इतिहास नोट्स/ सामान्य अध्ययन

सिंधु घाटी सभ्यता की लिपि की उत्पत्ति sindhu ghaatee sabhyata kee lipi kee utpatti

भारत में लिखने की कला का ज्ञान लोगों को अत्यन्त प्राचीन काल से है। इसके प्राचीनतम नमूने सिंधु घाटी (पंजाब के मांटगोमरी जिले के हड़प्पा तथा सिंध के लरकाना जिले के मोहन-जो-दड़ो में प्राप्त सीलों पर) में मिले हैं। हेरास, लैंग्डन, स्मिथ, गैड तथा हंटर ने इसे समझने और पढ़ने का प्रयास किया है, किन्तु अभी तक किसी को सफलता नहीं मिल सकी है।

सिंधु घाटी सभ्यता की लिपि की उत्पत्ति

सिंधु घाटी की लिपि की उत्पत्ति के विषय में प्रधानत: तीन मत हैं।

  1. द्रविड़ उत्पत्ति: इस मत के समर्थकों में ए. हेरास तथा जान मार्शल प्रधान हैं। इन लोगों के अनुसार सिंधु-घाटी की सभ्यता द्रविड़ों की थी, और वे ही लोग इस लिपि के जनक तथा विकास करने वाले थे। इस मत के समर्थकों के तर्क पुरातत्ववेत्ताओं को इतने सशक्त नहीं लगे हैं, कि उन्हें स्वीकार किया जा सके।
  2. सुमेरी उत्पत्ति: एल.ए. तथा डॉ. प्राणनाथ के अनुसार सिंधु घाटी की लिपि सुमेरी लिपि से निकली है। वैडेल के अनुसार सिंधु की घाटी 4000 र्इ.पू. सुमेरी लोग थे और उन्हीं की भाषा तथा लिपि वहां प्रचलित थी। वस्तुत: प्राचीन भारत, मध्य एशिया, क्रीट तथा इजिप्ट की पुरानी लिपियां चित्रा-लिपि थीं और व्यापारिक संबंधों के कारण उनमें कुछ साम्य भी है, किन्तु आज इतने दिन बाद यह कहना कठिन है इस प्रकार की लिपि के मूल निर्माता कौन थे, और किन लोगों ने मूल निर्माताओं से इसे सीखा।
  3. आर्य या असुर उत्पत्ति: कुछ लोगों के अनुसार सिंधु घाटी में आर्य या असुर (जो जाति या संस्कृति में आर्यों से संबद्ध थे) रहते थे और इन्हीें लोगों ने इस लिपि का निर्माण किया। इन लोगों के अनुसार प्राचीन एलामाइट, सुमेरी तथा मिश्री लिपियों से, इस लिपि का साम्य इस कारण है कि इन तीनों ही देशों में लिपि भारत से ही गर्इ है। इसकी उत्पत्ति या उत्पत्ति-स्थान के संबंध में निश्चय के साथ कुछ नहीं कहा जा सकता। सिंधु घाटी की लिपि में कुछ चिन्ह तो चित्रा जैसे हैं- और कुछ अक्षर जैसे- विद्वानों का कहना है कि यह लिपि यदि शुद्ध भावमूलक होती तो इतने थोड़ेचिन्हो से काम नहीं चलता, जितने कि वहां मिले हैं। इसी आधार पर लोगों ने अनुमान लगाया है कि यह भावमूलकता और अक्षरात्मकता के संधिस्थल पर खड़ी है। अर्थात् यहां कुछ चिन्ह चित्रामूलक हैं, और कुछ अक्षर-से हैं। डिरिंजर ने इसी आधार पर इसे ‘ट्रांजिशनल स्क्रिप्ट’ (भाव- ध्वनि-मूलक लिपि) कहा है।

सिंधु घाटी की लिपि में कुल कितने चिन्ह हैं, इस संबंध में भी विद्वानों में मतभेद है। इसका कारण यह है कि वर्गीकरण में कुछ लोग तो कई चिन्हो को एक चिन्ह का ही लेखन के कारण परिवर्तित रूप मानते हैं, और कुछ लोग उन्हें अलग चिन्ह मानते हैं। इस संबंध में तीन विद्वानों के मत प्रधान हैं। हंटर के अनुसार चिन्हो की संख्या 253ए लैग्डन के अनुसार 228 तथा गैड और स्मिथ के अनुसार 396 हैं।

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