मध्यकालीन भारत का इतिहास नोट्स

नसिरुद्दीन महमूद: 1246-66 ई. Nasiruddin Mahmud: 1246-66 AD.

नसिरुद्दीन मधुर एवं धार्मिक स्वभाव का व्यक्ति था। शासक के रूप में नसिरुद्दीन में तत्कालीन पेचीदी परिस्थिति का सामना करने लायक आवश्यक गुणों का काफी अभाव था। बलबन उस समय नवाब-ए-मामलिकात के पद पर था।

उसका मंत्री ग्यासुद्दीन बलबन ही, जो बाद में उसका प्रतिनिधि बना, सिंहासन के पीछे वास्तविक बल था। बलबन ने अपने को इस विश्वास का पात्र सिद्ध कर दिखाया। उसने राज्य को आन्तरिक विद्रोहों एवं बाहरी आक्रमणों के संकटों से बचाने का भरसक प्रयत्न किया। आक्रमणकारी मंगोलों को उसने पीछे हटा दिया तथा विद्रोही राजाओं एवं जमींदारों को परास्त करने के लिए अन्य भागों पर कई बार चढ़ाइयाँ कीं।

1253 ई. में बलबन के कुछ विरोधी सरदारों के एक दल ने सुल्तान को उसे (बलबन को) निर्वासित करने के लिए उभाड़ा। किन्तु उसके शत्रु राजकाज का उचित प्रबन्ध नहीं कर सके। विरोधियों का प्रायोजक चिकलू खां था। इस षड्यंत्र के तहत बलबन को हांसी का गवर्नर बनाकर भेज दिया गया था। बलबन की जगह इमादुद्दीन रेहान को नियुक्त किया गया था।

अत: 1255 ई. में उसे वापस बुलाकर राज्य का सर्वोच्च अधिकार पुनः सौंप दिया गया। नसिरुद्दीन 1266 ई. की 12 फरवरी को चल बसा। उसके बाद उसका कोई भी पुरुष उत्तराधिकारी नहीं बचा। इस प्रकार इल्तुतमिश के वंश का अन्त हो गया।

तब बलबन, जिसकी योग्यता सिद्ध हो चुकी थी तथा जो स्वर्गीय सुल्तान द्वारा उसका उत्तराधिकारी मनोनीत किया गया, कहा जाता है कि सरदारों एवं पदाधिकारियों की मौन स्वीकृति से सिंहासन पर बैठा।

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