प्राचीन भारत का इतिहास नोट्स

मौर्योत्तर काल में राजनीतिक व्यवस्था

शुंग-सातवाहन-शक युगीन सभ्यता के मुख्य पहलू

मौर्योत्तर युग में भारत के राजनैतिक परिदृश्य पर तीन राजवंशों का प्रभुत्व दिखलाई पड़ता है। ये राजवंश है शुंग, सातवाहन तथा शक राजवंश। यह युग राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक तथा साहित्य, कला और संस्कृति की दृष्टि से अपने पूर्ववर्ती युग से कई अर्थों में भिन्न है। राजनैतिक दृष्टि से उस काल-खण्ड में तीन प्रसिद्ध और शक्तिशाली राजवंशों का उत्कर्ष हुआ।

शुंग सातवाहन तथा शक राजवंश थे। इन तीनों राजवंशों ने शक्तिशाली किन्तु लोक कल्याणकारी शासन-व्यवस्था की स्थापना की। शुंग राजवंश का संस्थापक पुष्यमित्र शुंग था। उसने मगध साम्राज्य के विघटन पर एक शक्तिशाली राज्य की स्थापना की।

उसके शासन-काल में विदेशी आक्रमणकारियों का प्रतिरोध हुआ तथा वैदिक धर्म का पुनरुत्थान हुआ। शुगों ने उत्तर भारत के एक विशाल भू-भाग पर अपना आधिपत्य स्थापित किया। सातवाहन वंश का उद्भव और उत्थान दक्षिण भारत में हुआ। सिमुक इस राजवंश का संस्थापक था। शातकर्णी, गौतमीपुत्र शातकर्णी और यज्ञ श्री शातकर्णी इस राजवंश के सुविख्यात शासक थे। कुषाण साम्राज्य का सबसे प्रतापी सम्राट् कनिष्क था। उसने एक सुव्यवस्थित शासन की स्थापना की।

राजनैतिक व्यवस्था

मौर्योत्तर युग की राजनैतिक व्यवस्था मौर्य काल की राजनैतिक व्यवस्था का प्रति रूप था। मगध के सम्राटों के शासन की संरचना इस समय भी एकतंत्रात्मक थी। किन्तु इस काल-खण्ड में साम्राज्य अनेक राजनैतिक इकाइयों, जनपदों, प्रदेशों या क्षेत्रों में विभाजित था। उन्होंने मगध सम्राट् के आधिपत्य को स्वीकार कर लिया था।

मगध सम्राट् जनपदों के धर्म, आचार-व्यवहार, सामाजिक व्यवस्था इत्यादि में कोई हस्तक्षेप नहीं करता था। इन जनपदों से मगध-सम्राट् कर या बलि वसूल किया करते थे। प्रत्येक जनपद का एक केन्द्रीय नगर होता था जिसे पुर कहा जाता था। इसके अभिजन (श्रेष्ठ नागरिक) जनपद सभा में एकत्रित हुआ करते थे। अधिकांश जनपदों में यह सभाएँ किसी न किसी रूप में विद्यमान थीं।

रूद्रदामा के शिलालख में पौर जानपदों का उल्लेख इस तथ्य का एक प्रबल साक्ष्य है। इसी प्रकार कलिंग सम्राट् खारवेल ने भी पौर जानपदों का उल्लेख हाथी गुम्फा अभिलेख में किया था। जहाँ तक सम्राट् का प्रश्न है सम्राट् राजनैतिक व्यवस्था का सर्वोच्च अधिकारी होता था। समस्त राजनैतिक व्यवस्था का वह सूत्राधार होता था किन्तु राजा स्वेच्छाचारी नहीं होता था।

वह सुस्थापित परम्पराओं द्वारा निर्देशित तथा नियंत्रित होता था। इन परम्पराओं का संकलित स्वरूप मनुस्मृति में उपलब्ध था। मनुस्मृति में राजा को देवताओं यथा इन्द्र, वायु, यम्, सूर्य, अग्नि, वस्त्र, चन्द्रमा, कुबेर आदि के अंशों का प्रतीक माना गया है। जिस प्रकार राजा ईश्वरीय है, उसी प्रकार दंड भी ईश्वरीय है।

जो परम्परागत धर्म और व्यवहार चले आते हैं वही दण्ड है, वही वस्तुत: दैवी है। दण्ड जिस प्रकार प्रजा को दण्डित करता है उसी प्रकार राजा भी दण्ड के अधीन है। जो राजा परम्परागत धर्म और व्यवहार के अनुसार चलता वह उन्नति करता है, जो राजा कामी, विषयी और अनाचारी होता है वह दण्ड द्वारा समस्त कर देता है। शासन-कार्य में राजा को सहायता देने के लिए मंत्रि परिषद् माल विकाग्नि मित्रम् के अनुसार राजा (शुंगवंशी अग्निमित्र के संदर्भ में) युद्ध और सन्धि के प्रत्येक विषय पर अमात्य परिषद् से परामर्श लेता था।

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