मध्यकालीन भारत का इतिहास नोट्स

शाहजहां: 1627-1658 ई. Shah Jahan: 1627-1658 AD.

जहाँगीर की मृत्यु के बाद, कुछ समय तक राजसिंहासन पर उत्तराधिकार के लिए संघर्ष चलता रहा। शाहजहाँ दक्कन में ही था जब उसके पिता की मृत्यु अक्टूबर 1627 ई. में हो गयी। उसके दो भाई खुसरो तथा परवेजू पहले ही मर चुके थे। किंतु एक भाई शाहजादा शहयार अभी जीवित था, जिसकी उत्तर में स्थिति अनुकूल थी। अपनी सास नूरजहाँ द्वारा प्रेरित होकर शहरयार ने बिना समय खोये लाहौर में अपने को बादशाह घोषित कर दिया।

पर शाहजहाँ का पक्ष मुमताज महल के पिता आसफ़ खाँ ने योग्यतापूर्वक लिया। अत्यन्त सावधानी के साथ आसफ़ खाँ ने शाहजहाँ को उत्तर की ओर आने का सन्देश भेजा। साथ-साथ राजधानी के लोगों को सन्तुष्ट करने के लिए शाहजहाँ के आने तक उसने स्वर्गीय शाहज़ादा खुसरो के पुत्र शाहज़ादा दावर बख्श को अस्थायी बादशाह के रूप में गद्दी पर बैठा दिया।

मीर बख्शी इरादत खाँ को अपने पक्ष में करके आसफ़ खाँ सेना लेकर लाहौर चला। उसने शहरयार की फौज को परास्त कर उसे बंदी बना लिया तथा उसे नेत्रहीन कर डाला। शाहजहाँ शीघ्रता से दक्कन से आगरे आया तथा फरवरी, 1628 ई. में राजधानी में अबुल मुजफ्फूर शिहाबुद्दीन मुहम्मद साहिबे- किरान द्वितीय, शाहजहाँ बादशाह गाजी की ऊँची उपाधि के साथ बादशाह घोषित हुआ।

इसके शीघ्र बाद शाहज़ादा दावर बख्श को राजसिंहासन से हटा कर बंदी गृह के हवाले कर दिया गया। परन्तु आगे चलकर उसे मुक्त कर दिया गया तथा वह फारस जा कर उसके शाह का वृत्तिभोगी बनकर रहने लगा। शाहजहाँ ने अपने सभी सम्भव प्रतिद्वन्द्वियों को दुनिया के बाहर कर दिया। वह अपने दो पुत्रों की हत्या होते तथा तीसरे को देश से निर्वासित किये जाते देखने के लिए जीवित रहा। स्वयं उसके अन्तिम दिन कैदी के रूप में बीते।

फिर भी कुछ समय तक सब कुछ बादशाह के अनुकूल ही रहा। उसने अत्यन्त आशावादिता तथा सफलता से अपना शासनकाल आरम्भ किया। अपनी सेवाओं के बदले आसफ़ खाँ तथा महाबत खाँ की उन्नति हुई और वे उच्च पदों पर नियुक्त किये गये। पहले को साम्राज्य का वज़ीर बना दिया गया तथा दूसरे को अजमेर का सूबेदार।

बादशाह ने आसानी से दो विद्रोहों का दमन किया, जो क्रमश: उसके राज्यकाल के पहले तथा दूसरे वर्ष में हुए थे। पहला था एक बुन्देला नायक जुझार सिंह का, जो वीर सिंह बुन्देला का पुत्र था।

दूसरा था खाँ जहाँ लोदी नामक एक शक्तिशाली अफ़गान सरदार का, जो पहले दक्कन में राज प्रतिनिधि रह चुका था। बुन्देला नायक तुरंत हरा दिया गया तथा पहाड़ों में जा छिपा। परंतु वहाँ से वह बादशाह को 1634 ई. तक क्लेश देता रहा। अन्त में शाही दल ने उसे परास्त कर स्वदेश छोड़ने को विवश कर दिया। राह में गोंडों के साथ एक आकस्मिक भिडन्त में वह मार डाला गया।

बुन्देला विद्रोह से अधिक भयंकर था खाँ जहाँ लोदी का विद्रोह, जिसने अहमदनगर के अंतिम निज़ाम शाही सुल्तान निजामुलमुल्क के साथ संधि कर ली थी तथा जिसके कुछ मराठा और राजपूत समर्थक थे। उसकी चेष्टाओं के सफल होने से, जिनका अर्थ था अफ़गान नायकों की मुग़ल वंश के विरुद्ध परम्परागत शत्रुता को जारी रखना, साम्राज्य के दक्षिणवत्तीं प्रान्त निकल जाते।

पर शाहजहाँ ने परिस्थिति की गम्भीरता को पूरी तरह समझकर राजद्रोह को दमन करने के लिए एक कार्यक्षम सेना भेजी। अफ़गान नायक एक स्थान से दूसरे स्थान तक खदेड़ा गया। उसके संधिवद्ध मित्रों ने उसे छोड़ दिया।

उसके दोस्त और सगे-सम्बन्धी लड़ाई में काम आये। फिर भी वह शाही दल के विरुद्ध नैराश्य-जनित निभीकता के साथ तीन वर्षों तक लड़ता रहा। अन्त में चौथे वर्ष में वह कालिंजर के उत्तर तालसिहोण्डा नामक स्थान पर पराजित हुआ तथा अपने पुत्रों-अजीजू एवं ऐमल-के साथ टुकड़े-टुकड़े कर काट डाला गया।

पुर्तगीजों ने 1579 ई. में या उसके लगभग बंगाल में सातगाँव के ऊपर एक शाही फरमान के बल पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया था। हुगली के आसपास विशाल भवन बनवाकर उन्होंने अपनी स्थिति को धीरे-धीरे दृढ़ बना लिया। फलत: हुगली वाणिज्य के दृष्टिकोण से सातगाँव से अधिक महत्त्वपूर्ण बन गयी।

पर शांतिपूर्ण वाणिज्य सम्बन्धी व्यवसाय से संतुष्ट रहने के बदले उभोने कुछ अनुचित कार्यों द्वारा शाहजहाँ को क्रुद्ध कर दिया। वे भारतीय व्यापारियों से राज्य के राजस्व को क्षति पहुंचाकर अत्यधिक कर वसूलते थे- विशेषत: तम्बाकू पर (जो उस समय तक व्यापार की एक महत्त्वपूर्ण वस्तु बन चुका था)। यही नहीं, बल्कि वे इतने उद्दण्ड बन बैठे कि उन्होंने दासों का घृणित एवं निष्ठुर व्यापार भी आरम्भ कर दिया।

यह मुग़ल बादशाह को चिढ़ाने के लिए काफी हो गया होगा। कुछ जेसुइट धर्म प्रचारकों के भारतीयों को ईसाई बनाने के कारण वह पुर्तगीजों से और भी क्रुद्ध हो गया। गद्दी पर बैठने के शाहजहाँ ने कासिम अली खाँ को बंगाल का सूबेदार नियुक्त किया और उस पुर्तगीजों को सजा देने का भार सौंपा। तदानुसार कासिम अली खाँ के पुत्र अधीन एक विशाल सेना ने 24 जून, 1632 ई. को हुगली पर घेरा डाल दिया तथा तीन महीनों के बाद उस पर अधिकार कर लिया।

शाहजहाँ ने कंधार के महत्वपूर्ण प्रान्त पर पुन: अधिकार करने का संकल्प किया, क्योंकि उसके बिना उत्तर-पश्चिम सीमा पर मुगलों की स्थिति अपेक्षाकृत दुर्बल थी। कुशलता से सौदा क्र उसने कंधार के फारसी सूबेदार अली मरदान खां को उसकी शः के प्रति भक्ति से बहका कर उसे मुगलों को दुर्ग समर्पित करने को उभाड़ा।

अली मर्दान मुग़ल बादशाह की नौकरी में चला आया तथा उसे पुरस्कार के रूप में धन तथा सम्मान मिला। अली मर्दान की इस करतूत से फारस कंधार से वंचित हो गया, परन्तु इसे मुग़ल बहुत समय तक अपने अधिकार में नहीं रख सके। पारसियों ने अपने शासक शाह अब्बास द्वितीय के अधीन जाड़े में जबकि बर्फ पड़ने के कारण मुगलों को भारत से पुन: सेना मंगाने में कठिनाई होती, कंधार पर आक्रमण करने के उद्देश्य से अगस्त 1648 ई. में तैयारी की। शाहजहाँ के दरबारियों ने बुद्धिहीनता से मौसम का अन्त होने तक पारसियों पर आक्रमण करने के कार्य को स्थगित रखने का परामर्श दिया। शत्रु पर ध्यान न देने का जो परिणाम होता है, वही हुआ।

जाड़े की गम्भीरता, भोजन-सामग्री का अभाव तथा अन्य कठिनाइयों पर, जिनपर शाहजहाँ के दरबारियों ने अपनी आशा की भीत खड़ी की थी, पारसी राजा की विजय हुई । उसने 16 दिसम्बर, 1648 ई. को कंधार पर घेरा डाल दिया। अन्त में नगर की रक्षा करने वाली मुग़ल सेना ने, अधिकांशत: कंधार के अयोग्य मुग़ल शासक दौलत खाँ की दुर्बलता के कारण, 11 फरवरी, 1649 ई. को आत्मसमर्पण कर दिया।

मई के प्रारम्भ में शाहजादा औरंगजेब को प्रधान मंत्री सादुल्ला खाँ के साथ कधार पर पुन: अधिकार करने की चेष्टा करने को भेजा गया। उसने उस महीने की सोलह तारीख को कधार पर आक्रमण किया। परन्तु पारसियों की उच्चतर सैनिक तैयारियों तथा कौशल के सामने यह चेष्टा असफल रही। फिर भी शाहजहाँ ने कधार को पुनः जीतने की अपनी योजना नहीं छोड़ी। तीन वर्षों की तैयारियों के बाद बादशाह ने, फिर औरंगजेब तथा सादुल्ला खाँ के ही अधीन, घेरा डालने के आवश्यक यंत्रों के सहित वहाँ एक विशाल सेना भेजी।

वह भोजन तथा युद्ध की सामग्री के भेजने का प्रबंध करने के लिए काबुल में पड़ाव डालकर रहा। शाही सेनापतियों ने 2 मई, 1642 ई. को कंधार पर घेरा डाल दिया। उनके स्वामी ने दृढ़ आज्ञा दी थी कि बिना दरार बनायें दुर्ग पर आक्रमण न करें। परन्तु पारसियों की श्रेष्ठतर तोपों के सम्मुख उनकी कमजोर गोलंदाजी की एक न चली।

इस प्रकार इस बार भी मुग़ल फौज को सफलता नहीं मिली। शाहजहाँ को घेरा उठा लेने की आज्ञा देनी पड़ी। बादशाह के ज्येष्ठ तथा प्रिय पुत्र दारा शुकोह (अब शाह बुलन्द इकबाल की उपाधि से प्रशंसित) के द्वारा अगले वर्ष तीसरा प्रयत्न भी उसके भाई के प्रयत्न की तरह ही दुर्भाग्यपूर्ण सिद्ध हुआ।

कधार मुगलों के हाथ से सदा के लिए जाता रहा, यद्यपि शाहजहाँ के राज्यकाल में इस पर पुन: अधिकार प्राप्त करने के आक्रमण किए गये। आक्रमणों में बहुमूल्य जीवनों के अतिरिक्त बारह करोड़ से कम रूपया व्यय नहीं हुआ। यह रूपया राज्य की वार्षिक आय के आधे से भी अधिक था। कंधार के सामने मुग़ल सेना के बार-बार असफल होने से साम्राज्य की प्रतिष्ठा पर बहुत प्रभाव पड़ा।

मुगलों के मध्य एशिया के साहसिक कार्यों का भी दुर्भाग्यपूर्ण अन्त हुआ। अपने पिता तथा दादा के समान शाहजहाँ मध्य एशिया के अपने पूर्वजों के पुराने राज्यों को पुनः जीतने के स्वप्न देखा करता था। परन्तु हिन्दूकुश की ऊँची श्रेणियाँ होकर विशाल सेना ले जाने में बहुत कठिनाइयाँ थीं तथा इस साहसिक कार्य की उपयोगिता भारत के मुग़ल-साम्राज्य के लिए अत्यंत संदेहजनक थी। फिर भी शाहजहाँ ने इस पर विचार नहीं किया।

उसके राज्यकाल की उन्नति तथा उसके दरबारियों की चापलूसी से उसका दिमाग फिर गया था तथा वह अत्यंत अभिमानपूर्ण स्वप्न देखने लगा था। 1646 ई. में औक्सस प्रदेश के शासक वंश में गृहयुद्ध फैल जाने के कारण अनुकूल परिस्थिति रहने से शाहजादा मुराद तथा अली मर्दान ने बल्ख एंव बदख्शाँ पर अधिकार कर लिया। ये स्थान हिन्दूकुश एंव औक्सस नदी के बीच में घिरे हुए थे।

पर इन जीते हुए प्रदेशों का दृढ़ीकरण करना असम्भव हो गया। बल्ख की अस्वास्थ्यकर जलवायु तथा अन्य कठिनाइयों से तंग होकर शाहजादा मुराद अपने पिता की इच्छा के विरूद्ध भारत लौट आया, जिसके लिए वह अपमानित हुआ। वजीर सादुल्ला खाँ सब कुछ ठीक करने के लिए बल्ख भेजा गया। अगले वर्ष बादशाह ने, अपने जीते हुए प्रदेशों को नहीं छोड़ने का निश्चय कर, औरंगजेब को एक विशाल सेना के साथ बल्ख भेजा।

परन्तु उजबेगों ने उस बार मुगलों के विरुद्ध एक राष्ट्रीय प्रतिरोध संगठित किया। उसके सम्मुख औरंगजेब उपनी सच्ची तथा तत्पर चेष्टाओं के बावजूद कुछ नहीं कर सका तथा भयंकर कष्ट सहने के बाद उसे भारत लौट आना पड़ा। मध्य एशियाई आक्रमणों से मुग़ल-साम्राज्य के धन और जन की विशाल क्षति हुई।

शाहजहाँ ने दक्षिण में राज्य प्रसार की परम्परागत नीति को पुनः आरम्भ किया। अकबर केवल खानदेश जीत सका था और बरार को अपने साम्राज्य में मिला सका था। जहाँगीर के अहमदनगर जीतने के प्रयत्न को इसके योग्य मंत्री मलिक अम्बर ने सफलता पूर्वक रोका था। बीजापुर और गोलकुण्डा स्वतन्त्र चले आ रहे थे। मुग़ल साम्राज्यवाद द्वारा उस प्रायद्वीप को पूर्ण विजय करने के पहले बहुत कुछ करना बाकी था।

अहमदनगर के निजामशाही राज्य ने, दक्षिण में मुग़ल सीमा की समीपता के कारण, सबसे पहले मुग़ल शक्ति के बोझ का अनुभव किया। 1626 ई. में जहाँगीर के राज्यकाल में मुगलों के आक्रमण से अहमदनगर की रक्षा करने वाला मलिक अम्बर मर गया। उसके पश्चात् राज्य पतन के गर्त्त में चला गया। सुल्तान तथा उसके मंत्री फतह खाँ के बीच, जो उच्च पदस्थ अबिसीनियन मलिक अम्बर का अयोग्य पुत्र था, आन्तरिक कलह चलने लगा। इस कारण कुछ वर्षों के अन्दर राज्य मुगलों के पंजे में आ गया।

1630 ई. में मुग़ल परेन्दा नामक अहमदनगर के प्रबल दुर्ग को जीतने में असफल रहे। परन्तु फतह खाँ सुल्तान निजामुलमुल्क से असन्तुष्ट होकर मुग़ल बादशाह से बातचीत करने लगा। उसने मुग़ल बादशाह के सुझाव पर गुप्त रूप से अपने स्वामी से छुट्टी पा ली। अपने प्रभाव को स्थायी बनाने के लिए उसने निजामुलमुल्क के पुत्र हुसैन शाह को, जो केवल दस वर्ष का बच्चा था, राजसिंहासन पर बैठाया।

वह मुग़लों के साथ अपनी मित्रता में एकदम सच्चा नहीं था। जब मुगलों ने 1631 ई. दौलताबाद के दुर्ग को घेर लिया, तब वह पहले शाही दल के विरुद्ध रहा। परन्तु शीघ्र ही वह साढ़े दस लाख रुपये घूस लेकर उनके पक्ष में हो गया तथा किले को समर्पित कर दिया। इस प्रकार वे ही निकृष्ट साधन, जिनसे मुग़लों को असीरगढ़ प्राप्त हुआ था, उनके द्वारा दौलताबाद प्राप्त करने में भी व्यवहृत हुए।

अहमदनगर मुग़ल-साम्राज्य में 1633 ई. में मिला लिया गया तथा नाममात्र के शासक हुसैन शाह को जीवन भर के लिए ग्वालियर के किले में कारावास में डाल दिया गया। इस प्रकार निजामशाहियों के वंश का अन्त हो गया, यद्यपि विख्यात शिवाजी के पिता शाहजी ने 1635 ई. में इसे पुनर्जीवित करने कर असफल प्रयास किया। मुगलों को सहायता देने के पुरस्कार के रूप में फ़तह खाँ को अच्छे वेतन पर शाही नौकरी में भर्ती कर लिया गया।

गोलकुंडा तथा बीजापुर के शिया राज्यों की स्वतंत्रता शाहजहाँ की साम्राज्यवादी एवं धार्मिक उमंग को अत्यन्त खल रही थी। उनके राज्यों पर शाही सेना के अतिक्रमण पहले ही क्रमशः 1629 तथा 1631 ई. में-आरम्भ हो चुके थे।

1635 ई. में शाहजी ने अहमदनगर के अब मृतक राज्य के नाममात्र के सुल्तान के रूप में एक निजामशाही बच्चे को गद्दी पर बैठाने का प्रयत्न किया। इन दोनों राज्यों के सुल्तानों ने गुप्त रूप से शाहजी की सहायता की। इस पर मुग़ल बादशाह ने उन्हें उसका अधिपत्य स्वीकार करने, नियमित रूप से कर भेजने तथा शाहजी की सहायता करने से बचने को कहा। अपनी माँगों को लागू करवाने के लिए वह स्वयं सेना लेकर दक्कन गया।

21 फरवरी, 1636 ई. को दौलताबाद पहुँच कर वह दक्कन के राज्यों पर आक्रमण करने की प्रबल तैयारियाँ करने लगा। इनसे डरकर गोलकुंडा के सुल्तान अब्दुल्ला शाह ने शाहजहाँ की सारी माँगों को-जैसे बादशाह को वार्षिक कर देना तथा उसके नाम से सिक्के ढलवाना और खुतबा पढ़वाना-मान लिया और उसका अधिपत्य स्वीकार कर लिया।

परन्तु बीजापुर के आदिल शाह ने बादशाह की आज्ञा मानना अस्वीकार कर दिया तथा अपने अधिकारों की रक्षा करने के लिए साहसपूर्वक तैयार हो गया। तब तीन ओर से तीन मुग़ल सेनाओं ने उसके राज्य पर आक्रमण कर दिया-एक, खाने-दौरान के अधीन उत्तर-पूर्व में बीदर से; दूसरी, खाँ जहाँ के अधीन पश्चिम में शोलापुर होकर तथा तीसरी, खाने जूमाँ के अधीन उत्तर-पश्चिम में इन्दापुर के रास्ते।

बीजापुर के सैनिकों ने चिरकालसम्मानित उपायों का सहारा लिया- उन्होंने शत्रु की रसद रोकी तथा कुओं में विष मिलाया। इस प्रकार उन्होंने वीरतापूर्वक राजधानी की रक्षा की। किन्तु उनके राज्य के शेष भाग को मुग़लों ने रौद डाला। इस तरह सुल्तान को विवश होकर संधि के लिए प्रार्थना करनी पड़ी। मई, 1636 ई. में संधि हुई।

उसने मुग़ल बादशाह का अधिपत्य मान लिया और उसे कर देना कबूल कर लिया। उसे गोलकुंडा राज्य को तंग नहीं करना था, जो अब बादशाह के अधीन राज्य था। सुल्तान को अपना पैतृक राज्य रखने की आज्ञा मिल गयी। उसे अहमदनगर राज्य की जमीन के कुछ हिस्से भी मिले। इस राज्य का शेष भाग मुग़ल साम्राज्य में मिला लिया गया।

औरंगजेब राजप्रतिनिधि के तौर पर परिश्रमपूर्वक साम्राज्य के शत्रुओं का दमन करने में लग गया। उसने बगलाना के इलाके पर अधिकार कर लिया, जो खानदेश एवं सूरत के तट के बीच था तथा शाहजी को अपनी अधीनता स्वीकार करने और कुछ दुर्गों को समर्पित करने को विवश किया।

दक्कन के राजप्रतिनिधि के पद से त्यागपत्र देने के बाद औरंगजेब फरवरी, 1645 ई. में गुजरात का शासक नियुक्त हुआ। बाद में वह बलख, बदखशाँ तथा कंधार पर आक्रमण करने को भेजा गया पर ये आक्रमण असफल रहे। कंधार से लौटने पर वह दारा शुकोह के विरोध के कारण दरबार में सुरक्षित अथवा सम्मानित रूप से नहीं ठहर सका। अत: 1653 ई. के प्रारंभ में दूसरी बार उसे राजप्रतिनिधि बनाकर दक्कन भेजा गया। नवम्बर, 1653 ई. से दौलताबाद या औरंगाबाद उसकी सरकार का प्रधान कार्यालय रहा।

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