मध्यकालीन भारत का इतिहास नोट्स

मुगलों की शासन व्यवस्था Mughal Administration

मुगलों के राजत्व की अवधारणा तुर्की मंगोल परंपरा पर आधारित थी। तुर्की मंगोल परंपरा में शक्तिशाली राजतंत्र की अवधारणा थी। मंगोल खलीफा की सत्ता को नहीं मानते थे। चंगेज खाँ के पौत्र हलाकू खाँ ने बगदाद के खलीफा की हत्या कर दी। मुगलों ने भी मंगोलों के प्रभाव में खलीफा की सत्ता को नकार दिया। मुगल शासकों ने अपने को खलीफा घोषित किया। अपनी विदेश नीति की बाध्यता के कारण भी मुगलों ने अपने को खलीफा घोषित किया।

बादशाह और सुल्तान में अंतर- सुल्तान अपने से ऊपर खलीफा की सत्ता को मानते थे, जबकि बादशाह अपने को खलीफा मानते थे। बाबर ने अपने को बादशाह या पादशाह घोषित किया था।

अकबर के समय राजत्व का भारतीयकरण भी हुआ। अकबर अपने सम्मुख चक्रवर्ती सम्राट् की अवधारणा रखता था। वह अवधारणा भारतीय परंपरा पर आधारित थी। अबुल फजल ने राजत्व को फर्र-ए-इज्दी (दैवी प्रकाश) कहा है जो देवता से निकलता है और सीधे राजा पर पड़ता है। जहाँगीर ने अकबर के सुलह-ए-कुल की नीति को बनाये रखा और शाहजहाँ ने भी कुछ हद तक इसका अनुशरण किया किन्तु औरंगजेब ने इसे उलट दिया। औरंगजेब का घोषित उद्देश्य दर-उल-हर्ब (मूर्ति पूजक का देश) को दर-उल-इस्लाम (इस्लाम का देश) बनाना था। औरंगजेब विचार, व्यवहार और कार्य में अकबर के विपरीत था।

मुगल शासन का स्वरूप- दिल्ली के सुलतानों के विचारों एवं सिद्धान्तों से भिन्न विचारों और सिद्धांतों पर मुगल शासन की स्थापना मुख्यत: अकबर का कार्य था। उसके दो पूर्वाधिकारियों- बाबर तथा हुमायूँ- में असैनिक सरकार की पद्धति को रूपायित करने के लिए बाबर को न तो समय था और न अवसर ही तथा हुमायूँ का न तो झुकाव था और न योग्यता ही।

यद्यपि अकबर उच्च श्रेणी की राजनैतिक प्रतिभा से सम्पन्न था तथापि कुछ बातों में वह सूरों के शासन सम्बन्धी संगठन का ऋणी था। मुगल सरकार भारतीय तथा गैर-भारतीय तत्वों का सम्मिश्रण थी। कह सकते हैं कि यह भारतीय वातावरण में पारसी-अरबी प्रणाली थी। यह स्वरूप में मुख्यतया सैनिक भी थी तथा मुगल राज्य के प्रत्येक अफसर को सेना की सूची में नाम लिखना पड़ता था।

यह आवश्यक रूप में एक केन्द्रीकृत एकतंत्री शासन था तथा बादशाह की शक्ति असीम थी। उसका शब्द कानून था तथा उसकी इच्छा का कोई विरोध नहीं कर सकता था। वह राज्य में सर्वोच्च अधिकारी, शासन का प्रधान, राज्य की सेनाओं का अध्यक्ष, न्याय का स्रोत तथा प्रधान कानून-स्रष्टा था। वह अल्लाह का खलीफा था तथा (इस्लामी) धर्मग्रंथों एवं इस्लामी परम्पराओं का पालन करना उसका कर्त्तव्य था।

परन्तु व्यवहारिक रूप में यदि कोई प्रबल बादशाह चाहता, तो वह धार्मिक कानून (इस्लामी कानून) के विरुद्ध कार्य कर सकता था। आधुनिक मंत्रिमंडल जैसी कोई वस्तु नहीं थी। मंत्री परामर्श देने के अधिकार का दावा नहीं कर सकते थे। उनके परामर्श को स्वीकार करना अथवा नहीं करना बिलकुल बादशाह की खुशी पर था।

वास्तव में बहुत-कुछ बादशाह तथा उसके मत्रियों के व्यक्तिगत व्यक्तित्व पर निर्भर था। शाहजहाँ जैसा विवेकी शासक सदैव एक सादुल्ला खाँ से सलाह लेना चाहता था, जबकि हुसैन अली खाँ जैसे मंत्री को अपने द्वारा गद्दी पर बैठाये गये कठपुतलों की कोई परवाह न थी, बल्कि उनके प्रति खुल्लमखुल्ला घृणा तक थी।

फिर भी भारत के पहले छः मुगल बादशाहों की प्रबल सामान्य-बुद्धि थी। अत: उनका एकतंत्री शासन भ्रष्ट होकर ऐसे असहनीय निरंकुश शासन में परिवर्तित नहीं हो गया, जो लोगों के अधिकारों तथा रीतियों को पैरों तले कुचलता चले। परोपकारी स्वेच्छाचारियों की प्रवृत्ति से सम्पन्न रहने के कारण ये बादशाह, एक या दूसरे तरीके से, अपनी प्रजा की भलाई के लिए कठिन परिश्रम करते थे-विशेष रूप से केन्द्रीय राजधानी के चारों ओर के क्षेत्रों तथा प्रान्तों में राजप्रतिनिधियों की सरकारों के स्थान पर।

परन्तु उन दिनों राज्य कोई समाजवादी कार्य नहीं करता था और न तब तक ग्रामवासियों के जीवन में हस्तक्षेप ही करता था जब तक उस इलाके में कोई हिसात्मक अपराध अथवा राजा की प्रभुता का विरोध न हो। एक दृष्टिकोण से मुगल बादशाहों की विशाल शक्ति अत्यन्त सीमित थी।

उनके आदेश साम्राज्य के सुदूरवर्ती कोनों में सदैव आसानी से लागू नहीं किये जा सकते थे-छोटा नागपुर तथा संथाल परगने के कुछ पहाड़ी इलाकों का तो कुछ कहना ही नहीं था, जिन्होंने संभवत: उनके आधिपत्य को कभी माना ही नहीं। जब हम लगभग प्रत्येक बादशाह को अपने राज्यकाल के प्रथम वर्ष में एक ही प्रकार के करों और चुगियों के उठाने की आज्ञा देते हुए पाते हैं, तब हमें यह विश्वास करना पड़ता है कि इनके उठाने के पिछले प्रयत्न निष्फल और अकार्यकारी हुए।

भारत के अंग्रेजी कारखानों (फैक्ट्रियों) के कागजात में यह दिखलाने के लिए प्रचुर संकेत हैं कि शाहजहाँ तथा औरंगजेब के जमाने तक में (उनके दुर्बल उत्तराधिकारियों के राज्यकालों का तो कुछ कहना ही नहीं) सूबेदार, प्रान्तीय दीवान एवं चुंगी-अफसर कभी-कभी केन्द्रीय सरकार की आज्ञा के विरुद्ध काम किया करते थे और अधिकतर स्वार्थपूर्ण उद्देश्यों से ही ऐसा होता था।

सरदार वर्ग- कई कारणों से सरदार-वर्ग विभिन्न तत्वों की मिश्रित संस्था थी- जैसे तुर्क, तार्तार, पारसी तथा भारतीय मुसलमान और हिन्दू। अत: यह एक शक्तिशाली सरदार-वर्ग के रूप में अपना संगठन नहीं कर सका। कुछ यूरोपियनों को भी सरदारों की उपाधियाँ मिलीं। सिद्धान्त रूप में सरदार- वर्ग पुश्तैनी न होकर बिलकुल अधिकारी वर्ग था।

सरदार को जागीर केवल जीवन भर के लिए मिलती थी तथा उसकी मृत्यु के पश्चात् बादशाह की हो जाती थी तथा उपाधियाँ और वेतन सामान्यतः पिता से पुत्र को नहीं दिये जा सकते थे। उत्तराधिकारी के अभाव में जायदाद की बादशाह द्वारा जब्ती की प्रथा का परिणाम अत्यन्त हानिकारक हुआ। सरदार अतिव्ययी जीवन व्यतीत करने लगे।

वे अपनी जीवन-काल में ही अपनी सारी संपत्ति अनुत्पादक विलास में नष्ट कर देते थे। इससे भारत को एक स्वतंत्र पैतृक कुलीनवर्ग के रूप में जनता की स्वतंत्रता का एक प्रबल रक्षक तथा राजा की निरंकुशता पर एक प्रबल प्रतिबन्ध नहीं मिल सका। इस स्वतंत्र पैतृक कुलीन वर्ग की स्थिति तथा सम्पत्ति प्रत्येक पीढ़ी में राजा की कृपा पर निर्भर नहीं रहती थी और इस कारण वह राजा के सनकीपन की आलोचना तथा राजा की निरंकुशता का विरोध करने का साहस कर सकता था।

नौकरशाही- साम्राज्य की सैनिक शक्ति बनाये रखने के लिए मुगलों को बड़ी संख्या में विदेशी साहसिकों को नियुक्त करना आवश्यक हो गया। यद्यपि अकबर ने भारत भारतीयों के लिए की नीति आरम्भ की तथा हिन्दुओं के लिए सरकारी पद खोल दिया, फिर भी मुगल लोक-सेवा (सरकारी नौकरियों) में विदेशी तत्वों की प्रधानता रही।

लोक-सेवाओं का सामान्य स्वरूप जहाँगीर तथा शाहजहाँ के राज्यकालों में अपरिवर्तित रहा। परन्तु उनकी कार्यक्षमता में जहाँगीर के राज्यकाल से ही हास आरम्भ हो गया, उसके पुत्र के राज्यकाल में यह हास ध्यान आकृष्ट करने लायक हो गया, औरंगजेब के राज्यकाल में उससे भी अधिक ध्यान आकृष्ट करने लायक हो गया।

राज्य के प्रत्येक अफसर को एक मनसब मिला हुआ था। यह श्रेणी एवं लाभ से युक्त सरकारी नियुक्ति होती थी। अतएव सिद्धान्त रूप में प्रत्येक मनसब-प्राप्त अफसर को राज्य की सैनिक सेवा के लिए कुछ सिपाही भेजना आवश्यक था। इस प्रकार मनसबदार देश के अधिकतर सरदार थे तथा यह प्रबन्ध सेना, कुलीन वर्ग और असैनिक शासन सब-कुछ मिलकर एक था। अकबर ने पदाधिकारियों को तेंतीस वगों में बाँटा, जिनमें दस के सेनापति से लेकर दस हजार के सेनापति तक थे।

अकबर के राज्यकाल के मध्य तक एक साधारण अफसर जो ऊँचे-से-ऊँचा पद पा सकता था वह पाँच हजार के सेनापति का पद था। सात हजार से दस हजार तक के सेनापतियों के उच्चतर पद राजपरिवार के सदस्यों के लिए सुरक्षित थे परन्तु उसके राज्य-काल के अन्त में यह बन्धन ढीला कर दिया गया तथा उसे उत्तराधिकारियों के अधीन अफसर काफी उच्चतर पदों तक पहुँच गये। मनसबदारों को बादशाह सीधे नियुक्त करते, प्रोन्नति देते, मुअत्तल करते अथवा पदच्युत करते थे।

प्रत्येक वर्ग के लिए वेतन की एक निश्चित दर थी। इस वर्ग के अधिकारी से इसी रकम में से घोड़ों, हाथियों, बोझ ढोने वाले पशुओं तथा गाड़ियों के रखने का खर्च निकालने की आशा की जाती थी। परन्तु मनसबदार इस शर्त को शायद ही कभी पूरा करते थे। (सेना का) संग्रह करने तथा (घोड़ों के) दागने (के नियमों) के बावजूद हम असंदिग्ध रूप से यह मान सकते हैं कि बहुत कम मनसबदार घुड़सवारों का भी पूरा भाग रखते थे, जिसके लिए वेतन पाते थे।

मनसबदारी का पद पैतृक नहीं था। राज्य की किसी खास सेवा के बराबर अधिकारी उसी सेवा में रहकर विशेषज्ञता प्राप्त करें ऐसी बात नहीं थी और किसी भी क्षण किसी अफसर को बिलकुल नया कार्य दिया जा सकता था। अकबर की उचित व्यक्ति के उचित पद के लिए चुनने की अद्भुत योग्यता ने इस प्रणाली के दोषों को रोक रखा, किन्तु आगे चलकर शासकों के व्यक्तित्व के बदलने के साथ ह्रास प्रारम्भ हो गया।

मुगल सरकार के अफसर अपना वेतन दो प्रकार से पाते थे या तो वे राज्य से नकद रूप में पाते थे अथवा कभी-कभी उन्हें कुछ समय के लिए जागीरें दे दी जाती थीं। परन्तु उन्हें अपनी जागीरों में भूमि पर किसी प्रकार का अधिकार नहीं दिया जाता था। वे केवल निर्दिष्ट इलाकों से अपने वेतन के बराबर भूमि-राजस्व वसूल कर उसका उपभोग कर सकते थे।

कुछ भी अधिक वसूलना न केवल कृषकों के प्रति अन्यायपूर्ण था, बल्कि यह राज्य के विरुद्ध फरेब भी था। प्राय: जागीरें एक मनसबदार से लेकर दूसरे को दे दी जाती थीं। फिर भी जागीर-प्रथा से जागीरदारों को कुछ अनुचित शक्ति तथा स्वतंत्रता मिल गयी।

अतएव अकबर ने उचित ही, शेरशाह की तरह, यथासंभव अपने अफसरों को नगद वेतन देने तथा जागीर की भूमि को खालसा भूमि में परिवर्तित करने का प्रयत्न किया। चाहे मुगल लोक-सेवकों का वेतन नकद दिया जाता हो अथवा जागीरों के रूप में किन्तु जैसा कि हमें आईने-अकबरी से मालूम होता है, उनके वेतन अत्यन्त अधिक थे।

इससे पश्चिमी एवं मध्य एशिया के बहुत-से साहसिक अफसर आकृष्ट होकर आये थे। औरंगजेब के राज्यकाल के पहले नहीं तो बाद में मुगल लोक-सेवा में बहुत बुराइयाँ प्रवेश कर गई।

शासन के प्रमुख अधिकारी- यद्यपि मुगल बादशाहों को पूर्ण अधिकार थे, किन्तु सरकार के विभिन्न विभागों में विविध सरकारी मामलों के प्रबन्ध के लिए वे बहुत-से अफसर नियुक्त कर देते थे। राज्य के प्रमुख विभाग थे-

  1. खान-ए-सामान के अधीन शाही परिवार,
  2. दीवान के अधीन कोष,
  3. मीर बख्शी के अधीन सैनिक वेतन तथा लेखा-जोखा कार्यालय,
  4. प्रधान काजी के अधीन न्याय विभाग,
  5. प्रमुख सदर अथवा सदरेसदूर के अधीन धार्मिक धन समर्पण तथा दान तथा
  6. मोहतासिब के अधीन प्रजा के चरित्र एवं व्यवहार की देख-भाल।

दीवान-ए-आला अथवा वजीर प्रायः राज्य का सर्वोच्च अफसर हुआ करता था क्योंकि वह राजस्व एवं वित्त का प्रधान अधिकारी रहता था। बख्शी कई प्रकार के कार्य करता था। राज्य के उन सभी अफसरों का, जो सिद्धान्त रूप में सैनिक विभाग के थे, वेतनदाता अफसर होने के अतिरिक्त वह सेना में भर्ती भी किया करता तथा मनसबदारों एवं अन्य उच्चाधिकारियों की सूचियाँ रखता था।

युद्ध की तैयारी करते समय वह बादशाह के समक्ष सेना की सम्पूर्ण नामावली उपस्थित करता था। खाने-सामान बड़ी तथा छोटी दोनों वस्तुओं के सम्बन्ध में सम्पूर्ण राजकीय परिवार का अधिकार था। मोहतासिब पैगम्बर की आज्ञाओं तथा सदाचार के नियमों के पालन की देखभाल करते थे।

1. वकील या वजीर- वजारत की संस्था जिसे वकालत के नाम से भी जाना जाता था खलीफाओं के समय से ही प्रचलित थी। भारत में वजीर शब्द के बदले वकील शब्द प्रचलित हो गया। वकील संपूर्ण प्रशासन का पर्यवेक्षण करता था और बादशाह वकील के माध्यम से ही अन्य अधिकारियों से संपर्क स्थापित करता था।

बाबर का वजीर निजामुद्दीन अहमद और हुमायूँ का वजीर हिन्दू बेग था। अकबर के समय बैरम खाँ ने उस पद को और भी शक्तिशाली बना दिया। बैरम खाँ के विद्रोह के बाद इस पद का महत्त्व घटने लगा और यह पद औपचारिक रूप से तो बना रहा परंतु व्यवहारिक रूप में शक्तियों से वचित हो गया। उस पद पर कुछ बुजुर्ग उमरा को नियुक्त किया जाता था। कभी-कभी यह पद वर्षों तक खाली रहता था, उदाहरण के लिए मुनीम खाँ के बाद यह पद वर्षों तक खाली रहा।

2. दीवान-ए-आला या दीवान-ए-कुल- आगे चलकर वजीर या वकील की वित्तीय शक्तियाँ दीवान को दे दी गई। इसे राजस्व एवं वित्त का अधिभार दे दिया गया। यह भू-राजस्व का आकलन एवं उसकी वसूली का निरीक्षण करता था। वह उससे संबंधित हिसाब की जाँच भी करता था। उसके कायों के सहायता करने के लिए उसके अंतर्गत बहुत से अधिकारी थे उदाहरण के लिए-

  • दीवान-ए-खालसा – खालसा भूमि का निरीक्षण
  • दीवान-ए-तन – नगद वेतन से संबंधित
  • दीवान-ए-जागीर – जागीर भूमि का निरीक्षण
  • दीवान-ए-वयुतत – राजकीय कारखानों का निरीक्षण
  • शाहीद-ए-तौजिन – सैनिक लेख का प्रभारी
  • मुशरिफ-ए-खजाना – खजांची

दीवान के पद के महत्त्व को कम करने के लिए एक से अधिक दीवानों की भी नियुक्ति की जाती थी। कभी-कभी तो दीवानों की संख्या 10 तक पहुँच जाती थी।

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