प्राचीन भारत का इतिहास नोट्स

वाकाटक वंश Vakataka Dynasty

वाकाटक वंश गुप्तों के अभ्युदय से पूर्व ही अपनी शक्ति स्थापित कर चुका था। सातवाहन साम्राज्य के पतन के बाद दक्षिण में एक केन्द्रीय शक्ति का अभाव हो गया तथा छोटी-छोटी रियासते अस्तित्व में आ गयी थीं।

तीसरी सदी के उत्तरार्द्ध में जब वाकाटक शक्ति का अभ्युदय हुआ तो दक्कन में एक नये साम्राज्य की स्थापना के लिए परिस्थितियाँ अनुकूल थीं। तीसरी सदी के मध्य तक शकों की शक्ति का ह्रास हो चुका था, यौधेय मालव, अर्जुनायनों, नागों, मालवों आदि गणराज्यों ने भी अपनी स्वतंत्रता घोषित कर दी थी।

पुराणों के अनुसार वाकाटक कोलकिल नामक प्रदेश के रहने वाले थे। इनका सम्बन्ध पन्ना की किलकिला नदी से बताया गया है। कोलकिल का तादात्म्य बधेलखण्ड के कोलकिल स्थान से किया जा सकता है। वाकाटकों के मूल निवास स्थान को लेकर विद्वानों में मतभेद है। वाकाटकों के तिथिक्रम का निर्धारण भी अभी निश्चित रूप से नहीं हो पाया है।

कई इतिहासकार 248-49 ई. में प्रवर्तित चेदि संवत् के आधार पर वाकाटकों की तिथि निर्धारित करते हैं। डॉ. रमेशचन्द्र मजूमदार व डॉ. अनन्त सदाशिव अल्तेकर ने वाकाटक तिथिक्रम वाकाटक राजा रुद्रसेन द्वितीय की महारानी और गुप्त सम्राट् चन्द्रगुप्त द्वितीय की पुंत्री प्रभावतीगुप्ता की ज्ञात तिथि की सहायता से निर्धारित करने का प्रयास किया है। उन्होंने इस वंश के प्रवर्तक विन्ध्य शक्ति के राज्य काल को 255-275 ई. के बीच रखा है।

चन्द्रगुप्त द्वितीय का काल लगभग 375-414 ई. माना गया है। इनकी पुत्री प्रभावती गुप्ता बहुत कम समय में विधवा हो गयी थी। रूद्रसेन द्वितीय के पिता पृथ्वीसेन बहुत वर्ष पहले से राज्य कर रहे थे। इसी आधार पर उपर्युक्त तिथि ही उचित प्रतीत होती है। शुंग, कण्व, सातवाहन शासकों की भाँति वाकाटक भी ब्राह्मण ही थे। वाकाटकों का गोत्र विष्णुवृद्ध माना गया। हिन्दू संस्कृति के विकास व संवर्द्धन में वाकाटकों ने महत्त्वपूर्ण योग दिया। इन्होंने संस्कृत भाषा को अपनाया।

वाकाटकों का मूल स्थान कहीं भी रहा हो लेकिन यह स्पष्ट है कि उनकी गतिविधियों का क्षेत्र मध्य प्रदेश या बरार में था। विंध्यशक्ति को इस वंश का संस्थापक शासक माना गया है। पुराणों में भी इसका नाम आया है लेकिन इसके साथ वाकाटक शब्द का प्रयोग नहीं मिलता। पुराणों में विंध्यशक्ति को विदिशा का शासक बताया गया है।

संभव है कि विंध्यशक्ति के पूर्वज सातवाहनों के सामन्त थे। कालान्तर में विंध्यशक्ति ने अपने आपको स्वतंत्र शासक घोषित कर दिया और विदिशा (मालवा) का शासक बन बैठा। इसने कई युद्धों का सामना किया था। वह एक दानी के रूप में भी प्रतिष्ठित था। उसकी तुलना इन्द्र और विष्णु से की गई है। अजंता गुहालेख में उसे द्विज भी कहा गया है। उसका शासन काल 255 से 275 ई. के लगभग माना जा सकता है।

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