मध्यकालीन भारत का इतिहास नोट्स

बंगाल के पाल: 800-1200 ई. Pal of Bengal: 800-1200 AD.

आठवीं शती के मध्य में उत्तरी भारत में अन्य महत्त्वपूर्ण जिस साम्राज्य की स्थापना हुई उसका संस्थापन बंगाल के पालों द्वारा हुआ था।

इस वंश का इतिहास हमें निम्नलिखित साहित्य और उनके अभिलेखों से ज्ञात होता है। प्रमुख अभिलेख निम्नलिखित हैं:

1. धर्मपाल का खालिमपुर अभिलेख

2. देवपाल का मुंगेर अभिलेख

3. नारायणपाल का बादल स्तंभ लेख

4. महिपाल प्रथम का वाणगढ़ तथा मुजफ्फरपुर से प्राप्त अभिलेख इसके अतिरिक्त संध्याकर नदी के रामपालचरित से पाल वंश के इतिहास पर प्रकाश पड़ता है।

पहले बंगाल का प्रान्त मगध राज्य में सम्मिलित था। नन्दों के समय में भी बंगाल मगध साम्राज्य के अन्तर्गत था। मगध के राजसिंहासन पर बैठनेवाला सम्राट् बंगाल का भी स्वामी होता था। छठी शताब्दी के उत्तराद्ध में गौड़ अथवा बंगाल स्वतन्त्र हो गया और गुप्त-साम्राज्य से पृथक् हो गया। शशांक के समय में, जो हर्ष का समकालीन था, बंगाल की शक्ति काफी बढ़ गई।

यद्यपि सम्राट् हर्ष और आसाम के भास्करवर्मन ने गौड़ाधिपति की शक्ति को रोकने का बहुत प्रयास किया और उसको युद्ध में पराजित करने की भी चेष्टा की तथापि उसके जीवन-काल में न तो वे उसकी शक्ति ही कम कर सके और न उसको कुछ क्षति ही पहुंचा सके। परन्तु शशांक की मृत्यु के बाद, बंगाल की राजनैतिक एकता और सार्वभौमिकता विनष्ट हो गई।

अब सम्राट् हर्षवर्द्धन और कामरूपाधिपति भास्करवर्मन दोनों को अवसर प्राप्त हो गया और उन्होंने बंगाल पर आक्रमण करके इसकी सम्भवत: दो भागों में विभक्त कर दिया, जिनको उन्होंने आपस में बांट लिया।

आठवीं शताब्दी के प्रारम्भ में शैल वंश के एक राजा ने पोण्ड या उत्तरी बंगाल पर अधिकार कर लिया। कश्मीर-नरेश ललितादित्य मुक्तापीड और कन्नौज-नरेश यशोवर्मन ने भी बंगाल पर आक्रमण किया था।

मगध के अनुवर्ती गुप्त नरेश का बंगाल पर अधिकार था किन्तु यह अधिकार नाममात्र को ही था। किन्तु इस नरेश के हट जाने पर यह नाममात्र का अधिकार भी नहीं रह गया। कामरूप-नरेश हर्षदेव ने अवसर पाकर बंगाल को विजित कर लिया। एक दृढ़ शासन-शक्ति के अभाव में बंगाल अव्यवस्था और अराजकता का केन्द्र हो। गया।

आक्रमणों के इस तांते ने बंगाल में चारों ओर अशान्ति एवं गड़बड़ी फैला दी जिससे ऊबकर सारे सरदारों और जनता ने मिलकर गोपाल नामक व्यक्ति को अपना राजा चुन लिया। गोपाल को सम्पूर्ण बंगाल का शासक स्वीकार कर लिया गया।

गोपाल- 

आठवीं शताब्दी के प्रथमाद्ध में गोपाल ने बंगाल का शासन संभाला। गोपाल ने बंगाल में हिमालय से लेकर समुद्र-तट तक सम्पूर्ण राज्य को सुसंगठित किया और विगत डेढ़ शताब्दियों की अराजकता और अव्यवस्था का अन्त करके समस्त बंगाल में शान्ति स्थापित की। उसने नालन्दा के निकट ओदन्तपुरी नामक स्थान पर एक विश्वविद्यालय की स्थापना कराई।

गोपाल ने अपनी मृत्यु (770 ई.) के समय अपने उत्तराधिकारी के लिए एक समृद्ध और सुशासित राज्य छोड़ा। उसके उत्तराधिकारियों ने बंगाल को राजनैतिक उत्कर्ष और सांस्कृतिक गौरव की उस पराकाष्ठा पर पहुँचाया जिसकी उसने पहले कभी स्वप्न में भी कल्पना न की होगी।

धर्मपाल के खालिमपुर अभिलेख में कहा गया है कि मत्स्य न्याय से छुटकारा पाने के लिए प्रकृतियों (सामान्य जनता) ने गोपाल को लक्ष्मी की बाँह ग्रहण करवायी। गोपाल के बाद धर्मपाल बंगाल का राजा हुआ।

धर्मपाल-

 धर्मपाल पाल वंश की वास्तविक महत्ता का संस्थापक था। धर्मपाल एक सुयोग्य और कर्मनिष्ठ शासक था जिसने अपने राज्य की सीमा सोन नदी के पश्चिम तक बढ़ा दी। धर्मपाल धार्मिक मनोवृत्ति का था और अपने पिता की भांति बौद्ध था, फिर भी राजनैतिक दृष्टि से वह भी महत्वाकांक्षी था।

तिब्बती इतिहासकार तारानाथ ने लिखा है कि धर्मपाल के राज्य का विस्तार पूर्व में बंगाल की खाड़ी से लेकर पश्चिम में जालंधर और उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में विन्ध्य पर्वत तक था। सम्भव है कि तारानाथ का यह कथन अत्युक्तिपूर्ण हो परन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं कि समस्त उत्तरी भारत में धर्मपाल की शक्ति का प्रभाव जमा हुआ था।

11वीं सदी के गुजराती कवि सोड्डल ने धर्मपाल को उत्तरापथस्वामी कहा है। उसने महाराजाधिराजपरमेश्वर और परम भट्टारक की उपाधियाँ धारण की। वह एक उत्साही बौद्ध था और उसे परमसौगत कहागया है।

धर्मपाल ने लगभग 46 वर्षों तक राज्य किया। उसने विक्रमशिला और सोमपुर में बौद्ध विहारों का निर्माण कराया। विक्रमशिला में एक विश्वविद्यालय की स्थापना भी उसने कराई थी। विक्रमशिला में भी नालन्दा की भांति विद्या का एक बहुत बडा केन्द्र स्थापित हो गया था।

धर्मपाल ने अपने राज्य में अन्य कई मन्दिरों और बौद्ध विहारों का निर्माण भी कराया था। उसकी राज्यसभा में प्रसिद्ध बौद्ध लेखक हरिभद्र रहता था। उसके समय प्रसिद्ध यात्री सुलेमान आया था। उसके समय में धीमन और विटपाल ने एक नए कला संप्रदाय का प्रवर्त्तन किया। धर्मपाल का 810 ई. में शरीरान्त हो गया।

देवपाल- 

पाल वंश का देवपाल तृतीय राजा था। अपने वंश का यह एक शक्तिशाली राजा था। उसने अड्तालीस वर्षों तक राज्य किया और कदाचित् मुद्गगिरि (मुंगेर) को अपनी राजधानी बनाया। उसके सेनापति लवसेन ने आसाम और उड़ीसा पर विजय प्राप्त की।

देवपाल ने अपने पिता की प्रसार-नीति को जारी रखा। अपने अभिलेखों में वह एक साम्राज्यवादी के रूप में मुखरित हुआ है। यह सम्भव है कि देवपाल ने राष्ट्रकूट-नरेश गोविन्द-तृतीय की मृत्यु से लाभ उठाया।

गोविन्द-तृतीय के देहावसान से राष्ट्रकूट राज्य में गड़बड़ फैल गई जिससे देवपाल को अपनी शक्ति बढ़ाने का अवसर मिल गया। उसके अभिलेखों में उसकी सुदूरव्यापिनी विजयों का उल्लेख किया गया है। एक अभिलेख में कहा गया है कि वह हिमालय और विन्ध्याचल के मध्यवर्ती सम्पूर्ण प्रदेश का स्वामी था और दक्षिण में उसने सेतुबन्ध रामेश्वरम् तक विजय प्राप्त की।

परन्तु स्पष्ट है कि अभिलेख का यह कथन केवल प्रशस्तिवादन है और ऐतिहासिक तथ्य से नितान्त दूर है। एक अन्य स्तम्भ-लेख में यह उल्लेख मिलता है कि अपने मन्त्रियों दर्भपाणि तथा केदार मिश्र की नीतियुक्त मंत्रणा से प्रेरित होकर देवपाल ने उत्कल जाति को मिटा दिया, हूण का दर्प चूर कर दिया और द्रविड़ तथा गुर्जर के राजाओं का गर्व धूलधुसरित कर दिया।

डॉ. रमाशंकर त्रिपाठी का मत है कि- बादल स्तम्भ-लेख का यह कथन सम्भवतः सही है। देवपाल के पिता धर्मपाल ने केवल थोडे ही दिनों तक सम्राट् के रूप में शासन किया, किन्तु देवपाल ने कुछ अधिक काल तक अपनी सम्राटोचित सत्ता प्रमाणित की।

उड़ीसा और आसाम पर उसका अधिकार हो जाने से उसका राज्य काफी विस्तृत हो गया। समकालीन नरेशों के बीच देवपाल की प्रतिष्ठा काफी जम गई, किन्तु प्रतिहार-नरेश मिहिरभोज के राज्यारोहण से गुर्जरों की साम्राज्यवादिता का उदय हुआ जो महेन्द्रपाल की मृत्यु तक बनी रही।

इस प्रबल साम्राज्यवादिता के सामने बंगाल के पालों की कुछ न चल सकी और उनको अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षायें त्यागनी पड़ीं। कुछ विद्वानों का मत है कि बादल स्तम्भ-लेख में गुर्जर के राजा का गर्व चूर्ण करने का जो उल्लेख प्राप्त है, वह सम्भवत: गुर्जर नरेश मिहिरभोज के लिए है।

यदि यह मत ठीक हो तो यह मानना पड़ेगा कि देवपाल के समय में पालों की शक्ति का ह्रास नहीं हुआ था किन्तु उसके उत्तराधिकारियों के शासन-काल में उसके वंश की राजनैतिक शक्ति निस्सन्देह घटने लगी थी।

देवपाल का सुमात्रा और जावा के नरेश के साथ दौत्य सम्बन्ध (Diplomatic Relation) था। देवपाल के समय में बंगाल निश्चय ही एक शक्तिशाली राज्य था।

अपने पिता की भाँति देवपाल भी एक उत्साही बौद्ध था। उसे भी परमसौगत कहा गया है। नालन्दा ताम्रपत्रों से विदित होता है कि शैलेन्द्र वंश के शासक बापुत्रदेव के अनुरोध पर देवपाल ने राजगृह-विषय में चार और गया-विषय में एक गांव धर्मार्थ दान दिये थे।

उसने सुमात्रा के नरेश बलपुत्रदेव को नालन्दा के समीप एक बौद्ध विहार बनवाने की अनुमति प्रदान कर दी थी और स्वयं भी इस कार्य के लिए प्रचुर धन दान किया था। देवपाल के लम्बे शासन-काल से बंगाल में एक विशिष्ट संस्कृति के विकास को संरक्षण मिला।

देवपाल ने मगध की बौद्ध प्रतिमाओं का पुनर्निर्माण कराया और उसके राज-आश्रय ने वास्तु तथा अन्य कलाओं को पनपने का अवसर प्रदान किया। बोधिगया अथवा महाबोधि के मन्दिर के निर्माण में भी देवपाल का योग था।

वह विद्या का उदार संरक्षक था और उसकी राजसभा बौद्ध विद्वानों के लिए एक आश्रय-स्थल के रूप में हो गई। बौद्ध कवि दत्त उसकी राजसभा में रहता था और उसने लोकेश्वर शतक नामक सुप्रसिद्ध काव्य की रचना की थी, जिसमें लोकेश्वर का विस्तारपूर्वक  वर्णन हुआ है और लोकेश्वर अथवा अवलोकेश्वर के प्रेम और क्षमा आदि गुणों की स्तुति है।

उसने नगरहार के प्रसिद्ध विद्वान् वीरदेव को सम्मान दिया और उसे नालंदा विहार का अध्यक्ष बनवाया। देवपाल की राजसभा में मलाया के, शैलेन्द्र वंशीय शासक बालपुत्र देव ने अपना एक दूत भेजा था।

देवपाल के समय वास्तुकला की अच्छी उन्नति हुई। डॉ. मजूमदार के शब्दों में धर्मपाल और देवपाल का शासन-काल बंगाल के इतिहास में एक उत्कृष्ट अध्याय था।

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