूप विकास के प्रतिमान का अनुसरण करती है। बालक चाहे ब्रिटेन में पैदा हो, चाहे भारत में उसका शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक, सामाजिक आदि विकार
समान रूप से होता है।
6. एकीकरण एवं पारस्परिक सम्बन्ध का सिद्धान्त (Tha
Principle of Integration and Inter-relationship)- प्रत्येक बालक पहले अपने शरीर के पूर्ण और फिर अंग के भागों को चलाना सीखता है। बालक पहले पूरे हाथ को उठाना सीखता है और फिर हाथ की अंगुलियों को चलाना सीखता है। इसके साथ-साथ बालक के शारीरिक मानसिक व संवेगात्मक विकास में पारस्परिक सम्बन्ध
होता है।
7. वंशानुक्रम एवं वातावरण की अन्तःक्रियाओं का सिद्धान्त
(The Principle of Interaction of Heredity and Environment)-मानव विकास वशानुक्रम तथा वातावरण की अन्तक्रिया का परिणाम है। वंशानुक्रम मानव विकास की कुछ सीमाएँ निर्धारित करता है, जिस सीमा के आगे उसका विकास सम्भव नहीं हो सकता। इसी प्रकार मानव जीवन के प्रारम्भिक वर्षों में उसका वातावरण उसकी जन्मजात योग्यताओं को प्रभावित करता है।

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