मध्यकालीन भारत का इतिहास नोट्स

कुतुबुद्दीन मुबारक: 1316-1320 ई. Qutubuddin Mubarak Mubarak Shah

मुबारक शाह दिल्ली का प्रथम शासक था जिसने अपने को खलीफा घोषित किया और उसने अलबसिक बिल्लाह की उपाधि ली। इस नये शासक के प्रारम्भिक वर्ष सफल रहे तथा उसने अपने पिता के कठोरतर आदेशों को रद्द कर दिया।

राजनैतिक बन्दी मुक्त कर दिए गये। स्वर्गीय सुल्तान द्वारा जब्त की गयी कुछ भूमि तथा जागीरें पुन: उनके मूल अधिकारियों को लौटा दी गयीं। अनिवार्य चुंगी उठा दी गयी। इससे निस्सन्देह लोगों को सन्तोष हुआ, पर जैसा कि बरनी लिखता है, राजकीय प्रभुता के प्रति भय तथा आतंक लुप्त हो गये।

इनके अतिरिक्त, सुल्तान शीघ्र विषय-सुख में लिप्त हो गया। फलस्वरूप वह आलसी बन गया और राज्य के हितों की बड़ी हानि होने लगी। उसके उदाहरण का लोगों पर भी प्रभाव पड़ा। बरनी लिखता है कि- (अपने) चार वर्षों तथा चार महीनों (के शासन काल) में सुल्तान ने मद्यपान, संगीत श्रवण, विषय-सुख तथा उपहार-वितरण के अतिरिक्त कुछ भी नहीं किया।

वह गुजरात के एक नीच जाति के (परवारी) हाल में बने मुसलमान के प्रभाव में पूर्ण रूप से आ गया। उसे उसने खुसरो खाँ की उपाधि दी तथा अपने राज्य का प्रधानमंत्री बना दिया। वह प्रियपात्र, सिंहासन पर अधिकार जमा लेने के गुप्त अभिप्राय से, निर्लज्जतापूर्वक अपने स्वामी की नीच रुचियों में सहायता करने लगा।

हिन्दुस्तान के सौभाग्यवश इस राजत्वकाल में मंगोलों ने इस पर आक्रमण करने की चेष्टा नहीं की और न किसी तरफ कोई भारी उपद्रव ही हुआ। केवल दो विद्रोह हुए-एक गुजरात में तथा दूसरा देवगिरि में (जो दक्कन में है)।

गुजरात के विद्रोह को ऐलुल्मुल्क ने अच्छी तरह दबा दिया तथा सुल्तान का ससुर जिसने उससे जफर खाँ की उपाधि पायी थी, वहाँ का शासक बना दिया गया। सुल्तान स्वयं एक विशाल सेना लेकर देवगिरि के विरुद्ध चल पड़ा। सुल्तान के पहुँचने पर देवगिरि का हरपाल देव भाग गया।

परन्तु उसका पीछा कर उसे पकड़ लिया गया तथा जीवित-अवस्था में ही उसकी खाल उतार ली गयी। इस तरह यादवों का सम्पूर्ण राज्य मुसलमानों के अधीन आ गया। सुल्तान ने मलिक यक्लखी को देवगिरि का शासक नियुक्त किया। उसने खुसरो खाँ को तेलंगाना पर आक्रमण करने को भेजा। यह आक्रमण सफल रहा। देवगिरि में एक वर्ष तक ठहरने के बाद यहाँ उसने एक बड़ी मस्जिद बनवाई, सुल्तान दिल्ली लौट आया।

इन विजयों ने सुल्तान को मदान्ध कर दिया। राजपरिवार के बहुत से व्यक्ति मार डाले गये। मुबारक ने खिलाफत के प्रति भक्ति को हटाकर अपने को इस्लाम धर्म का सर्वोच्च प्रधानस्वर्ग तथा पृथ्वी के अधिपति का खलीफा घोषित किया। इस प्रकार उसने दिल्ली के पूर्ववर्ती सुल्तानों की आदत से भिन्न काम किया। उसने अल-वासिक बिल्लाह की धर्म-प्रधान उपाधि धारण की।

परन्तु उसका शासन का राज्य अधिक समय तक नहीं टिक सका। खुसरो ने उसे हटाने की योजना बनायी। परन्तु सुल्तान उससे इतना अधिक प्रभावित था कि उसने अपने मित्रों की चेतावनी नहीं सुनी। अत: वह शीघ्र ही खुसरों के षड्यंत्र का शिकार बन गया। खुसरो के एक पारिवारिक मित्र ने अप्रैल 1320 ई. की एक रात को छुरा भोंक कर उसे मार डाला। इस प्रकार लगभग तीस वर्षों तक शासन करने के बाद खल्जी-राजवंश का अन्त हो गया।

अब खुसरो नसिरूद्दीन खुसरो शाह की उपाधि धारण कर दिल्ली की गद्दी पर बैठा तथा अपने सम्बन्धियों और स्वजातियों में, जिनसे उसे अपनी लक्ष्यपूर्ति में सहायता मिली थी, सम्मान तथा पारितोषिक का वितरण किया।

उसने राज्य का धन उन सरदारों का मुँह बन्द करने में नष्ट किया, जो उसका सिंहासन अपहरण स्वीकार करने को बाध्य हुए थे। उसने मृत सुल्तान के मित्रों तथा निजी सेवकों का संहार कर और उसके परिवार वालों का अपमान कर वास्तविक रूप में आतंकपूर्ण राज्य का उद्घाटन किया।

बरनी यहिया बिन अहमद सरहिन्दी तथा इब्नबतूता का कहना है कि खुसरो हिन्दुओं का पक्ष लेता था तथा उसके चार महीनों और कुछ दिनों के लघु शासन काल में हिन्दुओं का उत्कर्ष हुआ। जो कुछ भी हुआ हो, खुसरो का आचरण ही अलाई सरदारों को क्रुद्ध करने के लिए पर्याप्त था।

उन्होंने शीघ्र ही सीमा प्रदेश के वफ़ादार संरक्षक गाजी मलिक को नेता चुन लिया। मुलतान के शासक ऐनुल्मुल्क के अतिरिक्त, जिससे उसे व्यक्तिगत ईर्ष्या थी, सभी सरदारों की सहायता पाकर गाजी मलिक दीपालपुर से रवाना हुआ तथा 5 सितम्बर, 1320 ई. को दिल्ली में खुसरो को पराजित किया।

खुसरो का सिर उतार लिया गया। उसके अनुचर मार डाले गये अथवा परास्त हुए। यद्यपि परिस्थिति गाजी मलिक के अनुकूल थी, तथापि वह गद्दी पर तुरन्त नहीं बैठा। इसके बदले उसने पहले शिष्ट रूप में अपनी अनिच्छा घोषित की, परन्तु चूंकि अलाउद्दीन का कोई भी पुरुष वंशज जीवित नहीं था, इसलिए सरदारों ने उसे ग्यासुद्दीन तुगलक की उपाधि देकर सितम्बर, 1320 ई. में राजसिंहासन पर बैठने को प्रेरित किया।

यहाँ पर यह महत्त्वपूर्ण है कि मुस्लिम सरदारों ने बिना किसी तरह की ईष्या प्रदर्शित किये ही गाजी मलिक को, जो श्रेणी में उनके बराबर रह चुका था, दिल्ली के राजसिंहासन पर इस समय आमत्रित किया।

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