मध्यकालीन भारत का इतिहास नोट्स

दक्षिण भारत की सल्तनतें: बहमनी राज्य

दिल्ली सल्तनत के खंडहरों पर जितने भी स्वतंत्र मुस्लिम राज्य खड़े हुए, उनमें दक्कन का बहमनी राज्य सबसे अधिक शक्तिशाली सिद्ध हुआ। यह मुहम्मद बिन तुगलक के राज्यकाल में उसकी प्रभुता के विरुद्ध चुनौती के रूप में स्थापित हुआ। दक्कन के सरदार दिल्ली के सुल्तान की सनकी नीति से विद्रोही बन बैठे। उन्होंने दौलताबाद के किले पर अधिकार कर अपने में से एक इस्माइल मुख अफगान को नसिरुद्दीन शाह के नाम से दक्कन का राजा घोषित कर दिया।

इस्माइल मुख बूढ़ा और आरामतलब होने के कारण इस पद के अयोग्य सिद्ध हुआ। शीघ्र ही वह स्वेच्छा से एक अधिक योग्य नेता हसन के, जिसे जफर खाँ की उपाधि प्राप्त थी, पक्ष में गद्दी से हट गया। जफर खाँ को सरदारों ने 3 अगस्त, 1347 ई. को अबुल मुजफ्फर अलाउद्दीन बहमन शाह के नाम से सुल्तान घोषित किया।

 फरिश्ता हसन की उत्पत्ति के विषय में एक कहानी कहता है कि वह मूल रूप में दिल्ली के गंगू नाम एक ब्राह्मण ज्योतिषी का, जो मुहम्मद बिन तुगलक का प्रिय पात्र था, घरेलू नौकर था तथा आगे चलकर अपने हिन्दू स्वामी की सहायता से प्रसिद्धि को प्राप्त हुआ। उत्तरकालीन मुस्लिम इतिहासकारों के विवरणों से अथवा सिक्कों या अभिलेखों के प्रमाण से इस कहानी का पुष्टिकरण नहीं होता। वास्तव में हसन प्रसिद्ध फारसी वीर बहमन, जो इस्फन्दियार का पुत्र था, का वंशज होने का दावा करता था और इस प्रकार उसके द्वारा स्थापित वंश का नाम बहमनी वंश पड़ा। बहमन शाह को खलीफा से भी मान्यता प्राप्त थी। उसके सिक्के पर द्वितीय सिकन्दर खुदा हुआ था।

गद्दी पर बैठने के शीघ्र बाद अलाउद्दीन हसन ने गुलबर्गा को अपनी राजधानी के लिए चुना तथा उसका नाम बदल कर अहसनाबाद कर दिया। पर दक्षिण के हिन्दू शासक, जो अलाउद्दीन हसन के उदय के समय की दक्कन में हुई राजनैतिक अव्यवस्था से लाभ उठाने में नहीं चूके थे, उसकी अधीनता स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। अत: उसने विजय की नीति का अनुसरण किया, जो सफल रही। 11 फरवरी, 1358 ई. को उसकी मृत्यु हुई।

उस समय उसका राज्य उत्तर में वेन गंगा नदी से लेकर दक्षिण में कृष्णा नदी तक तथा पश्चिम में दौलताबाद से लेकर पूर्व में भोंगीर तक फैला था। अपने राज्य के शासन के लिए उसने इसे चार भागों अथवा प्रान्तों में विभाजित कर दिया- गुलबर्गा, दौलताबाद, बरार और बीदर। प्रत्येक प्रान्त एक शासक के अधीन था, जो अपनी सेना रखता था तथा अपने अधीन सभी नागरिक और सैनिक पदों पर नियुक्तियाँ करता था। प्रान्तों में शासन की कार्यक्षमता के कारण विद्रोहों का होना रुक गया। बुरहाने-मआसिर के लेखक ने इस सुल्तान की प्रशंसा इस प्रकार की है- सुल्तान अलाउद्दीन प्रथम हसन शाह एक न्यायी राजा था। वह अपनी प्रजा को दिल में रखने वाला एवं धर्मनिष्ठ था। उसके शासन-काल में उसकी प्रजा एवं सेना अपना समय पूरे चैन और सन्तोष में व्यतीत किया करती थी। सच्चे धर्म का प्रचार करने के लिए उसने बहुत कुछ किया।

अगले सुल्तान हसन का ज्येष्ठ पुत्र मुहम्मद शाह प्रथम था। हसन ने अपनी मृत्युशैय्या पर उसे अपना उत्तराधिकारी मनोनीत कर दिया था। गद्दी पर बैठने के शीघ्र बाद मुहम्मद शाह ने अपनी सरकार की विभिन्न शाखाओं- जैसे मंत्रिमंडल, घरेलू सेना तथा प्रान्तीय शासन का संगठन किया। पर अपने सारे शासनकाल में वह मुख्यतया वारंगल एवं विजयनगर के शासकों के साथ युद्ध करने में लगा रहा।

उन शासकों ने भयंकर प्रतिरोध किया, पर दोनो को गुलबर्गा की सेना से पराजित होकर तथा महान् क्षति उठाकर अपमानजनक शताँ पर संधि करनी पड़ी। मुदकल के किले पर हुए इस युद्ध में पहली बार बारूद का प्रयोग हुआ था।

मुहम्मद शाह का रहने का ढंग दोषारोपण से परे नहीं था। बुरहाने-मआसिर का लेखक स्पष्ट रूप से लिखता है कि- सुल्तान रहन-सहन के अधार्मिक ढंग प्रदर्शित करता था, जिससे वह असहाय अवस्था में पड़ जाता था।

1377 ई. में मुहम्मद शाह प्रथम की मृत्यु हुई। उसके बाद उसका पुत्र मुजाहिद शाह गद्दी पर बैठा तथा स्वयं सेना लेकर विजयनगर के विरुद्ध बढ़ा। पर वह उस नगर पर अधिकार नहीं कर सका और उसे शीघ्र उसके राय के साथ संधि कर अपनी राजधानी लौट आना पड़ा।

वह दाऊद खाँ नामक अपने एक निकट सम्बन्धी द्वारा संगठित षड्यंत्र का शिकार बन गया। दाऊद खाँ ने गद्दी हड़प ली। मुजाहिद की दूध-बहन (धात्री-पुत्री) रूह परवर आगा के उकसाने से एक हत्यारे ने उस हड़पने वाले को मई, 1378 ई. में हत्या कर उसक बदला चुका दिया। तब सरदारों एवं सैनिक अधिकारियों ने अलाउद्दीन हसन बहमनी के चतुर्थ पुत्र महमूद खौं के लड्के मुहम्मद शाह को गद्दी पर बैठाया।

अपने पूर्वगामियों से भिन्न मुहम्मद शाह द्वितीय शान्तिप्रिय एवं विद्याव्यसनी था। उसके राज्यकाल में बाहरी शक्तियों से लड़ाइयाँ नहीं लड़ी गयीं। उसने मस्जिदों का निर्माण करवाया, अनाथों के लिए नि:शुल्क पाठशालाएँ स्थापित कीं तथा एशिया के सभी भागों से विद्वानों को अपने दरबार में आमंत्रित किया।

पर उसके अन्तिम दिन उसके पुत्रों के, जो गद्दी प्राप्त करने की इच्छुक थे, षड्यंत्रों के कारण विषादमय बन गये। अप्रैल, 1397 ई. में उसकी मृत्यु हुई। इसके बाद ग्यासुद्दीन एवं शम्सुद्दीन नामक उसके दोनों पुत्रों के गौरवहीन एवं दु:खदायी राज्यकाल आये, जो कुछ ही महीनों तक रहे। नवम्बर, 1397 ई. में गुलबर्गा के सिंहासन पर अलाउद्दीन हसन बहमनी के पौत्र फीरोज ने अधिकार कर ताजुद्दीन फीरोज शाह की उपाधि धारण की।

बुरहाने-मआसिर का लेखक हमें बतलाता है कि फीरोज शाह प्रबल एवं पराक्रमी सुल्तान था। उसने अपनी सारी योग्यता एवं स्फूर्ति को अत्याचार और पाखंड के उन्मूलन एवं विनाश में लगाया। उसे शेखों, विद्वानों एवं साधुओं के समाज में बड़ा आनन्द आता था। पर कुछ वर्षों के शासन के बाद वह उस समय के प्रचलित पापों में निरत हो गया, जिसका उल्लेख फरिश्ता तक ने किया है।

वह विभिन्न भाषाएँ जानता था तथा अपनी भिन्न-भिन्न जातियों की पत्नियों से उनकी अपनी भाषाओं में ही स्वच्छन्द रूप से बातें कर सकता था। उसने खगोलशास्त्र के अध्ययन के लिए, दौलताबाद में एक वेधशाला (वद्देमतअंजवतल) का निर्माण कराया। विजयनगर के रायों तथा दक्कन के कुछ अन्य हिन्दू शासकों के विरुद्ध युद्ध कर उसने अपने वंश की परम्परागत नीति का अनुसरण किया। विजयनगर के विरुद्ध 1398 ई. एवं 1406 ई. के अपने दोनों आक्रमणों में उसे सफलता मिली।

उसने इसके राजा से भारी हर्जाना वसूल किया और यहाँ तक कि अपने अन्त:पुर के लिए उसे विजयनगर की एक राजकुमारी समर्पित करने को भी विवश किया। पर 1420 ई. के अपने तीसरे आक्रमण के फलस्वरूप कृष्णा के उत्तर पांगुल में उसकी हार हो गयी तथा अपने प्रधान सेनापति मीर फज़लुल्लाह इंमजू के मारे जाने पर उसे मैदान से पीछे हटना पड़ा। विजयनगर की सेना ने शीघ्र बहमनी राज्य के दक्षिणी एवं पूर्वी जिलों पर अधिकार कर लिया।

इस पराजय का सुल्तान के मन एवं शरीर पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा। उसने शासन अपने दासों-हुशिवार ऐनुलमुल्क एवं निजाम बीदारुलमुल्क-के हाथों में सुपुर्द कर दिया। अन्त में वह अपने भाई अहमद के पक्ष में गद्दी छोड़ने को विवश किया गया। बुरहाने-मआसिर के लेखक के कथनानुसार, अहमद ने सितम्बर, 1422 ई. में फीरोजशाह से छुट्टी पा ली, यद्यपि फरिश्ता के प्रमाण पर कुछ लेखकों का विश्वास है कि फीरोज शाह की मृत्यु स्वाभाविक रूप में हुई।

अपने भाई के राज्यकाल में हुई बहमनी सेना की क्षति का बदला लेने के अभिप्राय से अहमद ने विजयनगर से भयंकर युद्ध किया। बहमनी सेना ने विजयनगर पर घेरा डालकर इसे बड़ा कष्ट पहुँचाया तथा इसके राजा को भारी हर्जाना देकर संधि करने को विवश किया। यह खबर राय के पुत्र द्वारा हाथियों पर अहमद के खेमे में पहुँचायी गयी। राजा के पुत्र का वहाँ सम्मान सहित स्वागत हुआ। तब आक्रमणकारी अपने देश को लौट गये।

1424 अथवा 1425 ई. में अहमद शाह के सेनापति खाने-आजम ने वारंगल के हिन्दू राज्य पर आक्रमण कर दिया तथा विशाल धनराशि सहित इसके गढ़ पर अधिकार करने और इसके राजा की हत्या करने में सफल हुआ। इस प्रकार वारंगल की स्वतंत्रता नष्ट हो गयी। अहमद शाह ने मालवा के विरुद्ध भी युद्ध किया। मालवा का सुल्तान हुशंग शाह पराजित हुआ तथा उसे धन-जन की अपार क्षति हुई।

अहमद गुजरात के सुल्तान अहमदशाह प्रथम के साथ युद्ध में असफल रहा तथा अन्त में उभय पक्षों के धर्म-ज्ञानियों एवं विद्वानों की मध्यस्थता से संधि हो गयी। उसके शासनकाल में कोंकण के हिन्दू नायकों ने भी बहमनी शस्त्रों के बोझ का अनुभव किया। पर फरवरी, 1435 ई. में बीमारी के कारण उसकी मृत्यु हो जाने से यह दबाव जाता रहा। अहमदशाह अपने राज्य की राजधानी गुलबर्गा से बदलकर बीदर ले गया। बीदर रमणीक स्थान पर था तथा उसकी जलवायु स्वास्थकर थी।

हमारे बारें में

एग्जाम टॉपर क्लास टीम

My Name is Jitendra Singh (Rana) और मैं एक सफल शिक्षक बनने की तैयारी कर रहा हूं ! और मैं लखनऊ, उत्तर प्रदेश (भारत) से हूँ।
मेरा उद्देश्य हिन्दी माध्यम में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले प्रतिभागियों का सहयोग करना है ! आप सभी लोगों का स्नेह प्राप्त करना तथा अपने अर्जित अनुभवों तथा ज्ञान को वितरित करके आप लोगों की सेवा करना ही मेरी उत्कृष्ट अभिलाषा है !!
दोस्तो अगर आपको यह पोस्ट/विडियो/क्लास अच्छी लगी हो तो इसे Share अवश्य करें ! कृपया कमेंट के माध्यम से बताऐं कि ये पोस्ट आपको कैसी लगी आपके सुझावों का भी स्वागत रहेगा Thanks !

Leave a Comment