जन्तु विज्ञान नोट्स

जंतु विज्ञान Zoology

जीवों के अध्ययन को जीव विज्ञान का नाम सन 1802 में फ्रांसीसी वैज्ञानिक लैमार्क तथा जर्मन वैज्ञानिक ट्रेविरैनस ने दिया। जीव विज्ञानं को डो शाखाओं में बांटा गया है- वनस्पति विज्ञान तथा जंतु विज्ञान। प्राचीन कालीन ग्रीस देश के कई दार्शनिकों ने जीवों के बारे में लिखा। जंतु विज्ञान पर प्रथम लेख 5वीं सदी ईसा पूर्व का एक चिकित्सा ग्रन्थ था। इसमें खाने योग्य जंतुओं का वर्गीकरण दिया गया था। हिप्पोक्रेटस् (460-375 ई.पू.) ने मानव रोगों पर लेख लिखे। इन्हें चिकित्सा शास्त्र का जनक भी कहते हैं। चिकित्सा शास्त्र के विद्यार्थियों को आज भी उनकी शपथ दिलाई जाती है। अरस्तू (Aristotle, ३८४२२०-322 ई.पू.) ने अपनी पुस्तक जंतु इतिहास (Historia animalium) नामक पुस्तक में 500 जंतुओं की रचना, स्वभाव, वर्गीकरण जनन आदि का वर्णन किया। इसलिए इन्हें जंतु विज्ञान का जनक (Father of Zoology) कहते हैं।

गैलेन (Galen, 131-200 ई.) ने कुछ जंतुओं के अंतरांगों की कार्यिकी पर सबसे पहला प्रयोगात्मक (Experimental) अध्ययन किया। इसके बाद 13वीं सदी में एल्बर्टस मैगनस (1200-1280 ई.) के ‘जंतुओं पर’ (On Animals) नामक ग्रन्थ से जंतु विज्ञान का पुनर्जागरण हुआ। 16वीं सदी में जंतुओं के अध्ययन पर अनेक ग्रन्थ छपे। इसी सदी में सूक्ष्मदर्शी (Microscope) का अविष्कार हुआ, जिससे जीव वैज्ञानिकों ने बहुमुखी अध्ययन प्रारंभ किया। इस वैज्ञानिकों में निम्नलिखित उल्लेखनीय हैं-

1. विलियम हार्वे (1578-1657) ने रुधिर परिसंचरण तंत्र (1628) एवं भ्रौणिकी का प्रयोगात्मक अध्ययन किया।

2. रॉबर्ट हुक ने सबसे पहले मृत पादप ऊतक (कॉर्क) में कोषाएं (1665) देखीं और उन्हें कोशिका की संज्ञा दी।

3. कैरोलस लिनियस ने अपनी पुस्तक सिस्टेमा नेचुरी (Systema Natural, 1735) पादपों एवं जंतुओं का वर्गीकरण किया और जीव-जातियों के लिए द्विनाम पद्धति (Binomial Nomenclature, 1749) बनाई। अतः इन्हें आधुनिक वर्गिकी का जनक (Father of Modern Taxonomy) कहते हैं।

4. लैमार्क ने जैव विकास पर मत प्रतिपादन किया तथा फिलॉसफी जूलोजिक (1809) नामक पुस्तक लिखी।

5. वॉन बेयर ने तुलनात्मक शारीरिक (Comparitive Anatomy) एवं भ्रौणिकी का व्यापक अध्ययन किया, ये आधुनिक भ्रौणिकी के जनक कहलाते हैं।

6. श्लाइडेन एवं श्वान ने सन 1838-39 में कोशिका मत का प्रतिपादन किया।

7. मेंडेल ने सन 1866 में प्रसिद्द आनिवंशिकी (Genetics) के नियम बनाये।

पदार्थ एवं ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति

अन्तरिक्षी उद्विकास Cosmic Evolution सारा ब्रह्माण्ड या विश्व, पदार्थ एवं उर्जा का बना हुआ है। इसकी आयु 7 से 10 अरब वर्ष आंकी गयी है। कहते हैं की इसकी उत्पत्तिइलेम (Ylem) नामक आदि पदार्थ (primordial matter) के एक अत्यधिक तप्त (5000°-6000°C) विशाल और सघन गैसीय बदल से हुई जो न्यूट्रान, प्रोटान एवं इलेक्ट्रान का बना हुआ था। एबी लमैत्र 1931, गैमो 1948 एवं डिक 1964 की बिग-बैंग परिकल्पना (Big Bang Hypothesis) के अनुसार इस बदल में भयंकर विस्फोट हुआ, जिससे इससे वर्तमान पदार्थ के कुछ परमाणु बने। इसी के साथ अन्तरिक्षी उद्विकास (cosmic evolution) की एक लम्बी श्रृंखला प्रारंभ हुई। अन्तराल में यह बदल फैला और छोटे-छोटे गैस के अनेक पिण्डो में बंट गया। प्रत्येक पिंड से एक आकाश गंगा बनी और इसके छोटे-छोटे, चमकते पिंडों से सितारे या नक्षत्र बने। ब्रह्माण्ड के अधिकांश नक्षत्र आज भी प्रज्जवलित गैसों के पिंड मात्र ही हैं। कांट-लाप्लास मत (1796) के अनुसार और परिवार का उद्गम हमारी आकाश गंगा के एक घूर्णीय (Rotating) गैसीय पिंड से लगभग 4.5 से 5 अरब वर्ष पूर्व हुआ। इस बदल में वर्तमान पदार्थ के अनेक स्वतंत्र परमाणु (Atoms) थे। अधिकांश परमाणु हाइड्रोजन के थे। गुरुत्वाकर्षण के कारण अधिकांश  परमाणुओं ने इस पिण्ड के केन्द्रीय भाग में एकत्र होकर सूर्य बनाया। शेष ने पिण्ड की बाहरी भंवरों में पृथक समूहों में एकत्र होकर सौर परिवार के विभिन्न ग्रह बनाये।

हमारी आकाशगंगा में सूर्य के चारों ओर चक्कर काटने वाले नौ ग्रहों का सौर परिवार है। एक दसवें ग्रह की खोज हुई है। ये ग्रह हैं- बुध (Mercury), शुक्र (Venus), पृथ्वी (Earth), मंगल (Mars), वृहस्पति (Jupiter), शनि (Saturn), अरुण (Uranus), वरुण (Neptune) एवं यम या कुबेर (Pluto)। चंद्रमा पृथ्वी से टूटकर बना एक उपग्रह (Sattelite) है।

पृथ्वी की उत्पत्ति के बाद इस पर जीवन की उत्पत्ति हुई। वैज्ञानिकों एवं दार्शनिकों ने समय-समय पर जीवन की उत्पत्ति के विषय में अपनी-अपनी परिकल्पनाएं प्रस्तुत की हैं।

जैव विकास Enolution

जैव विकास के प्रमाण सिद्ध करते हैं की हमारी पृथ्वी पर पहले की, पूर्वज (Ancestral) जातियों से ही उद्विकास के द्वारा, नयी-नयी जातीयां बनी हैं और बन रही हैं। जैव विकास कैसे हुआ, इसके बारे में 3 दिद्धंत हैं- लैमार्कवाद, डार्विनवाद तथा उत्परिवर्तनवाद।

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