प्राचीन भारत का इतिहास नोट्स

महत्वपूर्ण संगम शासक Significant Sangam Ruler

चेर शासक

संगम साहित्य से चेर शासकों पर विशेष प्रकाश पड़ता है। प्राचीन चेर राज्य में मूल रूप से उतरी त्रावणकोर, कोचीन तथा दक्षिणी मालाबार सम्मिलित थे। प्राचीन चेर राज्य की दो राजधानियाँ थीं, वंजि और तोण्डी।

वंजि की पहचान करूर से की गई है। टोलमी चेरों की राजधानी करौरा का उल्लेख करता है। प्रथम चेर शासक उदयन जेराल के बारे में कहा जाता है कि उसने कुरुक्षेत्र में भाग लेने वाले सभी योद्धाओं को भोजन दिया। अत: उसे महाभोज उदयन जेरल की उपाधि दी गई। उदयन जेरल का पुत्र नेदुजेरल आदन ने कई राजाओं को पराजित करके अधिराज की उपाधि ली।

वह इमैवरैयन (जिसकी सीमा हिमालय तक हो) कहा जाता था। वह दावा करता है कि उसने सारे भारत की जीत लिया तथा हिमालय पर चेर राजवंश के चिह्न को अंकित किया। उसकी राजधानी का नाम मरन्दई था।

आदन का पुत्र सेनगुटुवन था, परनर कवि द्वारा यश वर्णन किया गया है। उसने कन्नगी पूजा अथवा पत्नी पूजा आरंभ की। माना जाता है कि पत्नी पूजा की मूर्ति के लिए पत्थर गंगा नदी से धोकर लाया गया था। शिल्पादिगारम में कन्नगीपूजा का प्रमाण मिलता है। एक चेर शासक आदिग इमान उर्फ नदुमान अंजि है।

वह विद्वानों का बड़ा संरक्षक था, उसे दक्षिण में गन्ने की खेती शुरू करने का श्रेय दिया जाता है। एक चेर शासक शेय था जिसे हाथी जैसे आँखों वाला कहा जाता था। अंतिम चेर शासक कुडक्को इलंजेराल इरमपोई थी। चेरो की राजधानी करूयूर अथवा वंजीपुर थी। चेरों का राजकीय चिह्न धनुष था।

चोल वंश

इसकी प्रथम जानकारी कात्यायन की वर्तिका से मिलती है। महाभारत, संगम साहित्य, पेरिप्लस और टॉलमी के विवरण से भी जानकारी प्राप्त होती है। साक्ष्यों के अनुसार चोलों की पहली राजधानी उत्तरी मलनुर थी। कालांतर में वह उरैयूर और तंजावूर हो गयी। चोलों का राजकीय चिह्न बाघ था। प्रथम चोल शासक इलजेतचेन्नी था।

इसी ने उरैयूर राजधानी बनायी। चोल राजाओं में करिकाल प्रमुख है। उसके बारे में कहा जाता है कि जब वह खुले समुद्र में जहाज चलाता था तो हवा भी उसके अनुसार बहने को बाध्य होती थी। करिकाल का अर्थ है जली हुए टांग वाला व्यक्ति।

करिकाल को 7 स्वरों का ज्ञाता भी कहा जाता था। कावेरी नदी के मुहाने पर उसने पुहार की स्थापना की। उसने पटिनप्पालै के लेखक को 16 लाख मुद्राएँ भेंट कीं। दूसरी सदी ई.पू. के एक शासक एलारा की भी चर्चा मिली है। इसने श्रीलंका पर 50 वर्षों तक शासन किया।

पांड्य

मेगस्थनीज के विवरण, अशोक के अभिलेख, महाभारत, रामायण आदि में इसकी चर्चा हैं। मेगस्थनीज ने पंडैया द्वारा शासित पांडय राज्य का विलक्षण वर्णन प्रस्तुत किया है। पांडया हेराक्लीज की पुत्री थी। उसे उसने उत्तर भारत का वह भाग दिया था जो दक्षिण की ओर है और समुद्र तक जिसकी सीमा है।

पांड्य की राजधानी मदुरई थी और उनका राज-चिह्न मछली था। कौटिल्य के अर्थशास्त्र से ज्ञात होता है कि मदुरा कीमती मोतियों, उच्च कोटि के वस्त्र एवं विकसित वाणिज्य और व्यापार के लिए प्रसिद्ध था। पांड्यों की प्रारम्भिक राजधानी कोरकई करुयुर थी। प्रमुख पांड्य शासक नेडियोन ने सागर पूजा की प्रथा शुरू की।

पलशायमुड्डोकुडमि, वेलबिक्री दानपत्र के अनुसार, पांडय वंश का प्रथम ऐतिहासिक शासक था। उसे अनेक यज्ञशाला बनाने का श्रेय दिया जाता हैं इसलिए उसका नाम पलशाय है। इस वंश का प्रसिद्ध शासक नेडूनजेलियन था।

उसे तलैयालगानम का युद्ध जीतने का श्रेय दिया जाता है। उसने चेर शासक शेय को पराजित करके बंदीगृह में डाल दिया। इसी ने कन्नगी के पति कोवलन को दंडित किया था। फिर उसने पश्चाताप में आत्महत्या कर ली। संगम ग्रन्थ में नल्लिवकोडम को अन्तिम ज्ञात पांड्य शासक माना जाता है।

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